सुजान होते जड़मति

नेहरू खानदान ने सत्ता-सरोवर से जल-संग्रह करने के लिए अनेक रस्सियाँ नीचे डाली और ऊपर खींची हैं। लेकिन अनुभव और अभ्यास की कमी हमेशा आड़े आती रही। हालात अब बदले हैं प्रेक्‍टिस मेक्स मैन परफ़ेक्‍ट!

उस दिन घर से निकला तो पटिया-महफ़िल पर हाजिरी देने की नीयत से था। मंशा सौ टका साफ थी — ज्ञान बाँट कर वाह-वाही लूटूँगा। लेकिन डेस्टिनी की मंशा कुछ और थी। सो, गली के छोर तक पहुँचने से पहले ही ज्ञान-बटौअल की निरर्थकता के बोध से घिर गया।

हुआ यह कि मेरी गली में एक मास्साब भी रहते हैं। जनाब ‘राइट टु एजुकेशन’ का सरकारी निचोड़ ठीक-ठीक समझ गये हैं। स्कूल-शिक्षा के इस सरकारी मूल भाव को ब-खूबी समझ गये हैं कि सरकार अधिक से अधिक जन-संख्या को ‘शिक्षितों’ की लिस्ट में जोड़ना चाहती है। जॉब तो शिक्षा के सरकारी कारखाने में करते हैं लेकिन ड्यूटी घर पर ही देते हैं। इनकी लालटेन स्कूल चल निकली है। इतनी कि इनकी दो सन्तानें एजुकेशन हब के बड़े शहर की एक नामी-गिरामी कोचिंग इन्सटिट्यूट में कैरियर गारण्टी स्कीम का सुख लूट रही हैं। मैं जब इनके मकान की छाया के नीचे से पास हो रहा था तब इनके खिरके का ताजा बैच छूटा था। महसूस हुआ जैसे छात्र बेचैन थे। बेचैनी असन्‍तोष की थी। लगा, मास्साब ने जो पढ़ाया था उससे उनके पैसे वसूल नहीं हो पा रहे थे। मस्साब उन्हें पढ़ने की बारीकियों से जुड़ा प्रवचन दे रहे थे। समझा रहे थे कि समझना धीरे-धीरे ही पूरा होता है। अपनी बात को उन्होंने पुरखों की वाणी में समझाया भी था — करत-करत अभ्यास से जड़-मति होत सुजान!

स्कूल में एडमीशन लेने के बाद जेब ढीली करके पढ़ने के लिए घर पहुँची भीड़ को उनकी इस उक्‍ति से कितनी तसल्ली मिली यह परखने का टाइम मेरे पास नहीं था। लपकते हुए ठीये पर पहुँचा। लेकिन सड़क नापने की हड़बड़ी में ज्ञान बाँटने का उत्साह धूल-धूसरित हो गया था। पूरे समय बुझे मन से बैठा रहा। वह भी एक ही आसन में। एक पटिये-बाज ने इसे फ़ील भी किया। शिकायती लहजे में झल्लाया कि यह क्या यार, जब से आये हो ऐसे बैठे हो जैसे एकासना पर हो! माफ़ी माँग कर लौटने को तो लौट आया लेकिन थोड़ी देर में जान गया कि अपनी नींद वहीं पटिये पर या फिर रास्ते में कहीं टपका आया था। सारी रात खयालों की गलियों में भटकता रहा। खयाल भी बड़े आड़े-तिरछे। लेकिन सभी में एक फ़ैक्‍टर कॉमन था — रस्सियों की रगड़ ठोस से ठोस पत्थर पर भी अपनी छाप छोड़ देती है। वह कहते हैं ना! निरन्तर किये गये अभ्यास से जड़ से जड़-मति भी ज्ञानी हो जाती है।

बात-बात में राजनीति की बू सूँघने के माहिर ज्ञानियों को मेरी इस सिम्पिल सी बात में भी अमर सिंह की खिल्ली उड़ती दिखेगी। अरे, मेरा मतलब यह नहीं है कि मुलायम और सोनिया के बीच चले पॉलिटिक्स के फ़्रैण्डली मैचों में फुटबॉल बना रहा आया यह बन्दा दिमाग से ठस चट्‍टानी है। लेकिन, चाह कर भी मैं सियासती पण्डितों के इस कन्क्लूजन को झुठला तो नहीं ना सकता हूँ कि ढेरों रिग्घे खा चुकने के बाद भी राजनीति की ठीक-ठीक नब्ज इस भाई के हाथ नहीं लग पायी है। यानि, मुझे अमर की याद नहीं आयी थी। इसलिए कि, आपकी तरह ही मुझे भी कई बार ऐसा लगा है कि अमर सिंह तो बार-बार न जाने कितनी पुरानी इस कहावत को झुठला चुके हैं।

