अग्नि-परीक्षा-१ : परीक्षा में झुँकी न्याय की भारतीय अवधारणा

Sarokar

बलि की बेदी के खूँटे से साक्षात्‌ न्याय की भारतीय अवधारणा ही बाँध दी गयी है। बिना परिणामों की गहराई पर विचार किये ही न्याय की भारतीय अवधारणा को अग्नि-परीक्षा में झौंक दिया गया है। परम्परा से कहीं बहुत गहरा है न्याय की भारतीय अवधारणा का आसन्न संकट।

कहते हैं कि बात निकलेगी तो दूर तक जायेगी! सच है। इसलिए, अब बात जब निकल ही गयी है तो दूर-दूर तक जाये बिना रहेगी भी नहीं। बात सूचना का अधिकार अधिनियम से सर्वोच्च न्यायालय की एक सीमित किन्तु निश्‍चित सी उन्‍मुक्‍ति के अत्यन्त व्यापक किन्तु सरल से संवैधानिक मुद्दे से जुड़ी है। ऐसी उन्‍मुक्‍ति, जिसे इस संवैधानिक संस्था के विद्यमान न्यासधरों द्वारा अपरिहार्य ठहराये जाने के विनिश्‍चय को इसके ही अधीनस्थ दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा विधि-पूर्ण प्रक्रिया अपनाते हुए अवैध ठहरा दिया गया है। और अब इन्हीं न्यासधरों ने इस न्यायिक फैसले से उत्पन्न हुई विकट वैधानिक स्थिति के कारण, अपरिहार्यता की अपनी इस एकपक्षीय घोषणा को अपने में ही विहित संवैधानिकता से पुष्‍ट कराने की प्रक्रिया प्रारम्भ करने का निर्णय भी स्वयं ही कर लिया है।

उपलब्ध संकेतों से ऐसा लग रहा है कि भारतीय न्यायिक परम्परा की तुलनात्मक शुचिता की ढाल बनाकर न्याय की सार्वभौमिक अवधारणा को चुनौती देने की न्याय-च्युत सी एक बहस को जैसे अचानक ही सार्वजनिक कर दिया गया है।

कुल मिलाकर, एक बड़ी विकट स्थिति में आ फँसी दिख रही है न्याय की भारतीय अवधारणा। क्या कुछ सकारात्मक प्राप्‍ति होगी, होगी भी या नहीं; यह तो केवल भविष्‍य के ही गर्भ में है। किन्तु नकारात्मक रूप से जो कुछ होना निश्‍चित दिख रहा है उस आभास का सार यह है कि, अन्त में, न्याय की देवी के हाथ की तराजू का चाहे जो पलड़ा भारी पड़े; कानून-विदों की बहस में यदि कुछ चोटिल होगा तो वह भारतीय न्याय की छवि ही होगी। स्वयं भारतीय मानस में। अन्तर्राष्‍ट्रीय स्तर पर तो यह, बस, इससे जुड़े अतीत के धुँधले संकेतों की कुछ अधिक साफ पुष्‍टि-मात्र होगी।

न्याय के अनन्त तन्तु के यदि दो छोर चिन्हित किये जा सकते हों तो उनमें से एक को परम्‍परा और दूसरे को सार्वभौम अवधारणा कहा जा सकता है। इस बिन्दु पर कभी नहीं भूलने वाला सहज सा मार्गदर्शक दार्शनिक तथ्य यह है कि फिर चाहे यह स्थानीय मानक पारिवारिक हो, सामाजिक हो अथवा देशज; परम्परा सदा ही स्थानीयता में पगी होती है। इस नाते, विभिन्न परिवेशों में, परम्परा-भेद सहज-स्वाभाविक हैं। कहना गलत नहीं होगा कि इन्हीं भेदों की समझ में परिवार, समाज अथवा देश-विशेष की सामाजिक संरचना की ‘श्रेष्‍ठता’ को नापने का आधार ढूँढ़ा जा सकता है। जबकि इसके उलट, सार्वभौम अवधारणा समूचे सभ्य समाज के लिए एक-निष्‍ठ होती है। वैश्‍विक रूप से सभी के लिए समान मानक। इसी मानक पर देश-विशेष की न्यायिक श्रेष्‍ठता की अन्तर्देशीय छवि का तुलनात्मक निर्धारण होता है।

