May 2011 archive

अञ्‍जामे गुलिस्तां क्या होगा?

समझा न पाये वह सरकार कैसी? सो, एक रास्ता निकाल लिया है। मोटे से मोटे पर्दे को भी झुठला दे ऐसा बेदाग पार-दर्शी! भू-माफ़िया की बुरी नजरों से बचाए रखने के लिए खाली पड़ी सरकारी जमीन को ठेके पर दिया जायेगा। Continue reading

अर्थ का न हो ऐसा अनर्थ, बेब!

खबर है कि वे हिन्दुस्तानी होने पर शर्मिन्दा हैं। कन्फ़्यूजन इस बात को लेकर है कि कहीं अमूल बेबी ने अपनी बात ‘सर्विस-टैक्स फ्री’ मँहगे भोजन पर व्यंग्य कसते हुए तो नहीं की थी जिसे मीडिया समझ नहीं पाया? Continue reading

बीती को बिसार आगे की चिन्ता

पेंच तो तब आयेगा जब दिग्गी राजा को मीडिया की अक़्ल की जरूरत दुबारा पड़ेगी। वैसे, जितना आश्‍वस्त होकर उन्होंने अपनी आज की फजीहत टाली है, उससे लगता है कि तब ‘बीती ताहि बिसार दे’ के फण्डे की गोट खेलेंगे। Continue reading

कठ-पुतली रहेगी आखिर कठ-पुतली ही

उस एक छोटी सी खबर ने मेरी नींद उड़ा दी थी जो बतला रही थी कि देश के संरक्षित वनों में बाघों की संख्या घट गयी थी जबकि उन खुले क्षेत्रों में बाघ बढ़ गये थे जो सरकारी संरक्षण से मुक्‍त रखे गये थे। Continue reading

ओ बाबू, समझो इशारे!

अम्बानी ने सरकारी भ्रष्‍टाचार की पोल खोलने के लिए गठित हुई पीएसी से कह दिया — ऐसे सवाल मत पूछिए जिनके जवाब से उनके अपने ही भ्रष्‍टाचार की पोल खोलने के लिए चल रहे अदालती मुकदमे में कोई संकट खड़ा हो! Continue reading