ऐसे मनो-नयन का औचित्य!

Sarokar

क्रिकेट की उपलब्धियाँ सचिन को चाहे जितनी राज-नैतिक सीढ़ियाँ चढ़ा दें, देश को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इन्हीं के सहरे वे चाहे जितने सम्मान कमा लें, देश को इस पर भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन संसद्‌ में बैठने की पात्रता तो संसदीय क्रिया-कलापों में योग-दान कर पाने की सम्भावना से ही आँकी जानी चाहिए।

क्रिकेटिया शतकों के शतक-वीर सचिन अन्तर्राष्‍ट्रीय मैचों में जब गेंदें भी नियमित रूप से डाला करते थे तब कहा जाता था कि सपाट से सपाट पिच पर भी वे एक ओवर की छहों गेंदों को अलग-अलग तरह से डाल सकते थे। प्रशंसा का अन्दाज कुछ ऐसा हुआ करता था कि अगर एक ओवर में दस गेंदें डालने मिलतीं तो एक ओवर में उनकी गेंदे दस प्रकार की भी हो सकती थीं।

अब, यदि यह कहने का जी करे तो इसे अतिशयोक्‍ति नहीं माना जाए कि, एक सूक्ष्म से भेद के साथ, सचिन ने अतीत की वह क्षमता आज भी बचाये रखी है। उनके बोल-वचनों ने सिद्ध कर दिया है कि राज-नीति की अबूझ पिच पर भी वे उतनी ही विविधता प्रदर्शित करेंगे। वह भी, पूरी दबंगई के साथ! किन्तु, मत-दाता द्वारा किये गये मूल्यांकन के बाद मिली उसकी सह-मति की शक्‍ति के साथ, ‘राज-नीति’ करना एक बात है और, मतदाता से बच-बचा कर, किसी की कृपा या किसी के हित-संरक्षण के लिए ‘राज-नीति की सीढ़ी चढ़ना’ दूसरी। राज्य सभा के लिए अपने मनो-नयन पर सचिन ने मीडिया से जो बातें कीं उनसे स्पष्‍ट हो गया कि उसने इस दूसरी डगर पर चलने का निर्णय ले लिया है। राज-नीति के अपने प्रायोजकों को भी वह वैसा ही झोली-भर प्रति-फल देगा जैसा उसने अपने क्रिकेटिया प्रायोजकों को माला-माल करते हुए दिया था।

वैसे, इन दोनों बातों में एक बड़ा तथ्यात्मक अन्तर है — विशुद्ध वैयक्‍तिक होने के बाद भी, क्रिकेट के मैदान में खिलाड़ी सचिन की उपलब्धियों से खेल-प्रेमी देश-वासियों को एक आत्मीय सन्तोष भी हुआ। कुछ को तो इसमें देश का इतना गौरव तक दिखा कि, मौसम आने पर, वे उसे भारत-रत्‍न से सम्मानित करने की माँग करने को आतुर हो उठते हैं। यहीं, इसमें दो मत नहीं कि उसकी खेल-गत्‌ उपलब्धियों का मूल्यांकन करते हुए सचिन को खेल-रत्‍न की उस उपधि से विभूषित किया ही जाना चाहिए जो एक खिलाड़ी के सम्मान का हमारे देश का सर्वोच्च प्रतीक है। लेकिन, सचिन की प्रशंसा में उठाये जा रहे इन सारे हाथों के सहारे राज्य सभा में किये गये उसके मनो-नयन को औचित्य-पूर्ण नहीं ठहराया जा सकता है।

विधायिका का धरातल चाहे राष्‍ट्रीय हो या प्रादेशिक, सदस्य के रूप में उच्च सदनों में प्रवेश के दो द्वार हैं और इन तक पहुँचने की दो, सर्वथा भिन्न, सीढ़ियाँ भी हैं। देश के संविधान के वर्तमान स्वरूप और इस स्वरूप के निर्धारण को लेकर हुई आधार-भूत बहस को समग्रित करके, और विशुद्ध निर्लिप्‍त नीयत से, समीक्षा करने बैठने पर यह समझ पाना बहुत आसान है कि ‘चुनाव’ और ‘मनो-नयन’ के नाम से परिभाषित लोक-तन्त्र की ये ऐसी सीढ़ियाँ हैं जिनकी परस्पर भिन्न गुण-वत्ता उन्हें एक ही तराजू पर तौलने को सर्वथा प्रतिबन्धित करती है। जहाँ, चुनाव की अपनी शर्तें होती अवश्य हैं लेकिन इन शर्तों का आधार-भूत दायरा इतना संकीर्ण होता है कि बहुत सारे व्यापक सवाल खड़े नहीं किये जा सकते हैं। वहीं, मनो-नयन की प्रस्तावना की संवैधानिक मंशा का दायरा अपरिमित रूप से विस्तृत होते हुए भी इस पर यदा-कदा उठाये जाने वाले सवाल अत्यन्त सीमित और संकीर्ण ही रहे हैं। अधिकांशत: दल-गत्‌ राज-नीति से प्रेरित भी।

