WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_itsec_logs`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_itsec_logs`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_itsec_logs`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_itsec_logs`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SELECT t.*, tt.*, tr.object_id FROM wp_terms AS t INNER JOIN wp_term_taxonomy AS tt ON t.term_id = tt.term_id INNER JOIN wp_term_relationships AS tr ON tr.term_taxonomy_id = tt.term_taxonomy_id WHERE tt.taxonomy IN ('category', 'post_tag', 'post_format') AND tr.object_id IN (1320) ORDER BY t.name ASC

लँगड़े झूठों पर खड़े खेसारी के ‘वैज्ञानिक’ सोच – Jyoti Prakash

लँगड़े झूठों पर खड़े खेसारी के ‘वैज्ञानिक’ सोच

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

WordPress database error: [Disk full (/tmp/#sql_1_0); waiting for someone to free some space...]
SHOW FULL COLUMNS FROM `wp_options`

Sarokar

हमारा सोच नैतिकता-सामाजिकता के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया है। कोई अचरज नहीं कि खेसारी-समर्थक ‘वैज्ञानिक’ लॉबी को गलतियाँ करने से कोई गुरेज नहीं है; गुरेज है तो केवल इस पर कि ऐसी गलतियाँ कतई नहीं की जायें जिनसे ‘अधिकतम’ आर्थिक कमाई मिलने में कोई कसर रह जाती हो।

खेसारी दाल के दुष्‍प्रभावों पर ‘वैज्ञानिक’ सच-झूठ की इतनी फसलें काटी जा चुकी हैं कि हिसाब रखना बहुत कठिन होगा। फिर भी कुछ न कुछ नया बोया-काटा तो आज भी जा रहा है। और इसी नाते, खरपतवार-उन्मूलन जैसा कुछ न कुछ दायित्व मेरे हिस्से में भी आ ही जाता है। मेरा भी यही प्रयास रहता है कि, थोड़ा-मोड़ा ही सही, जितना भी कर सकूँ; अपने दायित्व का निर्वाह करता जाऊँ।

२००८ की जुलाई को ख्यात्‌ पर्यावरण-विद्‌ श्री अनुपम मिश्र ने सेण्‍टर फ़ॉर साइंस एण्‍ड एन्वायरमेण्‍ट द्वारा प्रकाशित होने वाले विज्ञान और पर्यावरण पाक्षिक डाउन टु अर्थ के १६-३० जून २००८ के अंक की एक प्रति भेजकर उसमें खेसारी दाल पर प्रकाशित रपट पर मेरी टिप्पणी की माँग की। तब, समझ में आयी बात का संक्षेप यह था कि सेण्‍टर अपने पाक्षिक का हिन्दी संस्करण निकालने पर गम्भीरता से विचार कर रहा था और सुश्री सुनीता नारायण की मंशा थी कि इसकी जिम्मेदारी अनुपम जी उठायें। श्री मिश्र ने भी पाक्षिक के हिन्दी संस्करण की विषय-वस्तु और दायित्व-निर्वाह के सोच के बारे में अपना दृष्‍टिकोण उन्हें बता दिया था और तब, उसी सिलसिले में ही, उन्होंने मुझे खेसारी पर अपनी राय भेजने को लिखा था।

