January 2012 archive

गुजरात लोकायुक्‍त विवाद-१ : दोषी कौन?

गुजरात के राज्यपाल को इतनी वैधानिक समझ रही भी थी या नहीं कि वह लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के अत्यन्त क्लिष्‍ट विषय पर, ‘व्यक्‍ति’ अथवा ‘दल’ सापेक्ष भाव से पूरी तरह ऊपर उठ कर विचार कर सकें?

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पद्म-सम्मान का अधिकारी नहीं, ब्लैक-लिस्टेड नागरिक

Sarokar

‘पद्म’ सम्मानों का जमीनी तथ्य यह है कि यह सम्मान किसी भारतीय के ऐसे प्राकृतिक, आधार-भूत या संवैधानिक अधिकार नहीं हैं जिन्हें वह किसी न्यायिक चार-दीवारी के भीतर जाकर अपने लिए ‘सुरक्षित’ कर सके। Continue reading

अनोखी टीआरपी

एक पुराना उलाहना है — न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी। गोया, सब कुछ भगवान भरोसे! भगवान का यह भरोसा बहुत पुख़्ता है। इसे इस तरह भी देखा जा सकता है कि आज के समय में भगवान की टीआरपी लगातार बढ़त पर है। Continue reading

किसमें कितना है दम!

दिग्गी ने कहा जरूर है कि वे पार्टी आला-कमान से इजाजत लेकर ही हिन्दुओं के उस जलसे में गये थे लेकिन इस फोटो काण्ड ने उनकी अपनी पर्सनल दम-ख़म की कलई तो उतारी ही पार्टी की दम-ख़म का भी फालूदा बना दिया है।

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माया, मूर्ति और चुनाव आयोग : अग्नि-परीक्षा!

अतीत में मच चुके गम्भीर बवालों के परिप्रेक्ष्य में, यह आयोग की निष्‍पक्षता की अग्नि-परीक्षा है कि संवैधानिक प्रावधानों की अपने हिस्से की ताजी समीक्षा के बाद वह इस स्वाभाविक विकास से पलटी नहीं मारेगा।

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जीत और हार!

‘हार-जीत’ के गेम में ‘ड्रॉ’ का कोई स्कोप नहीं। लेकिन, खुदा न ख़ास्ता टाई की नौबत आ जाए तो क्वाइन उछाल कर या फिर किसी प्रिव्हिलेज्ड वीटो के सहारे, दिस वे ऑर दैट, हार-जीत की पर्ची टिका ही दी जाती है।

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ये भी तीतर वो भी तीतर

जेल में मोबाइल फोन के इस्तेमाल की इन-इफ़ेक्‍टिव पाबन्दी हटा ली जायेगी। बताया जा रहा है कि इस तरह जब भाई लोग खुल्लम-खुल्ला बात करेंगे तो प्रशासन को उनकी प्लानिंग मालूम करने का गारण्टीड मौका मिलेगा!

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