कोर्ट जाकर साबित करो : हत्यारा कौन?

२९ दिसम्बर की मध्य रात्रि जो कुछ भी हुआ वह लोक-तन्त्र के प्रति किया गया निकृष्‍टतम अपराध था। आज जो कुछ होता दिख रहा है वह भी लोक-तन्त्र के प्रति किया जा रहा उतना ही जघन्य अपराध है।

यों, लोक-तन्त्र एक भाव मात्र है। कहें तो, शाब्दिक रूप से विशुद्ध अमूर्त। फिर भी, गाहे-बगाहे ऐसे स्वर उठते रहते हैं कि लोक-तन्त्र का दमन कर दिया गया, गला घोंट दिया गया, हत्या कर दी गयी! इसमें दो मत नहीं कि हमारे देश में उठते ऐसे नारे अधिकांश बार बड़े सतही होते हैं। केवल ओछे राजनैतिक स्वार्थों से प्रेरित। किन्तु कुछ ऐसे अवसर भी उपस्थित हुए हैं जब यह आशंका सच में ही गहराई थी। ऐसा कहने का इकलौता कारण यह है कि इन अवसरों पर अधिकांश देश-वासी अपने अन्‍तर्मन की गहराई में यह सोचने, और मानने को भी, विवश हुए थे कि लोक-तन्त्र का गला घोंटा गया था। गिने-चुने लोगों की असहमतियों के बाद भी बीते सप्‍ताह भर से देश में यही माहौल नये सिरे से बना है। कहा जा रहा है कि २९ दिसम्बर की मध्य-रात्रि में राज्य-सभा में लोक-तन्त्र की हत्या कर दी गयी।

लोकपाल विधेयक को पारित करने के नाम पर विशेष रूप से बढ़ाये गये सत्र के अन्तिम पलों में देश के उच्च सदन में जो कुछ भी हुआ, संविधान और संसदीय कानून व व्यवस्था के जानकारों की एक बड़ी संख्या ने, उसे ‘मिड नाइट ड्रामा’ कहना शुरू कर दिया है। ऐसा ड्रामा जिसकी स्क्रिप्‍ट उसके मंचन से पहले ही आम जन के हाथ लग चुकी थी। ऐसा ड्रामा जिसकी स्क्रिप्‍ट के चुनिन्दा अंशों को मुखर विपक्षियों ने सदन के फ़्लोर पर ही उजागर भी कर दिया था। इसमें यह भी शामिल था कि नाटक का पटाक्षेप किस तरह का होगा! विधेयक को निर्णायक रूप से पारित किये बिना ही सदन का बलात्‌ सत्रावसान कर दिये जाने के बाद सरकार-विरोधियों के स्वर और भी मुखर हो गये हैं। अब तो संसदीय परम्परा के जानकारों का खुला समर्थन भी इन्हें मिलने लगा है।

वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता और राज्य-सभा में नेता प्रति-पक्ष अरुण जेटली ने जहाँ इसे देश के इतिहास की सबसे बड़ी संसदीय धोखा-धड़ी ठहराया है वहीं लोक-सभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप ने इसे संसद्‌ के इतिहास पर एक बद-नुमा धब्बा तक कहने में कोई संकोच नहीं किया। टीम अन्ना के सदस्य, पूर्व केन्द्रीय कानून मन्त्री और वरिष्‍ठ संविधान-विशेषज्ञ शान्‍ति भूषण का कहना है कि सदन की कार्यवाही को जारी रखने या उसका समापन करने का निर्णय लेने में अध्यक्षीय पीठ को सरकार की मंशा की नहीं बल्कि सदन के बहुमत के निर्णय की दरकार होती है। अन्य औसत स्थितियों में भले ही इस तर्क को स्वीकारने या इसकी उपेक्षा करने पर वाद-विवाद की गुंजाइश हो लेकिन सन्दर्भ-विशेष में जारी संसदीय बहस की पूर्णता के बिन्दु पर सुभाष कश्यप और शान्ति भूषण के दृष्‍टि-कोण को नकारा नहीं जा सकता है। अतीत में ऐसे एकाधिक अवसर आये हैं जब राज्य-सभा जैसी ही स्थितियों में सदन के काम-काज को अबाधित रूप से बढ़ाया जाकर अधूरी बहस को पूरा किया गया था।

