ललित-लालित्य

Fourth Pocket

मजा ऐसे नटखट बच्चे की तरह है जो निगाह चूकते ही तफ़रीह पर चला जाता है। सार यह कि जैसे बच्चा पालना पड़ता है ठीक वैसे ही मजा भी पालना पड़ता है। ठीक वैसे ही जैसे जो खायेगा स्वाद भी उसी को आयेगा। मजा अन्‍तर्मुखी है — अन्दर है तो है, बाहर निकला तो कपूर की तरह काफूर!

यों, कहें तो खुश-किस्मत भी हूँ और बद-किस्मत भी। मेरी खुश-किस्मती है कि कबीर की उलट-बाँसियाँ सुन रखी हैं। लेकिन बद-किस्मती देखिए, अपनी पैदाइश से लेकर अब तक कुल जितनी उमर होश में गुजारी है उसमें, पब्लिकली, ख़ुद को कबीर का फ़ालोअर डिक्लेयर करने वाले एक भी ऐसे बन्दे को नहीं ढूँढ़ पाया जिसने अपनी जिन्दगी में उलट-बाँसियों वाली फ़िलॉसफ़ी को तरजीह दी हो। और, यह दुनिया इतनी जालिम है कि खुश-किस्मती और बद-किस्मती का जोड़-घटाना कर दुनियावी बैलेंस को नलीफाई नहीं किया जा सकता — खालिस गणित की तर्ज पर। मतलब, खुश-किस्मती का मजा अलहदा लूटिए और बद-किस्मती पर माथा ठोंकते हुए निहायत सैपरेटली, टाइम टु टाइम, ग़म-जदा भी होते रहिए। ठीक वैसे ही जैसे एक ही बैंक की दो ब्रांचेज़ से दो अलग-अलग मदों में उधारियाँ ली हों तो दोनों की इन्सटालमेण्ट्स अलहदा-अलहदा ही चुकानी पड़ती हैं।

खैर, उलट-बाँसियों की बात कर रहा था और इस बद-किस्मती का रोना रो रहा था कि अब उन्हें जानने-बताने वाले नहीं मिलते। बीते से भी पिछले हफ़्ते तक हालात यही थे। लेकिन, इस एक पखवाड़े में हालात बदलते नजर आये हैं। लगता है कि ऊपर वाला मेरे दु:ख-दर्द से पसीजने लगा है। ‘पसीजने’ की बात कह कर मैं ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करने में कोताही नहीं कर रहा हूँ। आई मीन इट — वह पसीजा भर है। ठीक वैसे ही जैसे लू-लपट के दिनों में तब हल्की सी बयार महसूस हो जब जरूरत एसी की हो। बोले तो, निर्मल बाबा की तरह अपनी किरपा बरसायी नहीं है।

कन्फ़्यूज़ मत होइए। मैंने यह नहीं कहा है कि कबीरी उलट-बाँसियों के जान-कार अब मिल जाते हैं। मैंने तो बस इतना कहा है कि ऊपर वाला पसीज रहा है! और हाँ, मेरा बड़ा पुराना दावा है कि और कुछ भी करूँ मैं झूठ नहीं बोलता। आज भी, अपने इस क्लेम पर अड़ा हूँ। सौ टंच। पर, जैसे सिंगल-पार्टी हुकूमत और गठ-बन्धन वाली सरकार में प्रैक्‍टिकल डिफ़रेन्स होता है, मेरे इस कन्फ़ैशन में भी थोड़ा-बहुत कन्टैमिनेशन तो है ही। बियॉण्ड माई कण्ट्रोल।

देखिए ना — हिन्दुस्तानियत से अंग्रेजियत में ट्रान्स-फ़ॉर्मेशन की बदौलत, ‘ऊपर वाला’ पहले ‘ऑल-माइटी’ हुआ। फिर, जैसे-जैसे सिंगल-पार्टी रूल की जगह मल्टी-पार्टी सरकारें बननी शुरू हुईं, ‘ऑल-माइटी’ धीरे से ‘ऑल-माइटीज़’ हो गये। फिर, जनता इस कोलीजन-गवर्नेन्स से प्रभावित हुई तो टू-पार्टी कोलीजन की बनिस्बत, अपनी रोज-मर्रा की जरूरतों के मुताबिक, मल्टी-पार्टी गठ-बन्धन पर ठप्पा लगाने लगी। मेरा मतलब है, एक अदद नीयत से ओरिएण्टेड ‘ऊपर वाले’ की जगह अब, गली-कूचों के मल्टीपल इण्टरेस्टों को पालने-पोसने वाले, अन-गिनत ‘ऊपर वाले’ छा गये हैं! कुछ-कुछ वैसे ही जैसे कीमतों को बाजार के हाथों सौंप देने की वकालात करते वक़्त, बे-इन्तिहा बे-चारगी से भरे, वे ’दार जी और ’दा दिखते हैं जिनमें से एक तो वजीरे आजम हैं और दूसरे के बारे में भारी-भरकम रियूमर है कि उन्हें पीएम बनने से तो अब तक रोके रखा गया है लेकिन सदर की कुर्सी पर बैठने से रोक पाना, कम से कम आज तो, पॉसिबिल नहीं दिख रहा।