राज्य सभा के लिए सचिन के मनो-नयन, सचिन के ग्लैमर की बहस को सदैव जीवन्‍त रखने में अपने प्रचार-प्रसार से जुड़े प्रत्यक्ष-परोक्ष हितों से जोड़ कर देखने वाले मीडिया की कृपा, मनो-नयन को लेकर ‘उगलत-निगलत पीर घनेरी’ वाली राज-नैतिक दलों और जन-समर्थन की लालसा में जुटे व्यक्‍तियों व समूहों की अध-कचरी प्रतिक्रियाएँ और, ‘नहले पर दहला’ जैसी, सचिन की बात-चीत ने मनो-नयन को लेकर हमारे संविधान के आधार-भूत दर्शन पर पुनर्विचार की गम्भीर बहस छेड़ने का एक बढ़िया अवसर दिया है। यों, मुख्य बहस तो राज्य सभा के अस्तित्व के औचित्य और उसके स्वरूप के पीछे निहित संवैधानिक मंशा पर ही होनी चाहिए लेकिन मुझे लगता है कि ‘मनो-नयन’ को इस संवैधानिक मंशा की समझ का सरल-तम्‌ और आरम्भिक बिन्दु मान लेने में कोई व्यवहारिक हानि अथवा दोष नहीं है। संयम की यह भी सावधानी रखनी चाहिए कि सचिन इस बहस का ‘व्यक्‍ति’ नहीं बल्कि ‘निमित्त-मात्र’ है निमित्त की कितनी भी तथा कैसी भी आलोचना क्यों न की जाये सारा कुछ प्रतीकात्मक होता है, वैयक्‍तिक बिल्कुल भी नहीं। इसे ही व्यापक परि-प्रेक्ष्य कहते हैं।

संविधान की मंशा को निरपेक्ष भाव से परखें तो दिख जायेगा कि, शर्तें चाहे जो हों, चयन राज-नैतिक चाल-चलन तथा उससे जुड़ी सारी जोड़-तोड़ के जितने अवसर देता है उतना ही उसे न्यौता भी देता है। यद्यपि, कागजों पर, इससे देश-हित भी जुड़ा होता है किन्तु, व्यवहारत:, इससे व्यक्‍ति अथवा गुट ही लाभान्वित होते हैं। इसके उलट, मनो-नयन की आधार-भूत उपयोगिता ही यह है कि जोड़-तोड़ और लाभ-हानि की इस राज-नैतिक आपा-धापी में देश किसी अत्यन्त आवश्यक तन्तु से सर्वथा वंचित न रह जाये। क्षीण-तम्‌ ही सही, ऐसे कुछ तन्तुओं की लोक-तन्त्र में सक्रिय उपस्थिति को सुनिश्‍चित करना ही मनो-नयनों की आत्मा है।

सैद्धान्तिक सोच यह है कि इससे लोक-तन्त्र, यानि कि देश, लाभान्वित होगा — मनो-नयन ऐसा होना चाहिए कि सदन के किसी छोर-विशेष को ‘सूखे’ की मारक यन्‍त्रणा नहीं झेलना पड़े। राज-नैतिक हार अथवा जीत और पसन्द अथवा ना-पसन्द के फेर में देश का सर्वोच्च विधायी तन्त्र, प्रतिनिधित्व की विविधता के धरातल पर, समाज के सभी रचनात्मक पक्षों का सच्चा प्रतिनिधित्व करे। ‘गौरवान्वित’ हुआ अनुभव करने के लिए, व्यक्‍तियों को भी और देश को भी, मनो-नयन से इतर बहुत विस्तृत क्षेत्र उपलब्ध है। सरल शब्दों में, मनो-नयन ‘उपयोगिता-आधारित’ तो हो ही, ‘वैविध्य-आधारित’ भी हो —मनो-नयन राष्‍ट्र की लालसा को पूरी करता हो। वह भी, व्यक्‍ति-विशेष या फिर क्षेत्र-विशेष पर केन्द्रित अथवा सीमित होकर नहीं। अर्थात्‌, मनो-नयन किसी की ऐसी बपौती नहीं है कि गद्‌-गद्‌ भाव में बह कर उसे बारम्बार सदन में सुशोभित किया जाता रहे। राज-नीति कें आकण्ठ डूबे और आम जन द्वारा नकारे जा चुके किसी पिट्‍ठू को तो एक बार भी नहीं। मनो-नयन महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का पिछला चोर-द्वार कतई नहीं है। फिर चाहे वह व्यक्‍ति हो अथवा गुट। यहाँ तक कि, एक राज-नैतिक दल भी।

