महाकाली की कथा सिखाती है गांधी की अहिन्सा का पूरा दर्शन

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कथित ‘औसत समझ’ के उलट, महाकाली आदमी और आदमीयत को केन्द्र में रखने वाला प्रतीक है। और, महाकाली की गाथा में ही अहिन्सा का गांधी-वादी आदर्श अपनी पूर्णता में निखरता है। Continue reading

नये सिरे से लिखना होगा भारतीय संविधान

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भारतीय संविधान के लिखे, स्वीकार किये और लागू किये जाने की प्रक्रिया के वैधानिक रूप से खोट-पूर्ण होने को स्वीकारने और इस कारण से समूची प्रक्रिया को नये सिरे से पुन: पूरा करने से कोई ऐसा महा-प्रलय नहीं आने वाला है जो सम्प्रभु भारत राष्ट्र के भौतिक और / अथवा प्रशासनिक अस्तित्व को हल्की सी खरोंच तक लगा पाये। Continue reading

म० प्र० राज्य सूचना आयोग की खुली पोल

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म० प्र० राज्य सूचना आयोग आयोग पर बड़ा सवाल उठा है। गैर सरकारी सामाजिक संगठन सजग ने मुख्य सूचना आयुक्त से ही पूछ लिया है कि क्या आयोग स्वयं को देश के समस्त नियमों, कायदों, कानूनों, स्थापित व्यवस्थाओं और मर्यादाओं से ऊपर मानता है? Continue reading

म० प्र० राज्य सूचना आयोग का काला सच

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जो सूचना आयोग सरकारी तन्त्र में सम्पूर्ण पार-दर्शिता स्थापित करने की इकलौती जिम्मेदारी के लिए गठित हुआ है, वह स्वयं न केवल घोर अ-पारदर्शी है अपितु अ-पारदर्शिता को बढ़ावा देने के नित नये हथ-कण्डे खोजने में भी जुटा है। आयोग ने तो अधिनियम का दुरुपयोग करना तक सीख लिया है। Continue reading

खेसारी की खेती को कानूनी मंजूरी का मतलब जन-स्वास्थ्य से छलावा

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खेसारी का जहर नये सिरे से फन उठा रहा है। इसे कुचलना ही होगा। नहीं तो, ऐसा अनर्थ होगा जिससे मुक्ति की कोई राह कभी नहीं ढूँढ़ी जा सकेगी। एक अनर्थ को रोक सकने की तन्त्र की असमर्थता उस अनर्थ को सामाजिक और कानूनी मान्यता देने की अपनी बद-नीयती को जायज कैसे ठहरा सकती है? Continue reading

फिर से फन उठाता खेसारी का जहर

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आधी-अधूरी और अपुष्ट सूचनाएँ उपलब्ध करा खेसारी दाल की खेती को कानूनी मान्यता देने की खबर है। खबर के साथ सोचे-समझे कुतर्क फैलाये जा रहे हैं। खेसारी से जिनके व्यापारिक स्वार्थ जुड़े हैं उनके द्वारा भी, कुछ तथा-कथित कृषि-विज्ञानियों द्वारा भी और शासन-प्रशासन तन्त्र से जुड़े निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा भी। Continue reading

यथार्थ में भारत-वंशी हैं आज के अधिकांश यूरोपीय

Atithi-Vichar

बीती ५ दिसम्बर को भोपाल में धर्मपाल शोध-पीठ, मध्य प्रदेश ने अपने तत्वावधान में आमन्त्रित अतिथियों के बीच एक अनौपचारिक बात-चीत का आयोजन किया था। वैश्विक ताकतों की स्व-हितैषी नीति के विशेष परिप्रेक्ष्य में विशेष रूप से भारतीय हितों को संरक्षित करने के लिए विभिन्न व्यक्तियों तथा स्थानीय संगठनों को बौद्धिक रूप से सचेत और सक्रिय करने की नीयत से आयोजित इस बात-चीत में एक विषय यह भी उठा था कि ‘बेहतर नस्ल’ होने का यूरोपीय दावा कितना खोखला है। Continue reading

मतलब की खेती : ‘दाल’ नहीं ‘कमाई’ काटते राज-नेता

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हमारा सोच आर्थिक-व्यापारिक अधिक हो गया है। वह नैतिकता-सामाजिकता के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया है। कोई अचरज नहीं कि खेसारी-समर्थक ‘वैज्ञानिक’ लॉबी को गलतियाँ करने से कोई गुरेज नहीं है; गुरेज है तो केवल इस पर कि ऐसी गलतियाँ कतई नहीं की जायें जिनसे ‘अधिकतम्’ आर्थिक कमाई मिलने में कोई कसर रह जाती हो। Continue reading