मेरी बातों से आपको लग रहा होगा कि मैं ख़ुद के ईगो के कारण भ्रष्‍टाचार और काले-धन की लड़ाइयों को एक-दूसरे से एक-दूसरे से जुदा करके दिखलाने वाले बचकाने से दो बुड्‍ढे-अधेड़ कुँआरों के फ़ालोअर्स की धीरे-धीरे उजागर होती कुण्डलियों के पन्ने लहराने की कोशिश करूँगा। नहीं, न मैं गुरुओं के कसीदे काढ़ूँगा और न उनके चेले-चपाटियों के इतिहास के पर्चे बाँटूँगा। मैं तो चार-चार सैण्ट्रल मिनिस्टर्स द्वारा पहले कैबिनेट से थोक में रिजाइन करने और फिर, उतने ही थोक में मना कर देने की अफ़वाहों के पत्ते भी नहीं खोलूँगा। और तो और, अतीत में महा-महिम की सीट पर बिराज कर शालीनता से लब-रेज बातें करने वाले मिसाइल-मैन ने, बीते दोनों, लोकपाल के मुद्दे पर जो ताजा-तरीन मिसाइल इन्वेण्ट की है उसके पीछे काम कर रही हिज़ मेजेस्‍टी ईक्वेशन्स का खुलासा भी नहीं करूँगा।

और, यदि आपको लगता है कि एनसीटीसी के प्लेट-फ़ॉर्म पर बिहारी बाबू नितीश और गुजराती मोटा भाई नरिन्दर की मुलाकाती जुगल-बन्दी की टीवी क्लिप्स को पॉलिटिकल उलट-बाँसी बतलाने की हिमाक़त करूँगा तो यह भी आपकी समझ की ऐसी चूक होगी जैसी भोले-भाले हिन्दुस्तानी अक्सर तब कर जाते हैं जब सच्ची-मुच्ची के किसी क्रिटिकल इश्यू पर पार्लियामेण्ट्स में वोटिंग होने को होती है। बहस-बाजी पर भरोसा करके। ‘गिव एण्ड टेक’ टेक्नालॉजी की पॉलिटिकल महारत को इग्नोर करके!

और हाँ, मैं कोई स्वीडन का एक्स पुलिसिया चीफ़ भी नहीं हूँ कि गड़े मुर्दों को इसलिए उखाड़ने बैठ जाऊँगा कि घोटाले में फँसे हुए दिखते कुछ खासे बड़े बन्दों को, इस या उस कारण से, शर्मिन्दगी से उबारने बैठ जाऊँ। दरअसल, बात एक-दम दो टूक है। कल, मेरे एक दोस्त टकरा गये। ललित श्रीवास्‍तव नाम से फ़ेमस हैं। कुछ नामी-गिरामी डेलीज़ के सम्पादक रह चुके हैं लेकिन लम्बे अर्से से कलम-घसीटी से संन्यास ले रखा है। जैसे खेत में कटी पड़ी रबी की फसल के दिनों में बिना नोटिस औचक ओलों वाली बरसात हो जाया करती है, उन्होंने अपना लेटेस्‍ट दर्शन झाड़ दिया —

“मजा ऐसे नटखट बच्चे की तरह है जो निगाह चूकते ही तफ़रीह पर चला जाता है। पर, यदि आप एक ममता-मयी माँ की तरह हैं तो वह भी ठीक वैसे ही आपके पास लौट आता है जैसे कोई छोटा सा बच्चा स्तन-पान के लिए माँ के पास लौट आता है। सार यह कि जैसे बच्चा पालना पड़ता है ठीक वैसे ही मजा भी पालना पड़ता है। भले ही, इसमें वैसे ही कष्‍ट हों जैसे बच्चा पालने में होते हैं। पर, जब बच्चा पालने का अपना मजा है तो मजा पालने का मजा क्यों नहीं होगा? और, जब आप यह मजा पाना चाहते हैं तो उससे जुड़ा कष्‍ट क्या कोई और उठायेगा? क्योंकि जो कष्‍ट उठायेगा, मजा भी उसी को ही तो आयेगा। ठीक वैसे ही, जैसे जो खायेगा स्वाद भी उसी को आयेगा। तो मजे के इच्छुक साधको, यदि कल मजा चाहते हो तो आज कुछ कष्‍ट उठा लो। मजा अन्‍तर्मुखी है — अन्दर है तो है, बाहर निकला तो कपूर की तरह काफूर!”

समझ में आया कि नहीं? लालित्य जो है सो है, ललित-लालित्य तो बस, यही है!

(०६ मई २०१२)