दोनों ही संविधान-विशेषज्ञों का कहना है कि विधानत: राष्‍ट्रपति की अनुमति तो केवल सत्र के आवाहन के लिए आवश्यक है। बाकी के लिए संसदीय कानून और परम्पराएँ हैं। परम्परा है कि जहाँ सदन के काम-काज का निश्‍चय उसकी बिजनेस एडवाइजरी कमेटी करती है वहीं उसके समापन का निर्णय स्वयं सदन का विशेषाधिकार है। और, ‘सदन’ का तात्पर्य सदन का स्पष्‍ट बहुमत ही है, इसे किसी व्यक्‍ति-विशेष अथवा समूह-विशेष में निहित नहीं किया जा सकता है। असन्‍तुष्‍टि में, अध्यक्षीय पीठ पर उँगलियाँ अनेक बार उठी हैं। लेकिन प्राय: प्रत्येक अवसर पर सारा विवाद ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। जाहिर रूप से, इसके दो ही कारण रहे हैं — पहला यह कि ऐसे आरोपों पर अध्यक्षीय पीठ और सदन, दोनों का ही रुख बड़ा कठोर रहा और दूसरा यह कि किसी न किसी कारण से आरोप मढ़ने वाले ने अपने कदम पीछे खींच लिए।

सबसे ताजा उदाहरण लोक-सभा के इसी शीत-कालीन सत्र में देखा जा सकता है। लोकपाल विधेयक को स्वीकारने अथवा अस्वीकारने को लेकर हुए मतदान के बाद सदन में असन्तोष के जो स्वर उठे थे उनका सार यह था कि मतदान के आरम्भ होने के बाद भी सदन की लॉबी के द्वार सदस्यों के प्रवेश के लिए खुले रखे गये थे। तात्‍पर्य यह था कि ऐसा पक्ष-विशेष को मजबूती प्रदान करने के लिए किया गया। यह भी कहा जा रहा था कि पर्चियों की अबाध खुली आवक-जावक भी हुई। तब अध्यक्षीय पीठ से कठोर प्रतिक्रिया व्यक्‍त की गयी कि ऐसे स्वर अध्यक्षीय पीठ की निष्‍पक्षता को आँच पहुँचा रहे हैं। लहजा बिल्कुल स्पष्‍ट था — ऐसे स्वरों को सहन नहीं किया जायेगा। इसके बाद सारा मामला ठण्डे बस्ते में चला गया। सम्भवत: इसलिए कि इन स्वरों को जुबान देने वालों को अपने-अपने संसदीय दामनों के भी दाग-दार होने का ठीक-ठीक भान था। या फिर, इसलिए कि उनके पास अपनी चिन्ता को प्रमाणित करने लायक पर्याप्‍त व अकाट्य प्रमाण नहीं थे।

किन्तु, इसी लोकपाल विधेयक पर राज्य-सभा में जो कुछ हुआ उसके पल-पल के प्रमाण सुलभ हैं। जो कुछ हुआ है उस पर अपनी-अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराने वालों के लहजे भी बिल्कुल स्पष्‍ट हैं। उनका दावा भी है कि परम्परा और संविधान, दोनों, उनके साथ हैं। बात के इतने आगे बढ़ जाने के बाद, उसी लोक-तन्त्र की दुहाई है कि इन आरोपों को लगाने वाले असली दोषी को कटघरे में खड़ा भी करें और दण्डित भी कराएँ। इसमें थोड़ी सी भी कोताही का परिणाम केवल यह होगा कि भारतीय लोक-तन्त्र रसातल की उन गहराइयों में डूब जाएगा जहाँ से उसके उबरने की कोई आशा कभी नहीं की जा सकेगी।