मैंने सचिन को अपनी बात का आरम्भिक बिन्दु कहा है। इसलिए, सचिन को मनो-नीत किये जाने की बहस के छोर से ही आरम्भ करना अधिक उचित होगा। इस मनो-नयन के औचित्य पर प्रश्‍न-चिन्ह लगाने पर मेरे एक परिचित ने पलट सवाल किया था — तब, राष्‍ट्रपति पद के लिए कलाम साहिब के चयन का औचित्य समझा दीजिए! यों, प्रश्‍न राष्‍ट्रपति पद की ताजी दौड़ से नहीं बल्कि अतीत में उनके चुन लिये जाने से जोड़ कर पूछा गया था लेकिन मेरी दृष्‍टि में, बीते और ताजे, दोनों ही दौर औचित्य के इस सवाल से सर्वथा मुक्‍त हैं। यह सवाल अपने आप में अनुचित इसलिए है क्योंकि राष्‍ट्रपति का चुनाव होता है — विशुद्ध राज-नैतिक चुनाव। जबकि सचिन पर छिड़ी बहस किसी को, एक सदस्य के रूप में, मनो-नीत किये जाने के राष्‍ट्रपति के विशेषाधिकार से जुड़ी है। और, इसमें बहस इसलिए है क्योंकि देश के प्रथम नागरिक को उपलब्ध यह विशेषाधिकार उसका सर्वथा-सुरक्षित स्वेच्छा-चारी स्वत्वाधिकार नहीं है। इसके उलट, यह दायित्वों के पदेन निर्वहन से जुड़ा हुआ है — कुछ संवैधानिक शर्तों के आधीन।

एक-दम सतह से ही परखें तो, सचिन के नामांकन से पहले तक केवल एक बार ही किसी खिलाड़ी को राज्य सभा के लिए नामांकित किया गया था — सन्‌ २००३ में। तब सौवें नामांकित सदस्य के रूप में दारा सिंह का चयन हुआ था। किन्तु तब भी, बचत की एक सँकरी संवैधानिक गली तलाशी गयी थी — इस पहलवान का नामांकन ‘खिलाड़ी व कलाकार’ की तरह किया जाना घोषित हुआ था! जबकि, मनो-नयन से उपकृत होकर गद्‍-गद्‍ हुए सचिन ने स्वयं ही कहा कि उनका चयन २२ सालों की उनकी क्रिकेटिया खेल के लिए हुआ है। यह बिल्कुल दो टूक स्वीकारोक्‍ति थी। इस मनो-नयन पर संविधान-विशेषज्ञ सुभाष कश्यप की टिप्पणी भी उतनी ही दो टूक थी — राज्य सभा में नामांकन के लिए उपलब्ध श्रेणियों में ‘खेल’ नाम की कोई श्रेणी है ही नहीं! दरअसल, संविधान की धारा ८० के अनुसार, राज्य सभा में सदस्य के रूप में नामांकन केवल ‘कला’, ‘साहित्य’, ‘विज्ञान’ और ‘समाज-सेवा’ की कुल चार श्रेणियों तक ही सीमित है।

कथित रूप से, खेल-श्रेणी में हुए सचिन के नामांकन को लेकर हंगामा तो पहले से ही मच चुका था। विवाद न्यायालयीन चौखट तक भी पहुँच चुका है। कश्यप की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया और विवाद का बहुत गम्भीर तूफ़ान उठ गया। ऐसे में, खेल को नामांकन की संविधान-सम्मत श्रेणी की तरह स्वीकृत करना इस तूफ़ान को और अधिक गहरा देता। तब, क्रिकेट के ‘लिटिल मास्टर’ के नामांकन की श्रेणी ‘खेल’ से बदल कर, आनन-फानन में, ‘समाज-सेवा’ हो गयी! हाँ, इस इज्जत-बचाऊ अभियान में कांग्रेसी राज-नीति को खुल कर अवश्य सामने आना पड़ा — केन्द्रीय गृह मन्‍त्री चिदम्बरम को आम नागरिक की ‘संविधान की कमजोर समझ’ का वास्ता तक देना पड़ा!