राजनीति के रिग्घों से याद आया। अमर के उलट, ओछे समझ पड़ने वाले सियासती फण्डों के सहारे यूपी की महारानी बन बैठी मायावती अब मेच्योर हो चुकी दिखती हैं! लेकिन मेरी बात का मतलब यदि यह निकाल रहे हों कि इसकी आड़ में मैं माया को जड़-मति ठहराने पर तुला हूँ तो एक बात अपनी गाँठ में बाँध लें कि ऐसी ढेरों फुस-फुसाहटें मैं सुनी भर हैं। मेरा दिल इन पर भरोसा करने को आतुर भी रहता है। लेकिन, दिल के करने और दिली ख़्वाहिश को पब्लिकली एडमिट करने में खासा डिफ़रेन्स है। मैं इस फ़र्क को पाटने की रिस्क उठाऊँगा भी नहीं।

दिली ख़्वाहिश को मेरे इस तरह से एडमिट करने से आपको लग सकता है कि मैं कुछ लोगों के दिलों में उठ रही ख़्वाहिशों की घनघोर हिलोरों की तान छेड़ूँगा। इनमें से कुछ २०१३ के इलेक्शन्स के बनते माहौल का जिक्र करेंगे और चाहेंगे कि मेरी बात को बीजेपी की प्राइम मिनिस्टीरियल इन फाइट से जोड़ कर दिखा दें। ठीक है। प्रॉबेबिल फ़र्स्ट टू कण्टेण्डर्स में शामिल पार्टी में यह मेनिया आज-कल अटा पड़ा है। लेकिन यही तो डेमोक्रेसी है। प्रॉबेबिलिटी में ही तो ख़्वाहिशें पनपती-बढ़ती हैं। जीरो पॉसिबिलिटी में डेमोक्रेसी क्या खाक फलेगी-फूलेगी? पासवान और लालू के बीच की बीते दौर की पर्सनालिटी कन्फ़्लिक्‍ट हो या बीएसपी की ताजी अन्दरूनी सिर-फुटौअल, दोनों यही तो प्रूव करती हैं। और हाँ, अग्निवेशी अल्टी-पल्टी हो या राजेन्दर सिंह और राजगोपाल का अन्ना से मुँह मोड़ना। इनमें भी तो इसी प्रॉबेबिलिटी बम का पलीता लगा था। फिर, यूपी इलेक्शन के ठीक पेश्‍तर कांग्रेसी महाभारत को इससे अलहदा किसी दूसरे व्यू-प्वाइण्ट से कैसे जज किया जा सकता है?

यों, निगाह रखने वालों को कांग्रेसी महाभारत केवल ताजा-ताजा और यूपी के जंगे-मैदान तक सीमित रहा नहीं दिखता। इसकी बोनी तो तभी हो गयी थी जब अनुभव की कमी की बेचारगी में आला-कमान को सत्ता की बागडोर अपने एक अदना से सरदार के हाथ में सौंपनी पड़ी थी। कहते हैं कि तब से लेकर अब तक नेहरू खानदान ने सत्ता-सरोवर से जल-संग्रह करने के लिए अनेक रस्सियाँ नीचे डाली और ऊपर खींची हैं। ईमानदार पॉलिटिकल क्रिटिक की ढेरों झोलियाँ उन एग्जाम्पल्स से भर जायेंगी जिनमें पार्टी-लेड सरकार की सबसे तीखी क्रिटिसिज़्म या तो पार्टी-हेड ने या फिर वली अहद ने की। देश को तो नहीं लगा लेकिन खासुल-खास चमचों को कई बार लग चुका है कि सत्ता-स्नान लायक जल अब इकट्‍ठा हुआ कि तब। लेकिन अनुभव और अभ्यास की कमी हमेशा आड़े आती रही है। हालात अब बदले हैं। वली अहद का लेटेस्ट वोट-कैचिंग यह डायलॉग गली-गली में पॉपुलर हो गया है कि काला धन वापस लाने के लिए किये गये प्रयास ना-काफ़ी हैं, इन्हें बढ़ाना होगा।

टु बी सेफ़, अपनी बात को मैं अंग्रेजी जुबां में दुहराता हूँ — प्रेक्‍टिस मेक्स मैन परफ़ेक्‍ट!

(११ दिसम्बर २०११)

1 comment

    • manoj pathak on February 17, 2012 at 1:45 pm

    namaste dr. sahab ab se aapke vichar lagatar padunga

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