सुरूर की जुगाली

हैंग-ओवर यानि जली हुई रस्सी की ऐंठन। कहते हैं पार्लियामेण्ट की लोकपाल वाली स्टैण्डिंग कमेटी के मुखिया सिंघवी जब हर बैठक देर तक चलाने लगे तो लालू ने घोर ऐतराज जतलाया — वे सांसद्‌ हैं ग़ुलाम नहीं।

आज २५ दिसम्बर है। होली क्राइस्ट का हैप्पी बर्थ डे। सातों कॉण्टिनेण्ट्स में उत्सव का माहौल है। ठीक सात दिनों बाद क्रिश्‍चियन कैलेण्डर के नये साल की शुरूआत हो जाएगी। ईशू के जन्म-दिन को मनाने वाली दुनिया इस तारीख की रात को भी उत्सवी माहौल में सैलीब्रेट करने की आदी है। हफ़्ते भर के छोटे से पीरियड में सैलीब्रेशन के इतने बड़े दो-दो कारण मिल जाएँ तो नॉन-स्टॉप खुशियों की सूझती ही सूझती है। लेकिन मैं अपनी किस्मत में कुछ उल्टा ही लिखा कर जन्मा लगता हूँ। होता यह है कि जब-जब दुनिया में खुशी का कोई जाम छलकता है, एक न एक जल-कुकड़ा अपनी जली को बुझाने मुझे धर दबोचता है। आज भी मेरी पर्सनल हिस्ट्री ने खुद को रिपीट किया।

इस सारे चक्कर में मेरी गत ‘इन्सान’ कम और ‘ओपन फ़ॉर आल लैटर-बॉक्स’ ज्यादा होकर रह गयी है। आपको बताऊँ, उस निरीह से बक्से से भी गयी-गुजरी। बनाने वाले ने इस बक्से को तीन प्रिविलेज तो दिये हुए हैं। पहला यह कि जो बक्से के लिए ओवर-साइज़ है, यह उससे हण्डरेड परसेण्ट सेफ़ रहेगा। दूसरा यह कि ऊपर तक भर जाने के बाद इसमें कुछ भी और ठूँसा नहीं जा सकता। और, तीसरा यह कि जो कुछ भी ठूँसा जाए, उस पर इस बक्से से किसी निजी प्रति-क्रिया की अपेक्षा नहीं की जाती। लेकिन मेरे जैसा संकोची इन्सान! बनाने वाले ने बड़ा बद-किस्मत बनाकर भेजा है — घेर लो और जब या जितना चाहो, ठूँसते जाओ। ऊपर से, चुप्पी भी नहीं बाँधे रह सकता हूँ। पता नहीं, ऐसा सोचना जायज है या नहीं लेकिन कई बात तो यह फ़ीलिंग तक हुई है कि कहीं मैं डेमोक्रेसी की उन बेबस पर्लियामेण्ट्स की सी किस्मत लेकर तो नहीं पैदा हो गया जिनको अपने फ़्लोर पर, रिप्रजेण्टेटिव बहस के नाम पर, ज्यादातर संख्या-बल की इल-लॉजिकल बकवास ही पचानी होती है।

खैर, अपनी किस्मत की इस एण्ड-लैस खूबसूरती का क्या रोना? सीधे मुद्दे पर आता हूँ। घड़ी ‘बड़े दिन’ की रात की शुरूआत होने की मुनादी करे इससे पहले ही वह मेरे घर आ धमका। मुनादी भी कर दी कि सारी रात टलेंगे तो नहीं ही, मेरी खोपड़ी पर तबला भी पीटेंगे। लिहाजा, मेरी सहमति-असहमति की फिकर किये बिना, उनका वन वे ट्रैक सारी रात नॉन-स्टॉप चला। उदाहरण पर उदाहरण पटक दिए। न्यू इयर ईव पर किस तरह सड़कों पर खुली हुड़-दंग होती है। कानून की आँखों से हुड़-दंगियों की आँखें कितनी विशाल और इफ़ेक्टिव होती हैं। कानून का पालन कराने वाले, किस तरह, या तो वसूली के सालाना कोटे की भरपाई करते हैं या फिर चन्द घूँटों के सुरूर में किसी गरम कोने में दुबक जाते हैं। लेकिन, अपनी पॉजिटिव एप्रोच को जिन्दा रखते हुए, मैंने उसकी कही सारी बातों को ट्रू स्पिरिट में कुछ इस तरह से लिया कि उसका सैण्ट्रल आइडिया डुअल प्राँग्‍ड था जिसके एक तरफ खीझ थी कि ऐसे इम्पोर्टेड सैलिब्रेशन्स तमाम सिविक ईक्वीलिब्रियम्स डग-मगा देते हैं और दूसरी ओर चिन्ता कि इनका हैंग-ओवर जरा ज्यादा ही लास्टिंग होता है। इतना कि, बासेरा कहें या उतारा, कई घण्टे नहीं कई-कई दिन चलता है। महुआ-महारानी के जोश में चलती गाड़ियों की आपसी टक्कर तो ठीक, खाली रोड के डिवाइडर्स से एक्सीडेण्ट्स की खबरों से नये साल के सारे न्यूज़-बुलेटिन्‍स अटे पड़े रहते हैं।

