May 2012 archive

अबकी बारी, उसकी बारी!

Fourth Pocket

प्रेसीडेण्ट के इलेक्‍शन को ही लें। यह पक्का है कि यह छींका जुलाई में टूटने वाला है। और, जब छींके के टूटने की श्योरिटी हो तो उसमें अपना नाम ढूँढ़ने वालों की लम्बी सी कतार तो तैयार होगी ही होगी। सो, वह भी तैयार है जिसमें हर वैरायटी के पॉलिटिकल प्राणी शामिल हैं। कर्णी सिंह जैसे आउट-डेटेड भी! Continue reading

‘ना’ कहने का अधिकार

Atithi-Vichar

वर्षों तक पत्रकारिता के सक्रिय हिस्से-पुर्जे रहे आये सत्येन्द्र त्रिपाठी ने अपना एक आलेख प्रकाशनार्थ हमें भेजा है। विषय-वस्तु की सर्व-कालीन सम-सामयिकता के कारण ही, १० जनवरी १९९८ को राष्‍ट्रीय हिन्दी दैनिक ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित हो चुकने के बाद भी, मैं इस आलेख को (किंचित्‌ सम्पादन के साथ) यहाँ स्थान दे रहा हूँ। Continue reading

बरदाश्‍त की हद

Fourth Pocket

ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये, एक बात साफ़ कर दूँ कि ख़यालों की मेरी टोकरी में, यूपी इलेक्शन में झेली इतनी बुरी हार की फ़ाइनल एनालिसेज़ के बाद, कांग्रेसी बेगम-हुजूर के आये उस रिएक्शन का आधा परसैण्ट भी नहीं था कि अनुशासन-हीनता कतई बरदास्‍त नहीं की जायेगी! Continue reading

सुशासन की आधार-भूत शिला है जानकारी तक पहुँच का अधिकार

Ateet Ka Jharokha

आदर्श लोक-तन्त्र की निरापदता की आधार-भूत शर्त यही है कि शासन-तन्‍त्र के कार्यकरण से सम्बन्धित किसी भी जानकारी तक पहुँच का अक्षुण्ण अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्‍त हो। यह अधिकार जानकारी तक पहुँच का अधिकार लोक-तन्‍त्र के, यथार्थ में भी, नागरिकों द्वारा ही संचालित किये जाने को सुनिश्‍चित करता है। Continue reading

अस्तित्व से आग्रहित अपरिवर्तन-शील प्राकृतिक नियम ही धर्म

Ateet Ka Jharokha

‘धर्म’ को ‘सत्य’ से प्रतिरोपित करने मात्र से गीता का यह गूढ़तम भाव अपने सरलतम रूप में सामने आ जाता है कि जीव-भेद से धर्म-भेद नहीं उपजता। स्‍त्रियों की रजो-वृत्ति से जुड़ी सहज प्राकृतिक अवस्था का ‘मासिक-धर्म’ कहलाना धर्म के इस आदि भाव का सरलतम उदाहरण है। Continue reading

सपना ही है स्याह-सर्द रात के बाद की गर्माहट

Ateet Ka Jharokha

यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि हमारे सामने अभी भी यह साफ़ नहीं है कि, आज ही सही, हम उस त्रासदी की आँच में झुलस रहे पीड़ितों के लिए ऐसा कुछ क्या कर सकते हैं जो समर्थ रहते हुए भी हमने तब केवल इसलिए बिल्कुल नहीं किया कि हम प्रत्यक्ष-परोक्ष स्वार्थों से आकण्ठ घिरे हुए थे। Continue reading

चहुँ ओर है रावण

Ateet Ka Jharokha

आज तो चप्पे-चप्पे पर मौजूद है, रावण। पारिवारिक रिश्तों में, सामाजिक जिम्मेदारियों में, कला-संस्कृति-साहित्य में, शिक्षा में, कानून-व्यवस्था में। अब तो न्याय भी इसकी छाप लिये होने का आभास देता है। हमारी समस्या बस यही है कि सब कुछ समझते-बूझते हुए भी हम उसे अपने भीतर से एक-बारगी झटक नहीं पा रहे हैं। Continue reading

जितने बीरबल, उतनी ही हाँडियाँ

Fourth Pocket

लोकपाल की निरर्थकता पर अपने ख़यालात पब्लिक करके मिसाइल-मैन ने भी एक टेस्ट-फ़ायर किया है। इससे पहले वह कह चुके थे कि अपने कैण्डिडेचर पर समय आने पर ही मुँह खोलेंगे। गोया, रत-जगे का निचोड़ महज इतना है कि जितने बीरबल होंगे, हाँडियाँ भी तो उतनी ही होंगी! Continue reading