यों, व्यक्‍तिगत्‌ स्तर पर मैं इससे असहमति रखता हूँ किन्तु केवल तर्क की सुविधा के लिए यहाँ यह मानने को तैयार हूँ कि सम्भव है कि सदन में स्थान नहीं रखने वालों की यह वैधानिक विवशता हो कि उनके पास सदन की कार्यवाही को न्याय-मन्दिर तक ले जाने, और वहाँ पर उसकी त्रुटियों से जुड़े संवैधानिक सवाल खड़े करने, के अधिकार न हों। लेकिन परिस्थिति इतनी असहाय नहीं है। उच्च सदन में ऐसे सदस्यों का अभाव नहीं है जिनकी गिनती देश के श्रेष्‍ठतम विधि-विशेषज्ञों में होती है, जो शीर्ष अदालत में कानूनी दाँव-पेंच लड़ाते भी हैं और जो २९ दिसम्बर के संसदीय घटना-क्रम के खुले आलोचक भी हैं। इनमें से एक, अरुण जेटली, तो नेता प्रति-पक्ष भी हैं। देश में लोक-तन्त्र की आकांक्षा रखने वाले समूचे जन-मानस का जेटली से सवाल है कि घटना वाली मध्य रात्रि के बाद से जब उनका प्रत्येक पल ‘अलोकतान्त्रिक’ सत्रावसान की बखिया उखेड़ने में ही बीत रहा है, जब वे इस घटना को लोक-तन्त्र की हत्या ठहराते हुए सड़कों पर उतरने की बातें कर रहे हैं और जब देश के जन-मानस को यह दलील देने को अकुला भी रहे हैं कि जो कुछ हुआ है उसने संसदीय परम्परा और संविधान से धोखा-धड़ी की है तब वह इस पूरे मसले को, संविधान की तराजू पर तौलने के लिए, न्याय-मन्दिर क्यों नहीं ले जा रहे?

ऐसा सवाल खड़ा करते हुए मैं किसी भी तरह की द्विविधा में नहीं हूँ। मेरा यह आत्म-विश्‍वास जेटली, शान्‍ति भूषण और सुभाष कश्यप सहित तमाम विधि-वेत्ताओं की उन प्रतिक्रियाओं से उपजा है जिनके निचोड़ में मुझे भ्रमित होने से रोके रखने का पर्याप्‍त माद्दा है।

यहाँ यह स्पष्‍ट करना उचित होगा कि राजनीति की ‘गिव एण्ड टेक’ लिप्‍सा से कतई दूर आम नागरिक के सामने वास्तविक मामला क्या है? लालू कह रहे हैं कि कांग्रेस ने बीजेपी से मिली-भगत करके सारे नाटक को अंजाम दिया तो भाजपा का आरोप है कि सोनिया के निर्देशन में मनमोहन और प्रणव ने लालू से युति करके सारे ड्रामे को अमली जामा पहनाया। जेटली ने इस ‘मिड नाइट ड्रामे’ का नाम-करण ‘फ़्ली डम’ किया। लेफ़्ट से लेकर राइट तक सुर एक ही है — सरकार ने बचने की सँकरी और अनैतिक गली तलाशी। इस आरोप पर कोई विवाद न भी करें तो भी लाख टके का सवाल तो यही है कि आखिर वह कौन है जिसे इस दुर्भाग्य-पूर्ण ड्रामे का यथार्थ विलेन ठहराया जाना चाहिए?

