चहुँ ओर है रावण

Ateet Ka Jharokha

आज तो चप्पे-चप्पे पर मौजूद है, रावण। पारिवारिक रिश्तों में, सामाजिक जिम्मेदारियों में, कला-संस्कृति-साहित्य में, शिक्षा में, कानून-व्यवस्था में। अब तो न्याय भी इसकी छाप लिये होने का आभास देता है। हमारी समस्या बस यही है कि सब कुछ समझते-बूझते हुए भी हम उसे अपने भीतर से एक-बारगी झटक नहीं पा रहे हैं।

आदि देव भगवान शंकर के पुरोहित के पद पर प्रतिष्‍ठित हो चुका, महान् सप्‍तर्षियों में से एक पुलस्य का पोता, अपने समय का महा-पण्डित और विश्रवा-पुत्र रावण ऋषि-कुल मे जन्म कर भी राक्षस-कुलीन रक्षेस के रूप में ही याद किया जाता है। यह तथ्य कर्मों की न्यारी गति ही तो स्थापित करता है। आज ‘रावण’ संज्ञा नहीं, संज्ञेय है — परिभाष्य है। वह मात्र एक पात्र नहीं, चरित्र है। केवल स्‍त्री-हर्त्ता नहीं, सुसंस्कार-द्रोही है। घटना नहीं, परम्परा है और इसीलिए एकल नहीं, बहुल है — चहुँ ओर है।

कर्म यदि राक्षसी हैं, प्रवृत्ति यदि दम्‍भी या व्यभि-चारिणी है, विवेक यदि सुप्‍त है, निष्‍ठा यदि संकीर्ण, क्षुद्र और स्वार्थी है, संस्कार यदि दूषित हैं तो धर्म, जाति, कुल, प्रतिष्‍ठा, मान्यता अथवा राज-योग व्यक्‍ति के अन्‍तस् के रावण को अधिक समय तक समाज की नजरों से छिपाये नहीं रह सकते। यह अलग बात है कि तात्कालिक निजी स्वार्थों में अन्‍धा हुआ व्यक्‍ति या तो उस रावण को पहचान न पाये या फिर पहचानते हुए भी सचाई मानने से मना कर दे। ऐसे में प्रकारान्तर से, यह एक और ‘रावण’ के भ्रूण-विकास की सूचना ही होगी।

यदि आदमीयत की, समाज अथवा राष्‍ट्र की शुचिता की कोई अहमियत हमारे भीतर है तो इन बालिग, ना-बालिग और गर्भस्थ रावणों को पहचानने की अपनी क्षमता का विकास करना हमारा नैसर्गिक दायित्व है। रावण को पहचाने बिना, उसकी माया के जाल से मुक्‍ति पाये बिना, रावण-मुक्‍त समाज की कल्पना हम कर भी कैसे सकते हैं?

“रावण का अपमान नहीं किया जाना चाहिए! रावण का अपमान, मेरा अपमान है!” तमिलनाडु के मुख्य मन्त्री करुणानिधि के दर्प-भरे इस गर्जन को महा-पण्डित रावण से जोड़कर देखना बड़ी गलती होगी। यह तो अ-सहिष्णुता के एक बड़े पक्ष-धर द्वारा धर्म-च्युत रावण का किया गया बचाव है। हमारे समाज पर भारी होते जा रहे रावणी माया-जाल की ही द्योतक है यह गर्जना। राज-सत्ता रावणी घुस-पैठ का श्रेष्‍ठ किन्तु सहज माध्यम है तो सत्तासीन रावण की सामाजिक प्रतिष्‍ठा रावणी वृत्ति के व्यापक होते जा रहे विस्तार की सूचक। यह रावण का माया-जाल ही है कि ‘मुर्गी और अण्डे’ वाले शाश्‍वत् विवाद की तरह आज यह सिद्ध करना कठिन है कि उपर्युक्‍त दोनों में से कौन कारण है और कौन परिणाम?