यों, मेरा पर्सनल नॉलेज बिल्कुल जीरो है। लेकिन, मुझे समझाया गया है कि उतारे या हैंग-ओवर को समझने के लिए उसका ठेठ देशी एक देशी ट्रांसलेशन भी है — सुरूर की जुगाली। जानकारों की यह बात मुझे जम भी गयी है। इस तरह से देखने पर किसी बात को समझने की सहूलियत मिल जाती है क्योंकि इसमें आपकी बुद्धि के साथ ही कई बार दूसरे के एक्सपीरिएन्स या पास्ट के बैक-ग्राउण्ड की नॉलेज भी आपकी मदद करती है। वैसे, देख रहा हूँ कि आपको मेरी बात पच नहीं रही है। लेकिन मेरी प्रॉब्लम यह है कि उस भाई के दिए एग्जाम्पिल्स में से एक को भी खुले-खजाने कोट नहीं कर सकूँगा। तो क्या? फिकर नॉट! और भी बहुत कुछ है जो अखबरों में पब्लिश हो चुका है। उसी से ये कुछ बानगियाँ देखें —

बानगियों के नाम से पहले नम्बर पर देश की पार्टी नम्बर वन के एमपी के सदर भूरिया जी की याद तो आनी ही थी जिन्होंने सूबे के ऑफ़िस-बियरर्स की बैठक में बेबसी से जैसे रो ही दिया था। नहीं, यह नहीं कि उन्होंने कहा था कि वे उन सबकी ‘सीआईडी’ एन्क्वायरी करायेंगे क्योंकि वे जानते हैं कि उनके अपने आदमी ही दुश्मनों को पार्टी की कमजोरियाँ बतलाते रहते हैं — इसका हैंग-ओवर से क्या लेना-देना? दरअसल, इसकी वजह जरा दूसरी है। कहते हैं कि अपने एक्सपीरिएन्स के हिसाब से उन्होंने आगे यह भी जोड़ दिया था कि उन्हें पपलू नहीं बल्कि मर्द ही चाहिए!

एक्सपीरिएन्स से वली-अहद भी याद आ ही गये। बाबा गांधी के बारे में और चाहे जितने कन्फ़्यूजन हों, इस बारे में कोई भरम नहीं है कि वे जन्म के समय भी मुँह में सोने की चमची लेते आये थे। गोद में रहते हुए से ही उन्होंने देख लिया था कि उनकी ड्योढ़ी के सामने चाहत के हाथ जोड़े खड़े हुओं की भीड़ कभी खत्म नहीं होती थी। तब, वे डेमोक्रेसी की चाहत को समझने लायक तो थे नहीं। शायद इसीलिए, ड्योढ़ी से उन सबको मिलते बर्ताव से, बालक-मन ने मान लिया था कि जिसे कुछ भी चाहिए वह बस भिखारी होता है। मिशन यूपी की शुरूआत करते हुए ‘कब तक भीख माँगेगे यूपी के युवा’ जैसा सवाल बाबा ने शायद इसी हैंग-ओवर में कर दिया था। स्लिप ऑफ़ टंगू!

कहते हैं, हैंग-ओवर का दूसरा नाम जली हुई रस्सी की ऐंठन भी है। हाथ कंगन को आरसी क्या? कहते हैं कि पार्लियामेण्ट की लोकपाल वाली स्टैण्डिंग कमेटी के मुखिया सिंघवी जब हर बैठक देर तक चलाने लगे तो लालू ने घोर ऐतराज जतलाया — वे सांसद्‌ हैं, ग़ुलाम नहीं।

(२५ दिसम्बर २०११)