यह समझ के उथलेपन से उपजी भूल-मात्र होगी कि इससे अन्तर नहीं पड़ने वाला कि समूचे घटना-क्रम की बलि, अन्तत:, कौन सा पक्षकार चढ़ेगा? बल्कि यथार्थ में तो, पड़ने वाला अन्तर बहुत दूरगामी होगा क्योंकि बलि की बेदी के खूँटे से कोई ऐसा-वैसा दाँव नहीं बल्कि साक्षात्‌ न्याय की भारतीय अवधारणा ही बाँध दी गयी है। सम्भवत:, बिना परिणामों की गहराई पर विचार किये ही न्याय की भारतीय अवधारणा को अग्नि-परीक्षा में झौंक दिया गया है। इसलिए, परम्परा से कहीं बहुत गहरा है न्याय की भारतीय अवधारणा का आसन्न संकट।

इसमें दो मत नहीं कि अभी सभी कुछ बहुत उथला-धुँधला सा ही है। इसलिए कि, अभी तो आरम्भ ही है। किन्तु इस सम्भावना से कौन आँखें मूँदेगा और मूँदेगा तो भी आखिर कितने दिनों तक यथार्थ में बन्द किये रख सकेगा कि जैसे-जैसे दिन चढ़ेंगे, बहस बढ़ेगी। बहस का मुद्दा बौद्धिकता के सीमित से अभिजात्य दायरे से आम जन और आम मानसिकता की गहराई में उतरता जायेगा।

यों न्यायमूर्ति तुलजापुलकर और न्यायमूर्ति कृष्‍णा अय्यर जैसों के जमानों से ही ऐसी बहसें उच्चतर स्तर पर छेड़ी जाती रही हैं। किन्तु किसी न किसी कारण से वे भारतीय न्याय को कसौटी के आज के स्तर तक उतार नहीं पायी थीं। बरसों बाद, आज उपलब्ध अतीत के उन सभी तथ्यों की निर्लिप्‍त समीक्षा करें तो समझ आता है कि उस युग में ऐसी बहसों के तार छेड़ने वाले सभी हाथ केवल और केवल समीक्षा-विश्‍लेषण के लिए लेखनियाँ थामे हुए थे; उनमें से एक ने भी पक्षकार के रूप में स्वयं को उद्यत नहीं किया था। उन हाथों में दर्पण अवश्य थे लेकिन उनमें वे दूसरों को जो छवियाँ दिखला रहे थे, वह उनकी अपनी नहीं अपितु पक्षकारों की थीं। जबकि आज का तथ्य यह है कि दर्पण को थामे हुए हाथ उनमें स्वयं अपनी भी छवि निहार रहे हैं और सन्देश दे रहे हैं कि उचित समय आने पर वे यह बतलायेंगे कि उनकी अपनी ही समीक्षा में वह छवि कैसी निकली?

ऐसे में एक बेबस से भारतीय मन के लिए, आज तो, कहने को केवल यही है कि क्योंकि अग्नि-परीक्षा का यह विकट संकट परिस्थिति-जन्य नहीं अपितु आहूत है; ईश्‍वर करे, इस मन्थन से केवल अमृत ही निकले। गरल की एक बूँद भी प्रकट न हो। क्योंकि यदि निकला तो, इस गरल को गले में ‘धारण’ कर सके, ऐसा अपरिमित महिमा-धारी अनन्त शिव भारत-भूमि पर आज है नहीं।

(२१ मार्च २०१०)