आज तो चप्पे-चप्पे पर मौजूद है, रावण। पारिवारिक रिश्तों में, सामाजिक जिम्मे-दारियों में, कला-संस्कृति-साहित्य में, शिक्षा में, कानून-व्यवस्था में। अब तो, न्याय भी इसकी छाप लिये होने का आभास देता है। संस्कृति-संस्कार किसी भी राष्‍ट्र-समाज की जड़ें हैं। वे राष्‍ट्र को पुष्‍ट करती हैं, अडिग भी रखती हैं। जड़ों को काट कर क्या किसी ठूँठ को हरा-भरा रख पाया है, आज तक कोई? चाहे वह नन्हा सा सु-कोमल अल्प-जीवी पौधा हो या शताब्दि-जीवी महा-वृक्ष, जड़-विहीन होते ही मृत हो जाता है — भ्रम चाहे जितनी देर रहे, हमें।

जो वृक्ष जितना विशाल होगा, जितना परिपक्व-अधेड़ होगा, उसकी जड़ें उतनी ही विविध, बहु-रंगी और बहु-शाखी होंगी। दृढ़-पुष्‍ट और कोमल-तान्तुक जड़ों का परस्पर सामंजस्य ही वृक्ष को विशालता देता है। उसके समस्त आयामों को रूप देता है। यह विज्ञान-सम्मत तथ्य है लेकिन आज का क्षुद्र और दुष्प्रेरित ‘नव समाज-शास्‍त्री’ पुष्‍ट जड़ों को काटना चाहता है ताकि बारीक, कमजोर और क्षुद्र सी दिखने वाली जड़ों के हितों को संरक्षित कर सके। उन्हें कुछ दिला सके जिसे वह ‘न्याय’ कहता है!

वि-भ्रम है उसका, यह। क्योंकि वृक्ष के जीवन-चक्र में कमजोर सी दिखने वाली तान्तुक जड़ें भी उतनी क्षुद्र नहीं होती हैं जितनी कि वे एक वृक्षेतर ‘चिन्‍तक’ को समझ पड़ती हैं। लेकिन, आज का यह ‘वैज्ञानिक’ चिन्‍तक न केवल भ्रमों में जी रहा है, उन्हें स्थापित करने के लिए आन्दोलित भी है।

किसी उद्‌घाटन-कार्यक्रम के निमित्त गज भर का लाल फीता काटने की फैशन को उसने आज इतना आत्म-सात् कर लिया है कि इस अवसर पर नारियल फोड़ने की पारम्परिक प्रथा उसे आयातित फीता-संस्कृति को मिटाने का षड-यन्त्र नजर आती है। उसकी ‘योग्यता’ की दाद दीजिए कि समारोह की शुरूआत की उद्‍घोषणा के प्रतीक-रूप में निरीह कबूतरों को पहले कैद और फिर आजाद करने की ताजा-तर आयातित शैली में तो उसे सुकून और प्रतिष्‍ठा दोनों की प्राप्‍ति होती है लेकिन पुरातन काल से चली आ रही सरस्वती-वन्दना में उसे संकीर्णता का एक ‘छिपा’ षड-यन्त्र ‘साफ-साफ’ दिख जाता है। उस सनातन संकीर्णता का जिसके चलते, स्वयं उसके ही शब्दों में, “कारवाँ आते गये, भारत बसता गया!”

सचाई की जीत ही रावण-मरण का दर्शन है। यह भारतीय दर्शन है। भारत को एक राष्‍ट्र देख कर जिन्हें क्लेश होता है, इससे जिनकी महत्वाकांक्षाओं पर साँप लोटते हैं; वे इस सत्य को अन्‍तिम सत्य कैसे मन्‍जूर कर सकते हैं? खण्ड-खण्ड देश पर ही तो उनका अखण्ड साम्राज्य सम्‍भव है। एक राष्‍ट्र के भीतर आपस में अन-बोले, और अपने आप में सुलग रहे, कई देश ही उनका अभीष्‍ट है।

इस झूठ पर ही तो उनकी सत्ता लौट सकती है, टिक सकती है। कड़ी मेहनत करनी पड़ती है उनको, इस सबको पाने के लिए। तब जाकर थोड़ी-बहुत, बिखरी हुई सी सफलता मिलती है उन्हें। सत्ता अभीष्‍ट है उनका। राष्‍ट्र गौण है उनके लिए। दूषित भ्रम वाहन है उनका। गोयबल्स से प्रेरणा लेते हैं वे। इन्‍दिरा ने ‘श्रमेव जयते’ क्या ऐसे ही, बिना सोचे-समझे कह दिया था?