चिदम्बरम की यही ‘बचकानी’ सफ़ाई है जो नामांकन की बहस को एक तथ्य-परक तार्किक परिणति तक ले जाने के प्रयास को विवश करती है। ऊपर से, सचिन के दो-दो तड़के भी हैं — अपने मनो-नयन को लेकर उठाये जा रहे सवाल पर लिटिल मास्टर ने स्ट्रेट ड्राइव लगाते हुए आलोचकों से पूछा है कि लता का मनो-नयन हुआ था तो क्या उन्होंने गाना छोड़ दिया था? बात को यहीं पूर्ण-विराम नहीं देते हुए सचिन ने अपर कट लगाते हुए आगे समझाइश भी दे डाली कि वायु-सेना द्वारा उन्हें ग्रुप-कैप्‍टेन बनाये जाने पर उन्होंने फाइटर-प्लेन तो नहीं उड़ा डाला था! अपनी ही ओर से यह दोनों प्रति-क्रियाएँ देकर स्वयं सचिन ने ही बहस की पिच को न केवल खेलने-योग्य ठहरा दिया है बल्कि प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को उसमें शामिल होने आमन्‍त्रित भी कर दिया है। विशेष रूप से यह दावा करते हुए कि बिना जहाज उड़ाये भी कोई वायु-सेना का ग्रुप-कैप्‍टेन बना रह सकता है। मात्र शोभा की खातिर। गोया, सवाल कर रहे हों कि यदि उन्हें राज्य सभा की शोभा बढ़ाने के लिए, वेतन और कुछ अतिरिक्‍त विशेषाधिकारों के प्रस्ताव के साथ, न्यौता गया है तो इससे देश बेचैन क्यों हो रहा है?

निष्‍कर्ष इस आधार पर नहीं निकलेगा कि सचिन, या फिर किसी और को भी, उसकी उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए अथवा नहीं? निकट अतीत का घटना-क्रम बतलाता है कि राज-नैतिक परिलब्धियों को, ले-दे कर, हथिया लेने के प्रयास में सचिन को उपकृत करने की मानसिकता कांग्रेस में गहराती जा रही थी। वैसे तो, गाहे-बगाहे घोषित होते कमो-बेस सारे ही ‘राष्‍ट्रीय’ सम्मान इसी एक राज-नैतिक धुरी के चौ-गिर्द घोषित होते रहे हैं। और, यह राज-नैतिक नीयत इस सचाई से कतई असम्बद्ध रहती आयी है कि समय-विशेष पर सत्ता-सिंहासन को कौन सा दल अथवा गठ-बन्धन सुशोभित कर रहा था? इसी क्रम में सचिन को भारत-रत्‍न से उपकृत करने की जुगत भिड़ायी गयी। इसके लिए खेल-श्रेणी को पात्रता की सूची में जोड़ा गया। फिर भी, न जाने किस कारण से, मामला लटक गया!

किसी को उपकृत करने के पीछे छिपी नीयत चाहे जो हो, सामान्य स्थितियों में, ऐसे निर्णयों पर व्यवहारिक आपत्ति का कोई बिन्दु नहीं हो सकता है। मान-सम्मान मात्र शोभा की बात होती है। इससे, सम्मानित हुए व्यक्‍ति पर, थोड़ा-बहुत नैतिक दबाव भी पड़ सकता है। किन्तु, ऐसे अलंकरण अलंकृत व्यक्‍ति को ऐसा एक भी व्यवहारिक अथवा बन्धन-कारी दायित्व नहीं सौंपते हैं जिनका निर्वहन नहीं किये जाने पर उसे राष्‍ट्र के सामने जवाब-देह होना पड़े। लेकिन, संसद्‌ देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है। इसे गम्भीर विधायी कार्य करने होते हैं, विधि-विधान बनाने होते हैं। निर्वाचित सदस्यों के अलावा मनो-नयन का प्रावधान इसलिए महत्व-पूर्ण है कि निर्वाचन की प्रक्रिया के पूरा होने के बाद उच्च सदन का जो भी स्वरूप सामने आया हो उसे देख कर यह परखा जाए कि कहीं समाज का कोई एक विशेष छोर, या कहें कि तन्‍तु, विधि-विधान के निर्माण में योग-दान से वंचित तो नहीं हो रहा है? स्पष्‍ट है, नामांकन का सैद्धान्तिक सोच यही है कि गिनती में सीमित भले हों, जो कोना सूना दिखायी दे उसे नामांकित सदस्यों से भरा जाए।