क्या केन्द्रीय सरकार? या माँ-बेटे की कांग्रेसी जोड़ी? सत्ता-सिंहासन पर प्रत्यक्ष कब्जे की कांग्रेस आला-कमान की अन्दरुनी छट-पटाहट बीते दिनों कुछ अधिक ही बे-बाकी से उजागर हुई है। वहीं दूसरी ओर, मनमोहन ने गजब का सत्ता-जीवट दिखलाया है। यही दो कारण हैं कि कांग्रेस की अन्दरुनी कलह अब, अधिक मुखरता से, सड़क पर आने को कुल-बुलाने लगी है। यह संकेत देने की कोशिशें तेज हो गयी हैं कि एनडीए-काल में राज्य-सभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुकने के बाद भी आज के प्रधान मन्त्री का इतना भी राजनैतिक सम्मान नहीं है कि वह सोनिया-राहुल के फ़्लोर मैनेजमेण्ट की दम पर लोक-सभा से पारित होकर पहुँचे एक सरकारी बिल को अपने ही सदन राज्य-सभा में सामान्य से बहुमत से पारित करा सके! उसकी काबलियत पर यह कहते हुए कालिख पोती जा रही है कि, एक योग्य राजनैतिक सौदे-बाज तो बड़ी से बड़ी विरोधी हस्तियों तक को ‘पटा’ लेता है। लेकिन मनमोहन, सहज बिकाऊ राज-नेताओं की तो कौन कहे, लोक-सभा में बिल को पारित करने के अनुकूल व्यवहार करने वाले सहयोगी दलों तक को अपने साथ नहीं रख पाए। देख सकने वालों का दावा तो यहाँ तक है कि उन्हें तख़्त-ए-ताऊस की इस मार-काट में मनमोहन की ओर से होने वाले तीखे पलट-वारों की धुन्धली छवि अभी से दिखने लगी है।

इन्हीं विरोधाभासी फुस-फुसाहटों का सहारा लेते हुए, अपने-अपने लक्ष्य के अनुसार, तमाम राजनैतिक ताकतें प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से इन दो ही सत्ता-गलियारों को घेरने का प्रयास करती दिख रही हैं। जबकि सरकारी मंशा जैसी परदे के पीछे की व्यवहारिक सचाई चाहे जो हो लेकिन वैधानिक सचाई यही है कि विपक्षियों के लक्ष्य बने इन दोनों ही सत्ता-गलियारों पर राज्य-सभा में लोक-तन्त्र का हत्यारा होने का अपराध स्थापित नहीं किया जा सकेगा। इसी समझ के प्रकाश में वह अदृश्य स्क्रिप्‍ट पढ़ी जा सकती है जिसमें लिखा है कि भारी चिल्ल-पों मचा रही समूची राजनैतिक बिरादरी २९ दिसम्बर का बैनर उठाए केवल उन गति-विधियों में क्यों लिप्‍त है जो मात्र ऐसी सम्भावनाओं का निर्माण करती हैं जिन्हें ‘राजनैतिक उपलब्धियाँ’ कहा जा सकता है?

स्वयं कार्यवाही का हिस्सा रहे सांसदों द्वारा मीडिया के माध्यम से बतलाए जा रहे घटना-क्रम और लगाए जा रहे आरोपों-प्रत्यारोपों के प्रकाश में, २९ दिसम्बर के घटना-क्रम की दल-गत्‌ राजनीति से उठ कर की जाने वाली समीक्षा बतलाती है कि खिलाड़ी और मोहरे चाहे जो रहे हों, मिड नाइट ड्रामे का इकलौता विलेन कोई दूसरा नहीं बल्कि केवल और केवल अध्यक्षीय पीठ पर पदेन विराजित रहा, गैर सदस्य, वह व्यक्‍ति था जिसने संविधान में उपलब्ध तमाम प्रावधानों, नियमों और कायदों के साथ ही सर्व-प्रतिष्‍ठित परम्पराओं तक की खुली अवहेलना की थी। सदन से बाहर रह कर जो कुछ भी देखा, सुना और समझा जा सकता था उसने यदि कोई भ्रम नहीं दिया है तो, बिना किंचित संकोच किये, कहा जा सकता है कि उप-राष्‍ट्रपति की वैधानिक हैसियत से सभा-पति की तरह पदेन पीठासीन रहे हामिद अन्सारी ने किसी भ्रम का शिकार होकर भूल नहीं की थी। इसके उलट उन्होंने जो कुछ भी किया था वह बड़े सोच-विचार के साथ किया था। उन्होंने संविधान के प्रति गम्भीर अपराध किया था। अधूरी बहस के ऐसे सहसा समापन से ठीक पहले के घटना-क्रम का सार कुछ इस तरह का है —