‘सत्यमेव जयते’ रावण को नहीं सुहाता। इसमें उसे अपनी मौत जो दिखती है। चिर-स्थाई मौत। कुल-नाश। भविष्य में कोई नाम-लेवा, पानी-देवा न बचे; ऐसा अन्‍त। तब कैसे सह सकता है, रावण ‘सत्य की ही जीत’ की उद्‌-घोषणा? दूर-दर्शन सत्ता का ऐसा ब्रह्मास्‍त्र है जिसमें अटूट सम्‍भावनाएँ हैं। सद् भी और असद् भी। झूठ बैठाया जा सकता है इसके द्वारा जन-मन में। दूध का दूध, पानी का पानी भी देख सकती है जनता, इसके माध्यम से। शासक की हो जैसी मंशा। चाहो तो, राम-राज्य ले आओ। चाहो तो, रावण की सभा सजा लो।

रावण ‘सत्यमेव जयते’ का सन्‍देश कैसे दे? सत्य रहेगा तो रावण को मरना होगा। उसकी माया, उसका छल, उसकी दिग्विजयी छवि चाहे जितनी भी प्रबल हो; तन्त्र पर उसकी (स्वेच्छा-चारी) पकड़ चाहे जितनी दृढ़ हो; सत्य के रहते वह ढीली पड़नी ही है। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। सच को मिटा दो। मेहनत से। अतीत में दूर-दर्शन के ‘लोगो’ से ‘सत्यमेव जयते’ का हटाया जाना रावण के इरादों का, उसके फैलते माया-जाल का द्योतक है। दूर-दर्शन पर एक बार फिर से उसे दिखाना रावण की हार की शुरूआत है।

राज-नीति, रावणी माया-जाल का सबसे सुदृढ़ पाया है। बहु प्रति-रूप हैं इसके। कुछ आधे, कुछ अधूरे तो कुछ एक-दूसरे के परि-पूरक। विस्तार ही रावण का बीज-मन्‍त्र है। भौतिक विस्तार, मानसिक विस्तार। क्योंकि जिस दिन उसके इस स्वच्छन्‍द विस्तरण पर कोई अंकुश लगेगा, उसी दिन से उसकी माया छँटनी शुरू होगी। दिविजय का सपना टूटेगा। अटल सामाजिक मूल्य फिर स्थापित होना शुरू होंगे।

मुखौटों के भीतर छिपे ‘रावण’ को पहचानेंगे नहीं तो उसे मार कैसे पायेंगे हम? अपने ही भीतर छिपे रावण से दो-दो हाथ किये बिना क्या चहुँ ओर फैले पड़े रावणों से कभी मुक्‍ति मिल पायेगी हमें?

अन्‍तर्विरोध भी रावण की एक शक्ल है। रक्षा मन्त्री के रूप में धुर सीमा-क्षेत्रों का अनेक बार दौरा कर चुका और रक्षा-सेनाओं की वास्तविक समस्याओं से प्रत्यक्ष परिचय पा चुका देश का रक्षा मन्त्री, पद-च्युत रहने पर, जब देश के पोखरण परमाणु-परीक्षण की प्रतिक्रिया में नवाज शरीफ की ‘हिसाब बराबर करने’ की दम्‍भ भरी गर्जनाओं को अन-सुना करता है और अपने ही देश की सरकार से पाकिस्तान को, उस देश के विद्वेष-भरे अणु-विस्फोटों और उनकी प्रति-क्रिया में उस पर लगायी गयी विश्‍व-व्यापी आर्थिक पाबन्‍दियों के नुकसान की भर-पायी के लिए, बारह हजार करोड़ देने की माँग करता है तो इसे ‘मुलायमी’ मुखौटे के पीछे छिपे मायावी असुर की असलियत मान कर उससे सावधान होने में क्या कोई ऐतराज हो भी सकता है?