कला, साहित्य, विज्ञान और समाज-सेवा की देश के समाज तक पहुँच की तात्विक समीक्षा करें तो समझा जा सकता है कि इन चारों तत्वों का विस्तार इतना व्यापक है कि इनकी अपनी-अपनी पहुँचों को आपस में मिला कर हमारे समाज तक समग्र रूप से पहुँचा जा सकता है। यही कारण था कि चुनाव की प्रक्रिया से इतर देश के उच्च सदन में नामांकन के लिए इन चारों श्रेणियों को संवैधानिक स्वीकृति दी गयी। तात्पर्य यह कि ‘कला’, ‘साहित्य’, ‘विज्ञान’ और ‘समाज-सेवा’ को समर्पित ऐसा थोड़ा सा प्रतिनिधित्व सदन में उपलब्ध अवश्य रहे जो गहरा सामाजिक सोच तो रखता ही हो उस दिशा में भर-सक योग-दान भी करता रहता हो। और हाँ, वह चुनाव की राज-नैतिक डगर पर उतरने को, किसी भी मूल्य पर, सह-मत नहीं हो। सरल शब्दों में, नामांकन का सिद्धान्‍त किसी को कुछ देने के लिए नहीं बल्कि उससे कुछ न कुछ पा लेने की राष्‍ट्रीय लालसा से उत्‍प्रेरित है। उदाहरण के लिए, कांग्रेसी राजनीति में आकण्ठ डूबे मणि शंकर अय्यर राज्य सभा के निर्वाचित सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने कांग्रेस से जो भी लेना-देना करना था ले-दे लिया है। और, आज भी ले-दे रहे हैं। यह ठीक है कि आम देश-वासी को इसके बही-खाते से कोई मतलब नहीं है। किन्तु, आम नागरिक के लिए यह तथ्य महत्‍व-पूर्ण है कि वह देश के केन्द्रीय उच्च सदन में सालों बिता चुके हैं। तात्पर्य यह, कि देश राष्‍ट्रीय सदन में उनकी उपस्थिति से पर्याप्‍त लाभान्वित हो चुका है। ऐसे में अय्यर को ‘साहित्य और समाज-सेवा’ में योग-दान के नाम पर पिछले चोर-दरवाजे से नामांकित किये जाने का क्या सच में ही कोई औचित्य शेष रहा था? अय्यर का यह नामांकन सीता-स्वयंवर में शिव-धनुष को उठा पाने तक में अ-समर्थ रहे महा-बलियों को राजा जनक द्वारा दी गयी लल-कार का बर-बस स्मरण कराता है। सीता के अ-विवादित रह जाने से आवेशित जनक ने तब पूछा था, “क्या यह धरा वीर-विहीन हो गयी है?”

सचिन ने आगे बढ़ कर एक सफाई भी दी है। उसने कहा है कि वह ४०० अनाथ बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाता है। बिना किसी बहस-प्रमाण के इसे स्वीकार भी लिया जाये तो भी यह तो तौला ही जाना चाहिये कि सचिन की इस ‘समाज-सेवा’ को चित्र-गुप्‍त के खाते में कितना वजन दिया गया हो सकता है? ठीक इसी तरह, कर्म-योगी कृष्ण की तराजू पर भी इसकी तौल-परख कर ली जानी चाहिए। लेकिन, सचिन के इतने ‘महान’ सामाजिक योग-दान को तराजू के एक पलड़े पर रखें भी तो यह सवाल तो उठेगा ही उठेगा कि तराजू के दूसरे पलड़े पर आखिर क्या रखेंगे? और, यही महत्व-पूर्ण है।

