January 2011 archive

चुनाव आयुक्‍त उवाच

‘मोह-भंग होने से पहले ही लोक-तन्त्र की कमियों को दूर करना होगा वरना जनता तख्ता पलट देगी।’ यह सन्देश था मुख्य चुनाव आयुक्‍त क़ुरैशी का जो उन्होंने लखनऊ में कानून मन्त्रालय की कोर कमेटी के सम्मेलन से दिया।

ठण्डे-सन्तुलित दिमाग से विचारें तो अपने आप में बड़ा खतरनाक है इसका निहितार्थ। यथार्थ लोक-तन्त्र की स्थापना की घोर बेचैनी में की गयी किसी गम्भीर जन-कोशिश को इतने नकारात्मक भाव में रखना, प्रकारान्तर से, चौ-तरफा भ्रष्‍ट और निरंकुश होते राजनैतिक-प्रशासनिक-विधाई तन्त्र के हाथ से सत्ता-सुख के छिन जाने के भय को शब्द देने जैसा ही कलुषित कृत्य है। खास तौर से तब जब यह ऐसे संविधान-प्रतिष्‍ठित संस्था-प्रमुख की ओर से रखा गया हो जिसके अपने जिम्मे में लोक-तन्त्र की आधार-भूत कुञ्‍जी की देख-भाल की जिम्मेदारी हो।

ठीक ही तो कहा गया है, ‘पर उपदेश, कुशल बहुतेरे!’

(३१ जनवरी २०११)

उतनी दूर नहीं रही अब दिल्ली

दादी ने पद्मश्री माशे को जमीन देने का वायदा किया था। तब से अब तक यह वायदा केवल भुला दिया गया वायदा ही बना हुआ था। अब जाकर, पोते की प्रेरणा से, वायदे को ऐलान में तब्दील कर दिया गया है। Continue reading

भागते भूत की लँगोटी ही भली!

एक और भी ऐंगल है, इस हाथ आयी लँगोट को कैश कराने का। मैं चुल्लू भर पानी में डुबा देने वाली भारी-भरकम धूल के गुबार तक से अमृत एक्सट्रैक्‍ट कर लेने के अन-पैरेलल दिमाग की दाद देने की कोशिश कर रहा हूँ। Continue reading

सच में कलिनायक

लगता है कि प्रेस की आड़ में उसके द्वारा खेले जा रहे खेल की काली कहानी के पन्नों के खुलने से कलिनायक की कालिख और भी चमक उठी है। स्पूतनिक से चर्चा में राजस्थान कलिनायक प्रकाशन, बीकानेर से जुड़े सूत्रों ने आरोप लगाया है कि तथ्यों के खुलासे से बेचैन हुए मीडिया माफ़िया ने प्रोफेशनल हैकर्स की मदद से उसकी साइट www.rajasthankalinayak.com को ठप्प कर दिया है। इसके लिए बहुत भारी भुगतान होने की बातें हैं।

लेकिन इन विजिटर्स के लिए एक खुशखबर है। www.mediamanch.com नाम की साइट पर ‘कलिनायक सुधार मंच’ के नाम से जबलपुर के एक स्वयंसेवी संगठन की प्रेस विज्ञप्‍ति है जिसके अनुसार सीधे डाउनलोड के लिए किताब ‘कलिनायक’ www.rajasthankalinayak.net पर उपलब्ध है।

(१८ जनवरी २०११)

राज्य सूचना आयुक्‍तों का हटाया जाना : राज्यपाल का दायित्‍व

राज्यपाल मात्र ‘स्वेच्छा’ या कि ‘स्व-विवेक’ के आधार पर; पद-च्युति की प्रक्रिया में जाने से ही मना करने के किसी मनमाने व स्वच्छन्द अधिकार से विधानत: कतई वंचित है। Continue reading

महा मौन पर महामहिम को नोटिस : दायित्‍व निभाएँ नहीं तो होंगे बर्खास्त

भारतीय गण-तन्त्र की सबसे अनोखी घटना है। एक राज्यपाल को बाकायदा वैधानिक नोटिस देकर चेतावनी दी गयी है कि वे पन्द्रह दिनों के भीतर अपने संवैधानिक दायित्‍व के निर्वाह की बन्धनकारी प्रक्रिया को प्रारम्भ करें अन्यथा उनकी बर्खास्तगी की न्यायिक प्रक्रिया प्रारम्भ की जायेगी। Continue reading

बल्लियों के ढेर में तिनके की तलाश

पके ठूँठों के बीच से ‘काम लायक’ कुछ बन्दे ढूँढ़ने थे। अपने तरीके से ढाले जा सकने लायक बिल्कुल कच्चे-बच्चे। ऐसे, जिनका कोई खास वजूद न हो। बिल्कुल, बल्लियों के ढेर में से तिनके की तलाश जितनी मेहनत से। Continue reading

बौने होते मीडिया-धर्म की कहानी : कलिनायक की बयानी

पीत पत्रकारिता पर ब्लैकमेलिंग का चढ़ता ही जा रहा मुलम्मा संकेत दे रहा है कि इसकी आँच अब हमारे संवैधानिक संस्थानों तक को झुलसा रही है। इसलिए मीडिया की गम्भीरतम्‌ समीक्षा अपरिहार्य हो गयी है। Continue reading