लग-भग एक हजार करोड़ के चारा घोटाले में अभियुक्‍त नाम-जद हो जाने की बौखलाहट, सीबीआई के छापों के घेरे में फँसने से बचने की अकुलाहट और कांग्रेस-वामपन्‍थी सहयोग से न्याय को भी धता देने की बे-शर्म राज-नैतिक चौधराहट का जो नजारा लालू-राबड़ी जोड़ी बिहार में दिखा रही है, उसे देख कर तो ऐसा लगता है कि इस बार रावणी राज्य की सीमा का विस्तार दण्डकारण्य से बहुत आगे तक हो गया है।

मध्य प्रदेश का गृह विभाग देख रहा मन्त्री जब अप-मानित व प्रताड़ित महिलाओं के लिए प्रत्येक बलात्कार की प्रताड़ना पर उत्तरोत्तर बढ़ती राशि के सरकारी मुआवजे की घोषणा कुछ इस अन्‍दाज में करता है कि दिग्विजय ‘सरकार’ की उदार-मना कृपा से बलात्कार अब स्‍त्रियों के लिए एक लाभ-कारी ‘रोजगार’ हो जायेगा तो लगने लगता है कि रावण उस जन्म में (दम्‍भ के मारे ही सही) अशोक वाटिका में सीता के साथ बरते अपने लोकाचारी सौजन्य की गलती अब, इस जन्म में, दुहराना नहीं चाहता। यह तो न जाने किस राम, सीता या मन्दोदरी का प्रताप था कि प्रतिष्‍ठित सभा में किये अपने उस कथन में वे इतना और जोड़ने से कंजूसी कर गये कि इस शासकीय पुरस्कार का लाभ उठाने के लिए तो बालिग व ना-बालिग रोजगार-विहीन स्‍त्रियों को आवेदन करके स्वयं ही प्रस्तुत होना चाहिए। या फिर, राज-सभा का बड़ा-छोटा कोई आमात्य एक-दम निजी स्तर पर दबे-छिपे यदि यह मुआवजा लुटा भी रहा हो तो इसे जाना भी कैसे जा सकता है?

बुजुर्ग विधान-सभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी ने तो कहा भी है कि बलात्कार जैसी ‘मामूली’ घटनाओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाना चाहिए। उनका पोता एक हत्या के आरोप के घेरे में है तो क्या वे जल्दी ही यह कहना चाहेंगे कि हत्या जैसी छोटी सी बात पर हो-हल्ला एक बे-मतलब का बखेड़ा है? विधायिका का ‘पिता-मह’ जब इस तरह की व्यवस्थाएँ देता है तो क्या ऐसा नहीं लगता कि कु-संस्कारों की घुट्‍टी देकर असुर-कर्म के लिए मेघनादों को एक बार फिर प्रेरित किया जा रहा है?

यह बात समझ में आ जाये तो समझा जा सकता है कि शिक्षा-प्रणाली में संस्कारों और सांस्कृतिक अव-धारणाओं को शामिल करने से बहु-संख्य शिक्षा मन्त्रियों को क्यों इतना उग्र परहेज है? दरअसल, आतंकित हैं वे। ‘आदमी का सोच उसकी कलई खोलता है’ जैसी समझ का विकास हमारे नेताओं को संकट में डालता है।

वे नि:संकोच और मुखर हैं यह कहने में कि उन्हें ऐसी शिक्षा से घोर विरोध है जो लौट कर राज-नैतिक छत्रपों पर ही वार कर सके। रावण भी तो यज्ञ-विघ्न करता था। अपने राज्य की सीमा से बाहर जाकर भी!