लेकिन इस बिन्दु पर आगे बढ़ने से पहले, आम जीवन में सहजता से दिख जाने वाली एक सचाई को सामने रख लेते हैं। धरम-करम और बद-चलनी के समानान्तर चलते रहने के आज के दौर में ऐसे व्यक्‍ति भी बहुतायत में मिल जाते हैं जो घूस, मिलावट और भ्रष्‍टाचरण से भरे-पूरे अपने चरित्र की दम पर अटा-टूट सम्पदा अर्जित करते रहते हैं। बिल्कुल नि:संकोच और निडर भाव से। डर तो इन्हें विधाता तक का भी नहीं होता है। इसलिए कि वे कुम्भ, अर्ध-कुम्भ अथवा जियारत जैसे सकल धार्मिक आयोजनों में खुल कर खर्च करते हैं — हिसाब बराबर कर लेने के से भाव में! ऐसे व्यक्‍ति जान-बूझ कर इस आधार-भूत आध्यात्मिक दर्शन की अन-देखी करते हैं कि पुण्य चाहे कितना भी क्यों न अर्जित कर लिया जाये, किये गये पापों का लेश-मात्र भी इससे काटा नहीं जा सकता है।

सचिन और उनके पक्ष-धर कहेंगे कि सचिन ने जो कमाया है वह खेल कर कमाया है। और, वे उसी के एक अंश को समाज-सेवा में खर्च रहे हैं। इसके उलट, सच यही है कि सचिन की कमाई का बड़ा अंश प्रायोजन के रास्ते उनके पास आता है। और, इस प्रायोजन को वे ऐसे-ऐसे व्यावसायिक असत्य दावों को ठोंक देने की अपनी क्षमता के सहारे हथियाते हैं जो सामाजिक स्वास्थ्य और सामाजिक मूल्यों, दोनों को ही, व्यावसायिक घरानों के हाथों गिरवी रखते आये हैं। क्रिकेट की उनकी उपलब्धियाँ सचिन को चाहे जितनी स्वाभाविक राज-नैतिक सीढ़ियाँ चढ़ा दें, देश को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इन्हीं उपलब्धियों के सहरे वे चाहे जितने स्वाभाविक सम्मान कमा लें, देश को इस पर भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन संसद्‌ में बैठने की पात्रता तो संसदीय क्रिया-कलापों में योग-दान कर पाने की सम्भावना से ही आँकी जानी चाहिए। विशेष रूप से तब जब किसी को यह पात्रता मात्र इसलिए मिल रही हो कि उसे राष्‍ट्रपति द्वारा नामांकित किया गया है। नामांकन का खजाना अटूट नहीं है। संख्या-बल के आधार पर यह बारह की अधिकतम्‌ गिनती तक ही सीमित है। इस मूल्यांकन पर सचिन सरा-सर कु-पात्र ठहरता है। किसी अन्य कु-पात्र को नामांकित किये जाने का अतीत का एक भी दोष सचिन की कु-पात्रता को ढाँकने-मूँदने या उसकी अन-देखी कर देने का आधार नहीं हो जाता है।

list of present nominated membersसचिन के बहाने आरम्भ हुई मनो-नयन की बहस का एक और अँधेरा पक्ष है। चार व्यक्‍तियों की हाल में हुई घोषणा के बाद राज्य सभा की अधिकृत वैब-साइट पर मणि शंकर अय्यर का भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस से मनो-नीत होना प्रदर्शित हो रहा है जबकि बाकी के तीन का मात्र मनो-नीत होना ही दिखलाया जा रहा है। यह इकलौता तथ्य ही यह स्थापित करने में अपने आप में सक्षम है कि राष्‍ट्रपति द्वारा राज्य सभा के लिए किये जाने वाले मनो-नयन मनो-नीत करने के राष्‍ट्रपति के संवैधानिक प्रावधान से किस सीमा तक भटक चुके हैं? वैसे, यह इकलौता उदाहरण नहीं है। राज्य सभा की ही अधिकृत वैब-साइट दिखला रही है कि बालचन्द्र मुंगेकर नाम का एक और मनोनीत सदस्य भी कांग्रेस पार्टी से मनो-नीत हुआ है। साइट के अनुसार, बाकी सारे के सारे सदस्यों की हैसियत मात्र मनो-नीत सदस्य की है।

(०४ मई २०१२)

1 comment

    • Dr Jay Prakash on May 7, 2012 at 5:57 pm

    बहुत ही बढ़िया लेख। आम जन इस दृष्टिकोण तक आसानी से नहीं पहुँच पाते।

Comments have been disabled.