डाउन टु अर्थ में छपी उस रपट को पढ़कर मुझसे भी रहा नहीं गया और मैंने बिना देर किये, २३ जुलाई २००८ को ही, अपना सोच अनुपम जी को लिख भेजा। फिर आगे न जाने क्या हुआ, या फिर शायद सुनीता जी ने इरादा ही छोड़ दिया, मुझे पता नहीं चला। लेकिन यह अवश्य हुआ कि मेरी वह टिप्पणी अ-प्रकाशित ही रही। यद्यपि बात बहुत बासी हो चुकी है, लेकिन मुझे लगता है कि तथ्य आज भी यथावत्‌, और तरोताजा भी, हैं। पाक्षिक में, एक तरह से खेसारी की खुली खेती की पक्ष-धर लॉबी द्वारा, प्रतिबन्ध उठाने के समर्थन में तब उठाये गये आधार-भूत सवाल भी शाश्‍वत्‌ हैं; सदा रहेंगे भी। अर्थात्‌, आवश्यक है कि सच-झूठ के मन्थन की प्रक्रिया को न तो दबाया जा सके और ना ही इस मन्थन से निकले तथ्यों को प्रत्यक्ष-परोक्ष स्वार्थों की वृष्‍टि-छाया में सायास बिसराया जा सके। और इसीलिए, श्री अनुपम मिश्र को भेजे अपने उस पत्र के तथ्‍यों को यहाँ उद्धृत करने में मुझे किसी प्रकार से कोई संकोच नहीं हो रहा है :

खेसारी पर आपकी भेजी अपर्णा पल्लवी की रपट मिली। पढ़ने से लगता है कि यह मूलत:/पूर्णत: शान्तिलाल कोठारी जी के अपने ही ज्ञान और बखान पर आधारित है। साथ ही यह भी कि, लेखिका ने शायद भरसक कोशिश की है कि वह अपनी इस रपट में किये वर्णनों की पुष्‍टि से बचें। सुविधा का सोच सम्भवत: इसे ही कहते हैं।

बहुत सारी बातें हैं जो बीते सालों में, खास कर घटनाओं से भरे उन सालों में जिनका विशेष रूप से उल्लेख श्री कोठरी के श्रीमुख से हुआ है, बहुत स्पष्‍टता से सामने आयी थीं। वे सही थीं या गलत, यह बहस का विषय हो सकता है। किन्तु, परिस्थिति के प्रकाश में सुरक्षित रूप से यह माना जाना चाहिए कि श्री कोठारी उन सभी बातों को गलत मानते हैं। फिर, यदि यह मान भी लें कि श्री कोठारी अपनी समझ-भर बिल्कुल सही बोल रहे हैं; तब भी उस समस्त उपलब्ध अन्यथा सामग्री को और उसमें निहित बहस को, परीक्षण के लिए ही सही, ऐसी किसी रपट का अंश भी न बनाया जाये और यह दावा करने का संकेत हो कि एक बहुत वैज्ञानिक विश्‍लेषण रखा जा रहा है तो यह अचरज का नहीं, सोच का बिन्दु है।

मेरा अनुभव यही है कि खेसारी की सारी तथा-कथा का केन्द्र यही बिन्दु है क्योंकि तथ्यों-कथ्यों का परीक्षण तो फिर भी किया जा सकता है लेकिन सुन-बहरेपन का न तो निदान सम्भव है और न उपचार।

मैं इसे परिस्थितियों का व्यंग ही मान कर चलता हूँ कि परसों दोपहर जब कूरियर से आपका भेजा डाउन टु अर्थ का १६-३० जून, २००८ का अंक मिला तो मैं और अब्बी भैया संसद्‌ में चल रही ऐतिहासिक बहस को सुन-देख रहे थे। मौटे तौर पर, पहले दिन की उस बहस का प्रमुख मुद्दा इस देश को विदेशी ताकत के किसी अदृश्‍य हाथ की कठपुतली बनाये जाने से बचाने का था। विश्‍वास-प्रस्ताव के पक्षधरों की माँग थी कि देश की सम्प्रभुता को ऐसे हाथों से बचाने के लिए सदन सरकार की नीयत पर भरोसा जताये। विरोधियों का दावा था कि सरकार इतनी बदनीयत हो चुकी थी कि केवल सदन द्वारा उसमें भरोसे की कमी को दर्ज कराकर ही इस देश को किसी विदेशी ताकत की कठपुतली बनने से रोका जा सकता था। मैं मानता हूँ कि पूरी बहस को देखने और सुनने में लगे आम नागरिक को किसी भी क्षण यह स्पष्‍ट नहीं हुआ होगा कि सम्पूर्ण यथार्थता से भारतीय परिस्थितियों की ईमानदारी भरी समीक्षा किये बिना विदेशी हितों की उस स्तर पर की जा रही महज छिद्रान्वेशी बहस का औचित्य क्या था?