संस्कारों के जारी रहते नये-नये शूर्प-नखा व रावण जन्मना कठिन होता है। ‘धर्म’ की सत्ता इस कलि-युग में साम्प्रदायिक कहला रही है। इन्‍दिरा और उनके उत्तराधिकारी राजीव ने भी घुमा फिरा कर यही तो कहा था कि अ-धर्म ही अब ‘इस जमाने’ का धर्म हो गया है। कि, उस पर चलने वालों पर उंगली उठाने का कोई औचित्य नहीं — फैलने दें आसुरी राज को।

रावण के इस ‘भौतिक दर्शन’ का ही तो एक परिणाम हैं ये आँकड़े। भारत में काले धन के आँकलन का औसत कहता है कि १९९४-९५ में काले धन की कुल राशि लगभग तीन लाख करोड़ तक पहुँच गयी थी। जबकि, १९८७-८८ में यह लग-भग आधी ही थी — एक लाख उनचास हजार दो सौ सन्तानवे करोड़ रुपये। संसद्‌ की स्थाई समिति के आँकलन के अनुसार १९८०-८१ में कीमत के आधार पर काले धन में १३२ प्रतिशत् की दर से वृद्धि हुई जो उस काल की सकल घरेलू उत्पाद्‌ की दर से २६ गुना अधिक थी!

आँकलन के अनुसार १९८७-८८ के कुल काले धन में ३५ प्रतिशत् निगमित और निजी प्रत्यक्ष करों, सीमा शुल्क और उत्पाद्‌ कर जैसे करों की चोरी का था। तस्करों से अर्जित काला धन जो कि हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ रहा है, अब तीसरी अर्थ-व्यवस्था की जगह ले चुका है। मादक पदार्थ, हीरे और चुनिन्‍दा उपभोक्‍ता सामग्री से कमाये काले धन की वृद्धि महज पन्द्रह हजार से बढ़कर बीस हजार करोड़ रुपये प्रति वर्ष हो गयी है। १९८०-८१ की तुलना में १९९४-९५ तक के पन्द्रह सालों में काले धन में कम से कम ४८८ प्रति-शत् की वृद्धि का अनुमान लगाया जाता है।

संस्कारी राष्‍ट्र में हर घटना समुचित विवेचना की अधिकारी होती है। वैयक्‍तिक दु:ख या क्षोभ राष्‍ट्रीय हितों से ऊपर नहीं होते। चाहे वह राष्‍ट्र के सत्ता-शिखर पर बैठे व्यक्‍ति से जुड़ी घटना ही क्यों न हो, प्रति-घात की प्रबल-तम इच्छा भी व्यक्‍ति-गत् निर्णय का ऐसा अधिकार उसे नहीं सौंपती कि व्यक्‍ति और उसमें निहित सत्ता के घाल-मेल से राष्‍ट्र और राष्‍ट्रीय हितों को नुकसान पहुँचे। किन्तु, रावण तो त्रैलोक्य-सत्तापीठ के भ्रम में जीता है। अपने-अपने दायरे में स्वयं को त्रैलोक्य-पति समझ बैठता है हर प्रति-रूप का रावण। और इस तरह सामाजिक विधानों से ऊपर मानने लगता है वह अपने आपको। इन्दिरा की हत्या की प्रति-क्रिया में उपजे व्यापक सिख-विरोधी दंगों की तरफ ध्यान दिलाये जाने पर, हड़-बड़ी में पदासीन किये गये तत्कालीन प्रधान मन्त्री, इन्दिरा-पुत्र राजीव, का यह कथन कि ‘एक बड़े वृक्ष के ढहने पर थोड़ा-बहुत भू-कम्‍पन तो होगा ही’ क्या एक सन्तप्‍त पुत्र की, निजी बदला लेने की औसत किन्तु राष्‍ट्र-प्रधान की गरिमा से काफी गिरी हुई, प्रति-क्रिया भर नहीं थी? ऐसी प्रति-क्रिया जिसने राष्‍ट्रीय हितों को दूर-गामी, गम्‍भीर और स्थाई चोट पहुँचायी।

