किसका कितना दामन है?

वैश्‍विक दर्शन का एक सूत्र देने की अकुलाहट रोके नहीं रुक रही है। सूत्र की पैदाइश एक फिल्मी गीत से हुई है जो अपने समय में बड़ा पॉपुलर हुआ था। इसकी एक लाइन थी — जितना जिसका दामन था उतनी उसको सौगात मिली।

कुछ ज्यादा ही ऊँचे किस्म का एक विचारक मेरा परिचित हुआ करता है। हमारे बीच के इस बड़े पुराने परिचय की एक बड़ी खासियत है। यों, बात अकेली मेरी नहीं है। उनके हर परिचित के बीच यह खासियत-फ़ैक्‍टर कॉमन है — इनकी विचारण-क्षमता का लोहा मान चुका हर प्राणी, इन्हें देखते ही, रफूचक्कर होने की जुगत में जुट जाता है। लेकिन, जैसा कि झुण्ड में चलती मछलियों के साथ होता है, एक न एक शिकार इनके हत्थे चढ़ ही जाता है।

उस दिन मेरा नसीब भी कुछ ऐसा ही नियत था। फँस गया। मिलते ही व्यास-पीठ हथिया ली। अरे हाँ, मैं भी कितना बुड़बक हूँ! भूल ही गया कि २१वीं सदी के सपने देखते परिवारों में पल रही सन्तानें यह जानती ही कहाँ हैं कि यह व्यास-पीठ होती क्या चीज है? ज्यादा तो मैं भी नहीं जानता। लेकिन, सुन रखा है कि यह बीते दकियानूसी जमाने का बड़ा रिस्पैक्‍ट-फुल ओहदा है। ऐसा ओहदा जो सीधे-सीधे किसी इन्सान से तो नहीं लेकिन इसका ताल्लुक किसी इन्सान द्वारा, वक़्त-बेवक़्त और सिचुएशनली, ऑक्युपाई की जाने वाली एक खास सीट से जरूर है। यह सीट इतनी अहम्‌ है कि इस पर कब्जा करते ही बोलने का अधिकार केवल उस चुनिन्दा इन्सान का होकर रह जाता है। बाकी के लोग या तो चुपचाप बैठे सुनते रहें या फिर, बिना मॉब को डिस्टर्ब किये, धीरे से खिसक लें।

मेरा वह परिचित खुद ब खुद व्यास बन बैठा। आदतन। दुर्भाग्य इतना जबरदस्त कि उस दिन मैं अकेला-बेचारा मॉब बना दिया गया। दुर्भाग्य जबरदस्त इसलिए कि सांस्कृतिक परम्परा में व्यास-पीठ को श्रोता-विहीन छोड़ना वर्जित है। और, किस्सा कोताह यह कि व्यास-पीठ पर बिराजते ही अपनी बिफरन मुझ अकेले श्रोता पर कुछ इस भाव में भड़ा-भड़ पटकना शुरू कर दी जैसे कि एक भूखे भेड़िये को बमुश्‍किल शिकार मिला हो।

यों, उनके एग्ज़ाम्पिल्स जितने ढेर थे, रीजनिंग्स और एक्सप्लेनेशन्स भी उतने ही एलोबरेट। फिर भी, मुझे रह-रह कर यह खयाल आ रहा है कि सोशल पॉलिटिक्स में खासी डीप रुचि रखने वाली आप जैसी नॉन एलाइण्ड और सेक्युलर फ़ोर्सेज़ चाहती हैं कि मैं इनकी हल्की-फुल्की बानगियों को शेयर करूँ। इसीलिए उनमें से कुछ को पेश करने की कोशिश करूँगा। हाँ, एक धरम-संकट तो है ही। न जाने क्यों मुझे यह डर भी सता रहा है कि कुछ लोग मेरी इस किस्सा-गोई से खफ़ा भी हो सकते हैं। जानता हूँ, आप इन्हें ‘वेस्टेड इण्टरेस्ट्स’ कह कर दर-किनार करना पसन्द करते हैं। सो, इस डोलड्रम से बचने के लिए ऐसे तमाम हैसियत-मन्‍दों से मुआफ़ी माँगे लेता हूँ, एडवान्स में। एक बात और, ब्रीफ़िंग के मेरे लहजे से, न मेरे बारे में कोई ऐसे-वैसे खयाल पालें और न उनके बारे में। दूसरों की कही बातों को अपनी जुबान परोसने में उन्नीसा-बीसा तो होता ही रहता है। कुछ-कुछ वैसा ही जैसा कि हमारी उन इन्सटिट्यूशन्स तक में हो जाता है जिन्हें अचानक से सुर्खियों में आयी हजारे-टीम आज-कल ‘डेमोक्रेटिक पंचायत’ के नाम से बुलाती है।