मैंने ऊपर जो लिखा है वह इसलिए कि श्री कोठारी का, उनके और लेखिका के लिहाज से, प्रमुख आरोप यह है कि एक सोचे-समझे विदेशी षडयन्त्र के अन्‍तर्गत् ही खेसारी का विरोध शुरू हुआ! इसमें भी दो मत नहीं कि अपनी इस रपट में लेखिका ने श्री कोठारी की अपनी समझ के इस विदेशी षडयन्त्र का साफ-साफ खुलासा भी किया है। लेकिन इसमें भी दो मत नहीं हैं कि वह खुलासा इसी में दिये केवल उन तथाकथित तथ्यों के प्रकाश में हुआ है जो (अर्ध) सत्य कम और (अर्ध) असत्य अधिक हैं। श्री कोठारी के मत में दालों की स्वदेशी आत्म-निर्भरता को समाप्‍त करने के अन्‍तर्राष्‍ट्रीय षडयन्त्र की पूर्ति के लिए ही (सरकारों और मेडिकल रिसर्च में) खेसारी की कीमत पर सोयाबीन जैसे प्रोटीन के (विदेशी) स्रोतों पर जोर दिया जा रहा है।

पढ़कर सचमुच अच्छा लगता है कि समूची आधुनिक पढ़ाई के बावजूद, विज्ञान के इस स्तर पर स्थानीय या कि विशुद्ध देशी सोच को महत्ता देने वाले आज भी इस देश में मौजूद हैं। लेकिन क्या इस अच्छे लगने को श्री कोठारी के उक्‍त सोच पर भी नि:संकोच भाव से लागू कर देखा जा सकता है? मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा कर पाऊँगा। और जिन्हें मेरा ऐसा कहना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा है, उनसे मैं यह कहना चाहूँगा कि मेरे इस सोच के पीछे खुले और स्थापित हो चुके ऐसे बहुत से तथ्य हैं जो या तो श्री कोठारी कभी जान ही नहीं पाये या फिर जिन्हें वे जानते तो हैं लेकिन जिनके प्रति अज्ञानता दर्शाना ही उन्हें हितकर लगता है।

अब, सोयाबीन की ही बात लें। मैं स्वयं भी इस खुले मत का हूँ कि यह फसल एक सोचे-समझे अन्‍तर्राष्‍ट्रीय षडयन्त्र की पूर्ति के लिए ही भारत लायी गयी थी। किन्तु, मैं इस सचाई से भी पूरी तरह से भिज्ञ हूँ कि उस षडयन्त्र का खेसारी से, अथवा उससे जुड़े कथित विवाद से, कुछ भी लेना-देना नहीं था। तथ्य तो यह भी है कि मानव-खाद्य के रूप में खेसारी का विरोध जब इस देश में शुरू हो चुका था तब भारत में, सम्भवत: गिनाने को भी, एक व्यक्‍ति भी ऐसा नहीं था जो सोयाबीन के नाम तक से परिचित रहा हो।