जब-जब तन्त्र पर उनकी नहीं, ‘जन’ की पकड़ मजबूत होती दिखती है तब-तब चोटें ही तो मिली हैं हमारे लोक-तन्त्र को उनसे, जो थकते नहीं जन-तन्त्र की दुहाई देते-देते। चुनावी भ्रष्‍टाचरण के लिए न्यायालय द्वारा सिद्ध-दोष घोषित हो जाने पर, लोक-तन्त्र की बड़ी-बड़ी बातें बना रहे आज के राज-नयिकों की पुरोधा, इन्दिरा नेहरू गांधी, ने जो कुछ किया था क्या वह आज भुलाया-मिटाया भी जा सकता है? आपात्-काल की बात नहीं कर रहा। मैं तो, उससे भी गहरे, एक लोक-तान्त्रिक पाप का मुद्दा याद दिलाना चाहता हूँ। वैसे तो, सत्ता और न्याय का घाल-मेल अनेक बार किया था इन्दिरा ने। लेकिन, तब तो उसे चरम पर पहुँचाया था। निश्‍चित तौर पर कानूनन बलात् पद-च्युत की जाने वाली तब की प्रधान मन्त्री ने तब पहले तो न्यायालय से कुछ समय माँगा और फिर, अन्‍तिम क्षणों में, एक अध्यादेश जारी करवा कर जन-प्रतिनिधित्व कानून में वह सुविधा-जनक संशोधन किया जिसने कानून और संविधान दोनों को ही ठेंगा दिखा दिया। गैर-कानूनी काम के लिए सिद्ध-दोषी, उसी नीयत से किये गये अपने अगले कर्म की मदद से कुर्सी का ‘कानूनी’ हक़-दार बन उस पर बलात् बैठा रहा!

रूढ़ियों को तोड़ने के नाम पर संस्कृति को चोटिल करके आम आदमी की स्थापित ताकत को अपनी मुट्‍ठी में समेट लेना रावणी कूट-नीति का महत्व-पूर्ण अंग है। जबकि हमारे देश के सन्‍दर्भ में, दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। संस्कृति और संस्कार साम्प्रदायिकता नहीं पनपाते क्योंकि यह एक राष्‍ट्र के जीवन की जड़ें हैं। व्यक्‍ति पहले समाज और फिर राष्‍ट्र में बदलता ही संस्कृति और संस्कारों के सहारे है। अन्यथा आदिम युग से आज तक की विकास-यात्रा हुई ही कैसे होती? रावण पर राम की जीत की आशाएँ अन्यथा जागतीं कैसे?

‘गांधी’ जिनका वाक्-चातुरी आदर्श हैं, जो हमेशा से ही गांधी को साम्प्रदायिकता का निशाना हुआ ठहराते, और इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘जीवन-शैली’ ठहराये गये हिन्दुत्व पर चोट करने के हर सम्‍भव बहाने ढूँढ़ते, रहे हैं क्या वे इस सहज जमीनी सचाई को समझने के लिए तैयार हैं कि गांधी आज जिस कारण दुनिया के आदर्श हैं, अहिंसा का उनका वह आदर्श उसी ‘हिन्दू दर्शन’ की ही देन है?

आदि-शक्‍ति के एक स्वरूप की ओर हमारा ध्यान जाता तो जरूर है लेकिन सम्‍भवत: इसका कारण उसकी विकरालता है। क्या, कभी हमने इस तरह भी सोचा है कि गांधी का आदर्श अपने सबसे शक्‍ति-शाली स्वरूप में इसी पौराणिक गाथा में निखरता है? क्या कभी हमने इस सम्‍भावना को टटोला है कि हमारे सामाजिक मूल्यों के परि-प्रेक्ष्य में महा-काली आदमी और आदमीयत को केन्द्र में रखने वाला ऐसा प्रतीक है जिसे भुला कर अथवा झुठला कर हम रूढ़ियाँ नहीं, आदमीयत की श्रेष्‍ठता स्थापित करने का अपना ऐसा सपना तोड़ रहे हैं जिसे गांधी के माध्यम से अब समूची दुनिया में मान्यता मिल चुकी है?