जाहिराना तौर पर, उनके अरण्य-रोदन का पूरा फोकस राष्‍ट्रीय अस्मिता पर था। पर, यह इश्यू है बड़ा कन्फ़्यूजन-दायी। देखिए ना! उनकी पहली ना-खुशी इस छोटी सी खबर पर फोकस्ड थी कि इण्डियन रेल्वे ने अपनी कुछ ट्रेनों के पाखानों में नेशनल एम्बलम की ऐसी गत बना डाली कि बड़े से बड़े ‘धुर्रे-उड़ाऊ’ पॉलिटिकल लीडर को भी अपने धुर्रे उड़ गये महसूस हो गये — खुद का इतना ना-काफ़ी साबित हो जाना इससे पहले उन्होंने कभी महसूस नहीं किया था। वैसे, वेस्ट-सेण्ट्रल रेल्वे के जिम्मेदार अफ़सरान ने इनकी शर्मिन्दगी को कुछ हल्का जरूर कर दिया। इन अफ़सरान का कहना था कि रेल्वे के मोनो का इस्तेमाल हर उस प्रॉपर्टी पर किया जाता है जो रेल्वे की मिल्कियत में होती है। फिर भले ही, रेल्वे का सफ़र करने वाले केवल चुनिन्दा हैसियत-मन्दों द्वारा इस्तेमाल में लाया जाता हो, रेल्वे-टॉयलेट्स का टिश्यू पेपर आखिर होता तो रेल्वे की प्रॉपर्टी ही है ना?

यानि, शियर शेड ऑफ़ कन्फ़्यूजन। इसको लेकर वैश्‍विक दर्शन का एक सूत्र देने की अकुलाहट रोके नहीं रुक रही है। मेरे इस सूत्र की पैदाइश एक फिल्मी गीत से हुई है जो अपने समय में बड़ा पॉपुलर हुआ था। ठीक उसी तरह जैसा कि गुड़ के बारे में कहा जाता है कि कोल्हू उसका बाप है! उस गाने की एक लाइन कुछ ऐसी थी — जितना जिसका दामन था उतनी उसको सौगात मिली। वैसे, जिस किसी के दिल में कोई कन्फ़्यूजन रेंग रहा हो उससे यह कहने में मुझे कोई ऐतराज नहीं कि वह यह मान लेने के लिए आजाद है कि मेरा वह परिचित ही मेरे इस दर्शन का बाप कहलाने का असली हक़-दार है।

आपको याद होगा, हजारे-टीम के कमोबेश हर मेम्बर पर आरोप लगाये गये थे। इन आरोपों ने शायद हजारे को कन्फ़्यूज करके रख दिया। इतना कि वे खुद भी राजनीति के उसी भटकाव के शिकार हो गए जिसकी आलोचना करते हुए ही वे ताजे ऊँचे मुकाम पर पहुँचे थे। अरे, इतना भी नहीं समझे? मुझे लगता है कि आप भूल गये हैं कि अपनी सफलता के दामन के खासे विस्तार से, फुगावे के शिकार हो गए, अन्ना ने यह घोषणा कर डाली कि वे देखेंगे कि उनकी टीम में दलित, मुस्लिम और आदिवासी जैसे तमाम वर्गों को प्रॉपर रिप्रजेण्टेशन मिले!

यों देखें तो, हर एक पब्लिक फ़िगर की निहायत अपनी ‘मास कम्पल्शन’ होती है। जैसे कि, वे उमर अब्दुल्ला जिनके बारे में बहुत सेफ़ली कहा जा सकता है कि उनके और हजारे के बीच ३६ का आँकड़ा है। उन्हीं उमर ने बीते दिनों ट्वीट किया कि यदि वे अफ़जल को बचाते तो बड़ा बवाल खड़ा हो जाता। गोया, उन्हें रंज हुआ हो कि ऐसा नहीं करके उन्होंने एक बड़ा बखेड़ा मोल ले लिया है। खामख़्वाह ही!

(०४ दिसम्बर २०११)