February 2011 archive

यूज़ एण्ड थ्रो का म्यूचुअल गेम

जो दिखायी दे रहा है वह नियति का आखिरी पल नहीं है। थकी हुई साँसों को थामकर रिबॉर्न हुआ मँजा खिलाड़ी धोबी पाट लगाते हुए सारे खेल को पलट सकता है। हुआ ना, यूज़ एण्ड थ्रो का अन-एण्डिंग म्यूचुअल गेम? Continue reading

‘बे-रंग’ लौटा छोटा

कोई अनहोनी होनी नहीं थी सो नहीं हुई। सभी जानते थे। खुद ‘छोटा भाई’ भी। लेकिन वोट की राजनीति में इस ‘जानने’ का कोई अर्थ नहीं होता। मायने रखती है तो यह बात कि राज-नेता सचाई को झुठलाने में किस कदर सफल होता है?

इस सारी कवायद में म० प्र० का सीएम बुरी तरह फेल हुआ। पिछले दिनों मैंने बिल्कुल साफ शब्दों में लिखा था कि कैसे केवल कुर्सी से चिपके रहने के लोभ में इस शब्द-वीर ने उपवास का इरादा छोड़ा था? पार्टी को अन्धेरे में रखकर ‘बड़े भाई’ के सम्मान में घुटने टेके थे। दिल्ली में महज दिखावे की इज्जत-बचाऊ बात के लिए बैठे शिवराज के हाथ में ऐसा कुछ नहीं था जो उन्हें पीएम से अपनी बात मनवाने की ताकत देता। लचर सी दलीलों के पुलन्दे के साथ बैरंग लौट आये हैं।

(२१ फरवरी २०११)

नम्बरियों का बे-नम्बरी खेल

बे-नम्बरी और बे-नामी में बहुत फ़र्क है। बेनामी चोरा-चोरी का खेल है। बे-नम्बरी खेल खुला फरुक्खाबादी है। जैसे, छपे हुए अखबार के पेज गिनने तो बीस मिलेंगें लेकिन देखेंगे तो आखीर में छपा हुआ अठारह ही पढ़ेंगे। Continue reading

सत्ता-भूख में उपवास की नौटंकी

वह सत्ता की भूख की बेहद अनोखी मिसाल होती। सरकार तो खाती-पीती रहती लेकिन अपने सियासी बयानों और लोक-लुभावनी अदाओं से बेबस किसानों को, पेट भरने लायक मुआवजा देने-दिलवाने की, बरसों से चली आ रही नौटंकी का नया संस्करण दिखाता उसका मुखिया भूखा बैठा रहता। Continue reading

बहू भी तो कभी सास होगी

उस तानाशाह की कहानी दुहराई जा रही थी जिसने अपने फोटो वाले डाक टिकिट छपवाये। गोंद भी उम्दा लगवाई। धड़ा-धड़ बिके भी। लेकिन, लिफाफों पर चिपक नहीं सके। दरअसल, खिसियाई जनता अपना थूक उल्टी तरफ लगा रही थी। Continue reading

डज़ नॉट कण्टेन लेमन एण्ड चन्दन

राहुल महज एक इन्सान की अपनी नहीं, अपने भरे-पूरे कुटुम्ब की ‘आत्म-कथा’ लिखने जैसी कोई परम्परा शुरू करने की किसी ‘सलाह’ पर सच में कुछ और आगे बढ़ गये हैं? झूठ कोई कहेगा नहीं। सच कोई जानेगा नहीं। Continue reading