सारे अनिश्‍चय के बीच, रात सवा नौ बजे संसदीय कार्य मन्त्री राजीव शुक्ला ने मीडिया से कहा कि सदन को पूर्व-निर्धारित अवधि से आगे बढ़ाने के लिए राष्‍ट्रपति की अनुमति मिलनी आवश्‍यक है। अनिश्‍चितता को हवा देने के लिए ही शुक्ला ने आगे यह भी जोड़ दिया कि ऐसी अनुमति के बिना सदन का समापन स्वयमेव हो जाता है। लोक-तन्त्र की चिन्ताओं से निरी निष्‍ठुर तटस्थता दिखाते हुए यह सारी बातें तब की गयीं जब सदन के भीतर मौजूद, विधेयक के स्वरूप से असहमत, सांसद अपना यह सवाल अध्यक्षीय पीठ तक लगातार पहुँचा रहे थे कि मतदान आखिर कब होगा? मन्त्री जी के इस कथन के साथ ही मीडिया में यह बहस गहरा गयी कि ऐसे सत्रावसान में राष्‍ट्रपति की अनुमति की क्या सचमुच ही कोई भूमिका है भी? इस सवाल की भी पड़ताल शुरू होने लगी कि क्या सरकार ने, या सभापति ने ही, राष्‍ट्रपति से अनुमति का कोई औपचारिक निवेदन किया भी है या नहीं? सारे संकेत यही थे कि मिली-भगत में भ्रम फैलाते हुए, अवसर कबाड़ कर, जैसे भी हो सत्रावसान कर दिया जाए।

सुग-बुगाहटों को भाँपते हुए, अधिकृत समय के पूरा होने से ठीक पहले, सीताराम येचुरी ने व्यवस्था का सवाल उठाया कि सदन चलेगा या १२ बजे उठ जायेगा? सभापति ने अपने सचिवालय के अधिकारी को बुला कर जवाब पूछा। उसने बतलाया कि कार्यवाही जारी रह सकती है। तब सभापति ने १५ मिनिट के लिए सदन को स्थगित कर दिया। कार्यवाही दोबारा प्रारम्भ होने पर उन्होंने सदन को सूचित किया कि मन्त्री कुछ कहना चाहते हैं। संसदीय कार्य मन्त्री पवन बन्सल उठे और जो कुछ बोले उसका व्यवहारिक सार यह था कि सत्र की अवधि तो सरकार ही निर्धारित करती है। सदन की बिज़नेस एडवाइजरी कमेटी केवल यह तय करती है कि इस निर्धारित अवधि में सदन किन-किन मुद्दों को कब और कितना समय दे। इसके बाद राजद सांसद राजनीति प्रसाद नारायण सामी के पास पहुँचे। दिखावे की हल्की सी ‘बात’ की और फिर वहीं लोकपाल बिल की प्रति फाड़ दी।

खबरें आने लगीं कि सांसद ने बिल की प्रति मन्त्री के हाथ से छीन कर फाड़ दी। इसके उलट, कार्यवाही का सीधा प्रसारण देख रहे व्यक्‍तियों को ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा। मन्त्री और सांसद्‌ के बीच का व्यवहार पर्याप्‍त मैत्री-पूर्ण था। झीना-झपटी का एक भी संकेत किसी ने नहीं देखा। इसी बीच यह अनधिकृत खबरें भी आती रहीं कि राज्य-सभा सचिवालय में राष्‍ट्रपति सचिवालय की ओर से कोई एक विशेष एसएमएस भी आया था। उसके बाद मतदान पर अड़ा समूचा विपक्ष, और यूपीए के अन्दर-बाहर के सहयोगी दल भी, एक स्वर से कार्यवाही जारी रखने की माँग करते रहे लेकिन, केवल अपने दिल की सुनते हुए, सभापति ने सदन की कार्यवाही समाप्‍त कर दी।