स्वयं अपर्णा पल्लवी की इस रपट में भी यह उल्लेख है कि मानव-स्वास्थ्य पर खेसारी के प्रभाव का अध्ययन सन् १९२० के दशक में शुरू हुआ था। यद्यपि स्थापित हो चुके तथ्य अपर्णा पल्लवी वर्णित इस बिन्दु को काल-चक्र में सन् १९२० से सैकड़ों साल पीछे ले जाकर स्थापित करते हैं, तथापि यहाँ केवल इस एक तथ्य का उल्लेख पर्याप्‍त है कि सोयाबीन से भारत का औपचारिक परिचय १९६० के दशक में ही हुआ था। वह भी, किसी प्राणी के लिए आवश्यक खाद्य-पदार्थके रूप में नहीं, अपितु, खेतों में पैदावार बढ़ाने में मददगार हरी खादके रूप में। बाद में, बहुत सोच-विचार करके पूरे किये गये षडयन्त्र ने, हरी खाद के नाम से लायी इस विदेशी घासको देश के लिए आवश्यक उपयोगी दलहन-तिलहनके प्रदाता के रूप में स्थान दिलाया जो, सोच-विचार कर और भी आगे ले जाकर लागू किये गये षडयन्‍त्र के सहारे, कालान्तर में केवल इसलिए मात्र तिलहन-प्रदातामें बदल गया कि इसकी जीवन-संरक्षक प्रोटीन देशी आदमी की तुलना में मांस प्रदायनी विदेशी गायों और सुअरों के लिए अधिक उपयोगी समझी गयी!

आज, यह सिद्ध करने में कोई परेशानी नहीं होगी कि देश में व्याप्‍त प्रोटीन की बड़ी गम्भीर कमी दरअसल, इसी प्रोटीन की धनीसोयाबीन की देन है। प्रत्यक्ष न सही, इस षडयन्त्र के दोषी स्वयं श्री कोठारी भी हैं जिन्होंने सोयाबीन की उपयोगिता को स्थपित करने की दिशा में देश के पहले सोया-मिल्क संयन्त्र के निर्माण का दावा किया है। हाँ, यह अचरज की बात अवश्य है कि उपर्युक्‍त दावे को करने वाला वही व्यक्‍ति अब गैर-जिम्मेदारी से भरा यह दावा करने का नैतिकसाहस रखता है कि खेसारी का विरोध किसी अन्तर्राष्‍ट्रीय षडयन्त्र की उपज था!

जहाँ तक खेसारी और उसके दुष्प्रभाव पर विधिवत् ऐलोपैथी चिकित्सकीय अध्ययन की बात है, मेरे ज्ञान में, हमारे देश में इसकी शुरूआत बीसवीं सदी के पहले दशक के पूर्वार्ध में तब हुई थी जब एक्टन नामक एक चिकित्सा-विशेषज्ञ, जो उस समय ब्रितानी फौज में मेजर के पद पर पदस्थ था, केवल इसी के लिए कलकत्ता से रीवा आया। उस समय भी यही स्थापित हुआ था कि खेसारी खाने का दुष्प्रभाव एक खास तरह के लंगड़ेपन के रूप में सामने आता है। बरसों बाद, खेसारी को विष-मुक्‍त करने की विधि खोजने का जो दावा हमारे देश के योग्यविज्ञानियों ने किया था उसका स्रोत, यथार्थ में, मेजर एक्टन द्वारा इस रीवा प्रवास में किये गये प्रयोग और उन पर सन् १९०४ में प्रकाशित उनका शोध-पत्र ही था; फिर भले ही, श्रेय हथियाने की नीयत से गोपालन एण्ड कम्पनी ने खेसारी और एक्टन से जुड़े इस तथ्य को छिपाने की भरसक कोशिश क्यों न की हो। इस पूरे घटना-क्रम में मजेदार है तो केवल यह कि दूसरे के काम को अपना बताने की कोशिश में उनसे इतनी बड़ी चूक भी हुई कि बाद में सन् १९८०-८४ के बीच विष-मुक्‍ति के तथाकथित दावे के सरासर झूठे होने का कलंक भी इन्हीं के माथे लगा और तब योजना आयोग के सामने तार-तार हुए अपने कथित वैज्ञानिकवज़ूद को जैसे-तैसे बचा लेने के प्रयास में इन्हें खेसारी की खेती को ही प्रतिबन्धित करने के समर्थन में एक पुस्तिका तक लिखनी-प्रकाशित करनी पड़ी थी!

