आदत से लाचार

यूपीए प्रेसीडेण्ट और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया ने भ्रष्‍टाचार, विदेशों में काले धन या जुडीशरी, आरटीआई, जाँच एजेन्सियों और आयोगों के सशक्‍तिकरण जैसे मसलों को १५वीं लोक-सभा में एक बार भी नहीं उठाया!

सात दिनों के बाद २५ दिसम्बर है। २५ दिसम्बर याने दुनिया के एक बड़े भाग के लिए बड़ा दिन। यों वह साइन्स भी, जिसे दुनिया का यह बड़ा भाग बाकी के तमाम मामलातों में ‘ट्रुथ’ का इकलौता रिलायबिल सोर्स ठहराता फिरता है, इस दिन के पास खुद को ‘बड़ा’ कहलाने का कोई ग्राउण्ड नहीं ढूँढ़ पाया है। फिर भी, हिन्दोस्तां में रह कर मैंने समझा है कि साल कोई हो, इस बड़े भाग के लिए २५ दिसम्बर का दिन सदा ही बड़ा दिन होता है। किसी-किसी का तो यह भी कहना है कि दुनिया भर में फैली पड़ी मारा-मारी का सबसे बड़ा कारण यही है कि प्लेनेट अर्थ पर इसे होमोसेपियन्स का अनचैलेंज्ड फिनॉमिना बना दिया जाए।

वैसे, दुनिया-जहान की सारी कल्चर्स का अनचैलेंज्ड फ़ैक्‍टर कुछ और ही है। वह यह कि, नये साल का इस्तकबाल करने के नाम पर, दुनिया-जहान का हर इण्टेलेक्चुअल गुजरने की दहलीज पर खड़े साल के चुनिन्दा ईवेण्ट्स की जुगाली करने को अपना फ़र्ज मानता है। हाँ, मौके को केलकुलेट करने के लिए जुगाली का मुहूर्त हर कोई अपनी-अपनी कल्चर के हिसाब से निकालता है। ऊपर वाले ने थोड़ा-बहुत, जितना भी, अक़्ल का कोटा मुझे दे रखा है उससे मेरी समझ यह बनी है कि २५ दिसम्बर को बड़ा दिन मानने वाली दुनिया के कैलकुलेशन में बड़ा दिन साल का शुरूआती दिन नहीं है। यह दिन तो डूबते साल की आहट भर देता है। इस दुनिया के लिए नए साल का आगाज़ १ जनवरी से होता है।

खैर, न जाने कब से मुझे लगता रहा है कि अपनी जात दिखलाते हुए मैं इस परम्परा में अपनी टाँग घुसेड़ ही डालूँ। बस, हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। लेकिन आप तो जानते ही हैं, हर जात की अपनी एक आदत भी होती है। बल्कि, बोल-चाली सचाई यही है कि इस ‘जात’ का इजाफ़ा ‘आदत’ नाम की इसी खाज से हुआ है। सो, इसी आदत से मजबूर मैंने आप सबको यह बतलाने का रेजुलूशन लिया है कि बीते साल के लेखे-जोखे के लिए २५ दिसम्बर से बेहतर समय का कोई दूसरा पड़ाव हो ही नहीं सकता। मेरे पास अपनी यह जात दिखाने का मॉडर्न तर्क भी है — दुनिया प्रोग्रेस कर चुकी है। और, दकियानूसी खयालों को दर-किनार करना प्रोग्रेस करती दुनिया का पहला फ़र्ज हो गया है।