सच बड़ा कड़वा है — जो कुछ भी हुआ, समान स्थितियों में, वह सत्ता-अधिपत्य के बदलाव में भी हुआ हो सकता था। अर्थात्‌, अन्तर केवल इतना है कि जो आज ‘उसने’ किया इसका शोर ‘यह’ कर रहे हैं किन्तु यदि ऐसा हुआ होता कि वही सब ‘इन्होंने’ किया होता तो ‘वे’ भी यह शोर-गुल कर रहे होते। और यही वह पेंच है जो चुगली खाता है कि सदन की कार्यवाही का हिस्सा रहने और जो कुछ हुआ है उससे बेहद तमतमाए हुए होने के बाद भी देश के श्रेष्‍ठ अधिवक्‍ताओं की इतनी लम्बी फ़ेहरिस्त का एक भी नाम सभापति के निर्णय और इसके पीछे रही उनकी नीयत को न्यायालय में चुनौती देने की बात करने को तैयार क्यों नहीं हो रहा है?

प्रत्यक्ष-परोक्ष निहित स्वार्थ से प्रेरित होकर अध्यक्षीय पीठ द्वारा किये जाने वाले किये जाने वाले पक्ष-पातों की खबरों का इतिहास बहुत लम्बा और दायरा उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्‍चिम तक असीम विस्तृत है। यही राजनीति की अविरल गति है — संवैधानिक पदों पर, विधान-मण्डलों में पीठाधिपतियों के पदों पर ऐसे व्यक्‍तियों को प्रतिष्‍ठित करने के दाँव खेलना। और ऐसा करते हुए यदि घोषित सिद्धान्तों से समझौते भी करना पड़ें तो परहेज नहीं करना। राजनैतिक सौदेबाजी के तहत कांग्रेस के समर्थन से वाम-पन्थियों द्वारा लोक-सभा के अध्यक्षीय पद पर बैठाये गये कामरेड सोमनाथ चटर्जी के सदन-संचालन पर भी निष्‍पक्षता के सवाल खड़े किये गये थे। क्योंकि उप राष्‍ट्रपति के चयन के दौरान हामिद अन्सारी की नाम-जदगी के लिए दबाव बनाने में वाम-पन्थियों ने ही एड़ी-चोटी का जोर लगाया था, राज्य-सभा के ‘मिड नाइट ड्रामे’ ने एक बार फिर से ‘वाम नीयत’ पर गम्भीर प्रश्‍न-चिन्ह चस्पा कर दिया है। दबे-छिपे यह तक कहने के प्रयास हो रहे हैं कि बड़ी जल्दी खाली होने वाले राष्‍ट्रपति पद के लिए नम्बरों की जोड़-तोड़ होने लगी दिखती है।

दरअसल, २९ दिसम्बर की मध्य-रात्रि में जो कुछ भी हुआ वह लोक-तन्त्र के प्रति किया गया निकृष्‍टतम अपराध था। आज भी जो कुछ होता दिख रहा है वह भी लोक-तन्त्र के प्रति किया जा रहा उतना ही जघन्य अपराध है। इसीलिए, लोक-तन्त्र के पुनर्जीवन की आकांक्षा संजोए बैठा हर भारतीय सवालिया निगाह उठाए उस प्रत्येक सक्षम विधि-वेत्ता की ओर ताक रहा है जो २९ दिसम्बर के मिड नाइट ड्रामे को लोक-तन्त्र की हत्या साबित करने की कोशिश में अपना गला फाड़ रहा है। सत्ता हथियाने के हर सम्भव साधन जुटाने को ही अपना ध्‍येय बना चुके राजनैतिक दलों और राजनीतिज्ञों से, फिर वे चाहे जिस बैनर को प्रदर्शित करते पाये जाते हों, उसे कोई आशा नहीं रही है। लोक-तन्त्र मरे या जिए, इनकी बला से। इन्हें तो केवल यह समझ आ रहा है कि २०१४ की जगह २०१२ ही उन्हें अवसर देगा। और इसीलिए, वे २९ दिसम्बर को सड़कों पर भुनाने की जोड़-तोड़ में जुट गये हैं।

(३१ दिसम्बर २०११)