जहाँ तक खेसारी के खिलाफ अन्तर्राष्‍ट्रीय षडयन्त्र के आरोप के खोखलेपन की बात है, एक सरल सा लेकिन विशुद्ध तथ्य यह है कि खेसारी और एक खास तरह के लंगड़ेपन में परस्पर सम्बन्ध होने की बातें आयुर्वेद के दो प्राचीन ग्रन्थों में बाकायदा दर्ज हैं। भाव प्रकाश निघण्‍टू और माधव निदान नामक इन प्रसिद्ध ग्रन्थों में खेसारी को त्रिपुटा और उससे होने वाली बीमारी को कलायखञ्ज कहा गया है।

जहाँ तक डॉ० सी० गोपालन की बात है, मेरे ज्ञान में वे और उनका खेसारी-गुट विश्‍वसनीयता में खरा नहीं रहा। मैंने इस दोष की चर्चा अलग से स्वयं उनके सम्मुख होकर और खेसारी से जुड़े अनेक अन्तर्राष्‍ट्रीय मंचों से किये अपने पत्राचार तथा लेखों के माध्यम से खुल कर की है। डॉ० गोपालन ने अनेक अवसरों पर जानबूझकर असत्य कथन किये हैं। तथाकथित रूप से तथ्यों पर आधारित अपने दावों के बखान में उन्होंने कुशल जिमनास्ट की तर्ज पर अनेक परस्पर धुर विरोधी पल्टियाँ भी ली हैं। लेकिन विज्ञान और वैज्ञानिक शोध को कलंकित करने वाले उनके इस बड़े गम्भीर दोष में किसी अन्तर्राष्‍ट्रीय षडयन्त्र की कोई बू मुझे कभी नजर नहीं आयी। उन पर, अधिक से अधिक, एक ऐसे महज फण्डोन्मुखी व्यक्‍ति होने का आरोप ही लगाया जा सकता है जो सत्य और ज्ञान के लिए नहीं बल्कि, केवल और केवल, सुविधा-प्रदाता फण्ड की प्राप्‍ति के लिए ही अपने तथाकथित शोध-पत्र प्रकाशित कराता, या फिर, छिपाता रहा है।

लेकिन क्या डॉ० गोपालन ही ऐसा करने वाले इकलौते व्यक्‍ति हैं? क्या यह दावे से कहा जा सकता है कि श्री कोठारी इस फेहरिस्त से कतई बाहर हैं?

एक पोषण-विज्ञानी होने के नाते श्री कोठारी इन और ऐसे ही अन्य सभी तथ्यों से परिचित नहीं होंगे, यह मानने को जी नहीं करता है। श्री कोठारी यह भी जानते ही होंगे कि हमारे पड़ोसी बांग्‍ला देश में ही अनेक पोषण-विज्ञानी इस विषय पर सालों से सतत् अध्ययन कर रहे हैं। वहाँ खुलना और कुश्तिया जैसे क्षेत्रों में खेसारी और लंगड़ेपन की कहानियाँ हमारे रीवा और सतना (मध्य प्रदेश) से थोड़ी सी भी भिन्न नहीं है, यह भी श्री कोठारी अच्छे से जानते होंगे। फिर, क्या कारण है कि उन्होंने सुश्री पल्लवी को इन तथ्यों से अवगत नहीं कराया? किसी बरसों पुरानी फोटो के उपयोग को व्यापक तथ्यों को सिरे से नकारने का सर्व-स्वीकार्य माध्यम नहीं माना जा सकता है। वह भी तब, जब फण्ड और श्रेय के बँटवारे की लड़ाई में वैज्ञानिकों के गुट-बन्द होने की बातें बहुत आम हो रही हों।

