August 2010 archive

पॉलिटिकल कोलाज पर शोध-प्रबन्ध

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इसे महज को-इन्सिडेन्स ही कहिए। हाँ, निहायत अपने किसी निजी ऐंगिल से, अगर आपको इसमें फ़ोर्थ पॉकेट दिख जाये तो आपकी इस महारत को सलाम! मैं तो बस, फुरसत में बैठा सीधा-सच्चा फ़र्स्ट पॉकेट शॉट खेल रहा हूँ। Continue reading

बहुतेरे आँगन, बहुतेरे नाम!

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वीवीआईपी बंगलों-कोठियों के आँगनों में ‘नाम’ होने के किस्से जब आम हो जाते हैं तो इन ‘नाम-चीन’ खसुल-खासों की चाँदी तो कटती ही है, कोठी मालिकों को भी अपनी-अपनी पौ बारह करने की गारण्टी मिलती है। Continue reading

हाली की नहीं, उसकी घरवाली की मर्जी

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सूबे की कैपिटल में माल-गुजार और हाली के बीच के रिश्ते तो यथावत्‌ हैं। हाँ, हाली और उसकी घरवाली के बीच के ईक्वेशन्स जरूर बदल गये हैं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे विन्ध्याचल की वादियों में राजा-महाराजाओं के अटे पड़े किस्सों में सुनकर आया था। Continue reading

अण्डे-मुर्गी का ग्रेट इण्डियन कन्फ़्यूजन

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राम के ‘होने’ में ही लखन के होने की कुंजी है। क्योंकि, किसी में यह दावा करने की हिम्मत नहीं कि अनुज के ‘लक्ष्‍मण’ होने में ही अग्रज के ‘राम’ होने की कुंजी है। यही मेरी चिन्ता थी। Continue reading

हमारी ब्राण्ड न्यू पहचान

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हम पर इन्वेस्ट किया जा सकता है। एक-दम बे-खौफ़। अपनी यह नयी इण्टर-नेशनल पहचान कायम करने में सफल हो ही गये हैं हम। कथनी के क्यूट से मुखौटे के पीछे करनी के भयावह चेहरे को छिपा पाने की एक-दम अन-पैरेलल पहचान! Continue reading