मेरा दिया बीते साल का लेखा-जोखा हो और उस पर जात का मुलम्मा भी हो तो मुझसे खुन्नस खाए बैठे कुछ लोग खुद-ब-खुद बेचैन होंगे कि मैं दिग्गी के आदम-कद पोस्टर पर कालिख पोतूँगा ही पोतूँगा। अकेला मैं ही नहीं, पूरी दुनिया उनके इस डर से वाक़िफ़ है कि कांग्रेस महासचिव के इस जनरल सैक्रेटरी ने ऐसी ढेरों अपारचुनिटीज़ परोसी हैं। लेकिन मैं उन्हें निसा-ख़ातिर करना चाहता हूँ कि मैं राघोगढ़ के बीते जमाने के गढ़-पतियों के इस वंशज के उस बवाली ट्वीट को भी कोट करूँगा ही करूँगा जिसमें उसने संसद्‌ की कार्यवाही को अपनी ही अरई से हाँकने की कांग्रेसी नीयत के ऑवियस रिजल्‍ट का ठीकरा अपोजीशन के माथे फोड़ने के लिए जो कुछ लिखा था उसका लब्बो-लुबाब था — संसद्‌ का एक दिन और जाया हुआ। २००४ से संसद्‌ में मार्शलों का इस्तेमाल नहीं हुआ। अब उनके इस्तेमाल का वाजिब वक़्‍त आ गया है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के उस बयान के जिक्र से शुरूआत करूँगा जिसे जैम ऑफ़ दि ईवेण्ट्स का दर्जा दिया जा सकता है। खबरों के अनुसार न्याय-मन्दिर में भ्रष्‍टाचरण की आम होती बहस पर उनकी टिप्पणी का सार था कि जजों के लिए जवाब-देही से ज्यादा जरूरी है कि कोई उनकी निष्‍ठा पर सवाल न उठाए। वैसे, अन्दर-खाने कराये अपने सर्वे में मैंने पाया है कि फ्रांस में मीडिया से बात करते हुए हमारे पीएम ने जो यह ग्रेट इण्डियन सीक्रेट उजागर किया था कि कीमतें तो बाजार ही तय करता है यदि उसे ‘पैसे पेड़ों पर नहीं ऊगते’ जैसे उनके दूसरे खुलासे के लगे हाथों लगाये गये तड़के के साथ जोड़ा जाए तो यह बयान भी सबसे बड़े ईवेण्ट का बराबरी का कण्टेण्डर हो जाता है।

दोनों हाथों सत्ता-सुख लूट रहे पॉलिटीशियन्स द्वारा गाहे-बगाहे किये जाने वाले खुलासों से एमपी के सीएम रह कर महज प्रॉविन्‍शियल मिनिस्‍ट्री से सैटेस्फाई हो जाने वाले गौर साहिब की याद ताजा हो गयी। एक सेमीनार में जब वे बिफर उठे तब खुले आम खुलासा कर दिया कि अफ़सरों में सरकार का कोई डर नहीं रह गया है। उन्होंने फ़रमाया कि अफ़सरान इस क़दर बे-खौफ़ हो गये हैं कि सरकार उनके आगे मजबूर हो कर रह गये हैं! अफ़सरानों के जिक्र से एक आईएएस अफ़सर का अनोखा वाक़या याद आ गया। खबर थी कि हरियाणा का यह सीनियर आईएएस मेट्रो स्टेशन पर एन्क्रोचमेण्ट हटाने गया तो इकट्‍ठा हुई भीड़ ने औरतों को आगे कर जूतों से पीटने की धौंस दी। लगता है कि बन्दा हरियाणवी पॉलिटीशियन्स से इन्सपायर्ड था। सो, उसने अपना जूता उतार लिया और लगा खुद ही को सिर पर जूते मारने — तुम क्या मारोगे, देखो मैं खुद ही मार कर दिखलाता हूँ।

वैसे, खबरों की खबर एक और भी है। मीडिया के सौजन्य से दुनिया ने न जाने कितनी बार देखा है कि हर हाईनेस आला-कमान और उनके वली-अहद ने भ्रष्‍टाचार का नामो-निशां मिटाने के कितने बुलन्‍द दावे किये थे! उनके लगुओं-भगुओं ने भी, अपनी पार्टी के इकलौते मरद के नाम पर, न जाने कितनी बार शपथ उठाई थी। अब, आप कहेंगे कि इसमें ‘खबर’ क्या है? ठीक कहते हैं। यह तो महज राजनैतिक चोचला है। पर मेरे अजीज, इसमें एक ‘खबर’ की भूमिका जरूर है। और, वह खबर यह है कि यूपीए प्रेसीडेण्ट और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया ने भ्रष्‍टाचार, विदेशों में जमा काले धन के या जुडीशरी, आरटीआई, जाँच एजेन्सियों और आयोगों के सशक्‍तिकरण जैसे मसलों को १५वीं लोक-सभा में एक बार भी नहीं उठाया! हाँ, उनके वली-अहद का अकाउण्ट स्लाइटली डिफ़रेण्ट है। दरअसल, उन्होंने एक बार भ्रष्‍टाचार व जाँच एजेन्सियों को मजबूती देने के मुद्दे को शून्य-काल में उठाया था।

(१८ दिसम्बर २०११)