रपट में हुए उल्लेखों से यह साफ तौर पर निकलकर आता है कि खेसारी पर प्रतिबन्ध से जुड़ी कोठारी जी की सारी चिन्ता का केन्द्र बिन्दु आर्थिक-व्यावसायिक है। श्री कोठारी यह स्वीकारते भी लगते हैं कि खेसारी से जुड़ी सारी व्यावसायिकता मिलावट के बाजार पर आधारित है। अर्थात् अनैतिक भी है। प्रकारान्तर से यह भी कहा गया है कि क्योंकि प्रतिबन्ध यथार्थ में कभी प्रभावी नहीं रहा इसलिए मिलावट-खोर व्यवसाइयों के हाथों खेसारी-उत्पादकों का शोषण भर हुआ है। इन सब स्वीकारोक्‍तियों में हमारे चरित्रगत् दोष की चाहे जितनी सचाई छिपी हो, लेकिन इनमें से एक भी सचाई खेसारी पर लगे प्रतिबन्ध को उठाने को कोई नैतिक आधार नहीं देती है।

श्री कोठारी रीवा और सतना में होने वाले लंगड़ेपन के लिए खेसारी को जिम्मेदार ठहराने वाली (आधुनिक जमाने की) उनकी प्रतिद्वन्द्वी शोधों पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। यदि उनके सवाल पूरी तरह से वैज्ञानिक हों तो उनकी इस सरल सी बात में मुझे कोई आपत्ति नहीं दिखती। लेकिन गम्भीर आपत्ति की बात तो यह है कि उनके (कु) तर्क उतने ही नकारात्मक हैं जितनी नकारात्मकता के लिए वे खेसारी को दोषी ठहराने वाले दावों पर सवाल चस्पा कर रहे हैं। इसके लिए श्री कोठारी इन क्षेत्रों में मैंगनीज़ के खनन के तथ्य की उपेक्षा करने का आरोप लगा रहे हैं। लेकिन मेरा सरल सा सवाल यह है कि अनदेखी का उनका यह आरोप शत्-प्रतिशत् सच भी हो तो भी क्या उतना होने मात्र से वे यह दावा करने की स्थिति में आ गये हैं कि खेसारी बिल्कुल निर्दोष है? खेसारी स्वास्थ्य की जिस हानि के लिए जिम्मेदार ठहरायी जा रही है उसके लिए वह नहीं, यथार्थत: मैंगनीज़ ही जिम्मेदार है; यह पूरी वैज्ञानिकता से स्थापित किये बिना श्री कोठारी ऐसा कोई संकेत भी कैसे दे सकते हैं?

वैसे, पहचान निर्धरित करने के लिहाज से, दोनों में एक सरल सा अन्तर यह है कि मैंगनीज़ के दुष्प्रभाव में आया व्यक्‍ति सामने की ओर झुक कर चल ही नहीं सकता है; चलते समय उसे पीछे की ओर कुछ न कुछ झुकना पड़ता है। जबकि सामने की ओर झुक कर चलना खेसारी-पीड़ित व्यक्‍ति की विवशता है; सरल सी पहचान भी। खेसारी-पीड़ित न तो रीढ़ सीधी कर खड़ा हो सकता है और न ही पीछे की ओर थोड़ा सा भी झुक सकता है। खेसारी-पीड़ित व्यक्‍ति अपनी एड़ी को जमीन पर टिका ही नहीं सकता है, उसका तो केवल पंजा ही जमीन पर टिकता है। वह भी थरथराता हुआ सा ही। यही नहीं, खेसारी-पीड़ित व्यक्‍ति के घुटने खड़े होते अथवा चलते समय आपस में टकराते भी हैं। इन सब कारणों से उसकी कैंची जैसे कदमों वाली और पंजों पर काँपती हुई लड़खड़ाती चाल इतनी और ऐसी साफ-साफ खेसारी पीड़ित व्यक्ति की हो जाती है जैसी किसी मैंगनीज़ प्रभावित की होती ही नहीं है। खेसारी-पीड़ित की पहचान के लिए रीवा-सतना में आम आदमी के बीच प्रचलित भी है हालै चुँदई, मटकै कूल्ह; या देखौ मटरा कै सूल। इस सबके बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि मैंगनीज़ पीड़ित व्यक्‍तियों में, बहुधा, त्वचा सम्बन्धी ऐसे लक्षण भी उभरते हैं जो विशुद्ध खेसारी-पीड़ित में कभी भी नहीं मिलते।