‘ताकत के खिलाफ, हिंसा के खिलाफ, उन्माद के खिलाफ; सामूहिक ताकत का प्रयोग स्थापित हिंसक प्रतीक का नाश भले ही कर दे, अन्‍तत: उससे भी बड़े एक नये हिंसक उन्माद के ताण्डव की ही राह खोलता है। इसके विपरीत सक्षम की अहिंसा, हिंसक मनो-वृत्ति को समाप्‍त करने की आधार-भूत सामाजिक जरूरत को पूरा करती है।’

यही गांधी ने कहा था। यही हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक धरोहर है। गांधी ने तो दरअसल संस्कृति की, आदमीयत की नब्ज पर हाथ भर रखा था। एक ईमान-दार वैद्य की तरह। तमाम स्वार्थों से परे, पूरी निस्पृहता से। और तब, प्रकृति के सामंजस्य में आदमीयत कैसे चिरकाल तक जीवित रह सकती है, इस बारे में हमें वे विचार सुझाये थे जिन्हें, स्वार्थ में अन्‍धे होकर, हम जान-बूझकर भुलाते जा रहे थे। शायद आज भी भुलाना ही चाहते हैं। और इसके लिए सारा दोष अपने सामाजिक अतीत पर, अपनी सांस्कृतिक विरासत पर मढ़ रहे हैं ताकि स्वार्थों का हमारा मार्ग निष्कण्टक होता जाए।

रावणी माया-जाल नहीं तो और क्या है यह? राम को तो पूजते हैं लेकिन रावण का मोह टूटता नहीं है। अपने भीतर झाँक कर देखें — पूरी ईमान-दारी से, तो शायद महसूस कर सकें कि हमारे दिमाग में यह जो कुछ घुसता सा जा रहा है वह हमारे अपने भीतर से उपजा हुआ नहीं है। हमें जो कुछ परोसा गया है, और अभी भी परोसा जा रहा है, उसी की उपज है यह।

हमारी समस्या बस यही है कि सब कुछ समझते-बूझते हुए भी हम उसे अपने भीतर से एक-बारगी झटक नहीं पा रहे हैं। सब कुछ साफ-साफ समझने के बावजूद यह माया-जाल हम पर भारी है तो केवल इस कारण कि रावण विविध रूपों में आज भी चहुँ ओर मौजूद है। बाहर भी और हमारे अपने भीतर भी।

इससे मुक्‍ति का केवल एक ही रास्ता है — इसे न-कारने का; इसके अस्तित्व के अहसास को न-कारने का शुतुर-मुर्गी तरीका अपनाने की जगह सीधे, इसकी आँखों में आँख डाल कर, इसे ही सचाई का दर्पण दिखा कर।

गांधी ने यही किया था। सत्याग्रह का अपना पाठ पढ़ा कर हम सबसे यही चाहा भी था।

(१५ मई २०१२; ओजस्विनी, अक्टूबर १९८८ से सम्‍पादित)

1 comment

    • Satyendra Tripathi on May 16, 2012 at 6:55 pm

    मित्र,
    तनिक भी जागरूक और संवेदनशील कोई भी व्यक्ति इस त्रासक सच्चाई से इनकार नहीं करेगा जिसे आपने शिद्दत से चित्रित किया है। निश्चित ही, आज चारों ओर शोषण, भ्रष्टाचार, अनाचार, पाखंड, तथा सत्ता, शक्ति और संपत्ति के दर्प भरे बेशर्म प्रदर्शन की रावणी प्रवृत्ति हावी है। इसे बल मिलता है सज्जनों के इस असहाय समर्पण भाव से कि इस दानवी प्रवाह का विरोध करना आ बैल मुझे मार जैसी बेवकूफी भर है, कुछ किया नहीं जा सकता। यह अजेय लगने वाला रावणी तिलिस्म निश्चित रूप से टूट सकता है, बशतें इसके प्रतिकार के लिए रामबाणी प्रवृत्तियों को पोषण दिया जाए। इसके लिए शोषितों और वंचितों का सबलीकरण और सज्जनों का मुखर होना निहायत जरूरी है। मुक्ति के संघर्ष का मार्ग, जैसा आपने अंत में कहा, वही है जो गांधी ने दिखाया था। पर जहां सत्याग्रह उनकी अनोखी रणनीति का आधार था वहीं अहिंसा और असहयोग भी उसके दो अन्य अनिवार्य आयाम थे जिनकी व्यावहारिक संभावनाओं को पूरी तरह खंगाला जाना अभी शेष है। बहरहाल, अभिव्यक्ति के आपके अथक प्रयासों के लिए साधुवाद!
    सत्येन्द्र

Comments have been disabled.