चिकित्सकीय निदान की दृष्‍टि से यह इतने बड़े अन्तर हैं जो किसी भी द्विविधा को पास फटकने से रोकते हैं। साफ है, इन पर कोई सारगर्भित तुलनात्मक चिकित्सकीय टिप्पणी किये बिना, थोथी सम्भावना के नाम पर और केवल भ्रम फैलाने के दुरुद्देश्य से, मैंगनीज़ की छछूँदर छोड़ने की नीयत को और चाहे जो कह दिया जाये, कम से कम ईमानदार वैज्ञानिक विवेचन तो नहीं ही कहा जायेगा।

सबसे अन्त में श्री कोठारी बड़ी चतुराई से खेसारी की खेती को देश में दालों, अर्थात् प्रकारान्तर से प्रोटीन, की गम्भीर कमी को दूर करने का महत्वपूर्ण माध्यम होने का दावा करते हैं।

पहली बात तो यह कि दालों की, या कहें कि प्रोटीन की, इस कमी की शुरूआत आखिर हुई कब से? यह सच है कि अपने देश में खेती के इतिहास को खँगालें तो इसका जवाब सोयाबीन की खेती की व्यवस्थित शुरूआत पर जाकर ठहरता है। लेकिन, केवल संयोग के पायदान पर खड़े इस तथ्य की झीनी सी ओट के सहारे श्री कोठारी के इस सर्वथा अवैज्ञानिक आरोप को कतई स्वीकारा नहीं जा सकता है कि सोयाबीन की खेती को प्रोत्साहन देने की नीयत से ही खेसारी को प्रतिबन्धित करने के कदम उठाये गये थे और खेसारी की खेती को प्रतिबन्धित करने से ही आज देश को प्रोटीन की घोर कमी के यह दिन देखने पड़ रहे हैं! विशेष रूप से तब जब यह एक उजागर तथ्य हो कि शासन से ऐसा निर्णय लागू करवा पाने में सामाजिक कार्यकर्त्ताओं की एड़ी-चोटी पसीने से सराबोर हो गयी थी।

ऐसे में श्री कोठारी से, कुछ उनकी ही शैली में, सवाल है कि क्या देश में कुल उपजायी जा रही सोयाबीन में कुल इतना भी प्रोटीन नहीं होता है कि खेसारी के उत्पादन में हो रही कुल कमी की भरपायी की जा सके? फिर, यदि श्री कोठारी की बातें ही मान लें तो, परिदृश्य में एक बड़ा मजेदार बिन्दु यह भी उभरता है कि खेसारी पर लगे प्रतिबन्ध से उसके वास्तविक उत्पादन में कोई विशेष अन्तर भी नहीं आया है; प्रतिबन्ध के बाद भी उसकी खेती निरन्तर, और वैसी की वैसी ही, होती आ रही है। स्वयं श्री कोठारी के ही अनुसार, अन्तर तो केवल उसके उत्पादकों को होने वाली एक नम्बर की कमाई में आया है। इन दोनों तथ्यों को एक साथ रख कर देखने भर से श्री कोठारी के सोच की तथाकथित वैज्ञानिकता की सारी कलई सहज ही उतर जाती है।

आगे की दूसरी बात यह है कि अब यह कोई छिपा हुआ रहस्य नहीं रहा कि देश में प्रोटीन की प्रति व्यक्‍ति उपलब्धता में हुई कमी खेती के हमारे पारम्परिक स्वरूप और उद्देश्य दोनों को ही तिलांजलि दे देने की देन है। सोयाबीन के प्रति प्रदर्शित होती दीवानगी इस तिलांजलि का प्रतीक-मात्र है। हमारा सोच आर्थिक-व्यापारिक अधिक हो गया है। वह नैतिकता-सामाजिकता के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया है। कोई अचरज नहीं कि श्री कोठारी भी वही भाषा बोल रहे हैं। यानि, गलतियाँ करने से कोई गुरेज नहीं है; गुरेज है तो केवल इस पर कि ऐसी गलतियाँ कतई नहीं की जायें जिनसे अधिकतमआर्थिक कमाई मिलने में कोई कसर रह जाती हो। फिर भले ही, इसके लिए हमें यह स्वीकार हो कि देश में हो रही सोयाबीन में मौजूद ९० फीसदी से अधिक प्रोटीन को दुग्ध-उत्पादक और मांसभक्षक पश्‍चिमी देशों के वे जानवर खायें जो उन देशों के लिए डिब्बा-बन्द मांस या दूध से जुड़े अन्तर्राष्‍ट्रीय व्यावसायिक महत्व के हैं। इसी सच के चलते, हमारे लिए तो सोयाबीन तिलहन भर होकर रह गया है क्योंकि इसके दलहन ने किन्हीं और देशों के नागरिकों के स्वस्थ-मजबूत जीवन की गरण्टी ली हुई है।

यही वह अन्तर्राष्‍ट्रीय षडयन्त्र है जो हमें सोयाबीन के उत्पादन में, यथा-सम्भव, उत्तरोत्तर वृद्धि की ओर ढकेल रहा है। षडयन्त्र यह है कि अपनी जमीन पर सोया-प्रोटीन उगाकर उसे सोया-खली के रूप में हम उन देशों को इसलिए दे दें क्योंकि वे अपने उन ढोरों को खिलाने के लिए अपनी जमीन बिल्कुल भी जाया नहीं करना चाहते जिन्हें खाकर वे ‘एनिमल’ प्रोटीन की अपनी आवश्यकता पूरी कर रहे हैं। और लगता नहीं है कि षडयन्त्र-पूर्वक ऐसा किये जाने का कोठारी जी को हल्का सा भी दु:ख या कि रोष हो।

रही बात खेसारी के प्रोटीन से भरपूर होने की, तो एक पोषण-विज्ञानी होने के नाते श्री कोठरी से अपेक्षा रखी जा सकती है कि वे छोटे से लेकिन बड़े महत्व के इस तथ्य से परिचित होंगे कि खेसारी में ट्रिप्सिन-इन्हिबिटर नामक एन्ज़ाइम इतनी अधिक मात्रा में है कि उतना कम ही फसलों में मिलता है। यह ट्रिप्सिन-इन्हिबिटर खेसारी में मौजूद तमाम प्रोटीन को उसके ना होने जैसी स्थिति में खड़ा कर देता है। सरल वैज्ञानिक शब्दों में, उन सामान्य स्थितियों में जिनमें और जिस तरह से खेसारी को खाया जाता है; कोई कितनी भी खेसारी खाये, उसमें उपस्थित प्रोटीन उसको खाने वाले के शरीर में बिल्कुल भी नहीं लगेगी।

श्री कोठारी बड़े महत्व के इन तथ्यों को जानबूझकर क्यों छिपा रहे हैं, यह तो वे ही बतला सकते हैं लेकिन यदि उनके लिए मेरे द्वारा रखे गये उपर्युक्‍त तथ्य एकदम नये ही हैं तो हमें ऐसे पोषण-विज्ञानी की बातों को थोड़ी सी भी गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। और हाँ, यदि वे यह दावा करते हैं कि इन सबसे वे भली-भाँति परिचित रहे हैं तो फिर, यह समझाने का दायित्व भी सीधे-सीधे उन पर ही ठहरता है कि डाउन टु अर्थ में उनके माध्यम से प्रस्तुत हुए सर्वथा अस्वीकार्य निष्कर्षों को कोई स्वीकार करे भी तो आखिर क्यों?

इस पल मुझे एक कहावत बरबस याद आ गयी है पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय?”

(१५ जनवरी २०१०)