जितने बीरबल, उतनी ही हाँडियाँ

Fourth Pocket

लोकपाल की निरर्थकता पर अपने ख़यालात पब्लिक करके मिसाइल-मैन ने भी एक टेस्ट-फ़ायर किया है। इससे पहले वह कह चुके थे कि अपने कैण्डिडेचर पर समय आने पर ही मुँह खोलेंगे। गोया, रत-जगे का निचोड़ महज इतना है कि जितने बीरबल होंगे, हाँडियाँ भी तो उतनी ही होंगी!

ऊपर वाले की फितरत से गढ़े गये मियाँ फन्ने खाँ सरे आम मेरा रास्‍ता रोके खड़े थे। बिना इस सचाई का सम्मान किये कि रुक पाना मेरे लिए निहायत असम्भव था। मैंने ‘एक्सक्यूज़ मी’ एक्सप्रैशन वाली अपनी मौन एप्लिकेशन आगे बढाई। लेकिन उन्होंने उसे रद्‍दी की टोकरी के हवाले कर दिया। तब, बा-कायदा वाचिक परम्परा में, माफ़ी-नामा आगे बढ़ाया। दुखड़ा रोया कि कल के दो कौरों के जुगाड़ को लेकर फ़्रस्‍टेटेड हूँ, आज के लिए मुक्‍ति अता करें। इतना सुनना था कि वे भड़क गये — म्याँ, उधर पूरी की पूरी हाँडी चढ़ी है और इधर आप हैं कि दो कौरों का बहाना बना कर फरमा रहे हैं कि ना-चीज की बात सुनने तक की फुरसत नहीं है!

आने वाले कल के फाँके के डर पर आज के आज ‘स्वार्थी होने’ की, परफ़ैक्‍ट क्लेव्हरता से चस्पायी गयी, यह दार्शनिक तोहमत इतनी भारी ठहरी कि इमीजिएट इफ़ैक्‍ट से नौ दो ग्यारह होने में ही मुझे अपनी भलाई दिखी। यों, फन्ने खाँ साहिब के बारे में बतला दूँ। हममें से कोई नहीं जानता कि इनके अब्बा हुजूर बचपने में क्या कह कर पुकारते थे? क्या नाम दर्ज करवा कर मदरसे में दाखिला दिलवाया था, यह भी नहीं। हाँ, मिलने-जुलने वाले इनकी बातूनी फितरत से इस क़दर बिदकते थे कि, इनकी जान-कारी में आने को बरकाते हुए, ‘फन्ने खाँ’ की पदवी से नवाज रखा था।

खैर! अगले दिन की दावत का न्यौता हासिल कर रात चार-पायी पर पीठ टिकायी और सोने से पहले पूरे दिन की अकाउण्टिंग की तो फन्ने याद आ गये। दोस्‍त इनसे छरकते ही इसलिए थे कि इनके एक रिमार्क में अनेक बातों के पेंच छिपे होते थे — बस, प्याज की मानिन्द, अनुमानों के छिलके पर छिलके उतारते रहिए। पूरी प्याज नेस्‍तनाबूद हो जायेगी, छीलने वाले की आँखें ढार-ढार आँसू बहाती रहेंगी लेकिन मजाल है जो कोई बन्दा यह क्लेम करने की हिमाकत कर पाये कि वह भाई के असली मक़सद की तह तक पहुँच गया है! मेरा मतलब है, मेरी पूरी रात हाँडी और उसके चढ़ने की तफ़तीश करने की भेंट चढ़ गयी।

सबसे पहला खयाल तो यही आया कि, हो न हो, पॉलिटिक्स की ताजी लफ़डे-बाजी में अपने-अपने मोहल्लों के बीरबलों ने जो-जो हाँडियाँ चढ़ा रखी हैं वे उन सबके चावल टटोल कर आ रहे होंगे। सालों के एक्सपीरिएन्स के बूते, अपने तईं, श्योर भी था कि नब्ज तो ठीक-ठीक पकड़ ली है। बस, मर्ज की तफ़सील बाकी है। लेकिन, बड़ी जल्दी पाल ली इस खुश-फ़हमी का खामियाजा यह भुगता कि हर हगी-मुती पॉलिटिकल अटकल-बाजी असली सीक्रेट नजर आने लगी। ‘हाँडी-दर्शन’ की ऐसी जद्‍दो-जहद ने नींद तो उड़ायी ही उड़ायी, दिमाग़ की चूलें तक हिला दीं।

चलिए, शुरू करता हूँ। सबसे पहले यह सूझा कि ‘रात वाली दवा’ को टैक्स के बोझे से निजात करने की दुहाई देकर यूपी इलेक्शन में पार्टी को मेजॉरिटी- सपोर्ट दिलवाने वाले अपने साहब-जादे को सीएम की, अपनी खुद की ही मनो-वांछित, सीट पर बैठा कर नेता जी ने बड़ी मुलामियत से दिल्ली-दरबार तक सन्देशा भिजवा दिया था कि अब वह एक नयी हाँडी चढ़ा रहे हैं। लेकिन, लगता है कि जिस स्वार्थ की चाहत ने नेता जी की बुद्धि कुन्द की हुई है दिल्ली की आला-कमान हुजूर और उनकी देखा-देखी उनके कारिन्‍दे वग़ैरह ने भी तो उसी की पट्‍टी अपनी आँखों पर चढ़ा रखी है। और इसलिए, उन्होंने न्रेता जी की नीयत को बीरबल की खिचड़ी जैसी मामूली तरजीह दी। बदले में, आग-बबूला हो कर नेता जी ने भी प्रेसीडेण्ट-इलेक्शन में कलाम साहिब के कैण्डिडेचर को अपना वोट देने के ‘राग बीजेपी’ को पब्लिकली सपोर्ट कर दिया।

लगा, सूझ की मेरी यह रेल अपने डेस्टिनेशन तक मजे से पहुँच जायेगी। पर तभी लगा जैसे फ़ाइव इयर प्लान की इस रेल को ममता-हाल्ट को तरजीह देने की माँग ने जबरदस्त ठोकर मारी हो। पहले तो दीदी ने फरमाया कि लाइन में तो कई केण्डिडेट्स हैं। फिर धमका दिया कि पार्लियामेण्ट के इलेक्‍शन सोच से भी पेश्‍तर हो सकते हैं! गोया, कांग्रेस पॉलिटिकल पार्टी न हुई पटरी के बीचों-बीच खड़ी गुड्‍स ट्रेन की सर-प्लस रैक हो गयी। गरीब की उस लुगाई की तरह जिसे हर कोई भौजी कह कर बुलाना चाहता हो। जिसके दोनों ओर से ट्रेनें हेड-ऑन कोलीजन की मंशा से सर-पट दौड़ी आ रही हों। ‘दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय’ वाले लहजे में कभी इसे तो कभी उसे देखती-मनाती बे-बस सी। यों, बहन जी भी याद आयीं। लेकिन, उनके बारे में फेमस है कि, पॉलिटिकली, वे एक बे-पैंदी की लुटिया हैं। जिस तरफ़ का टिकोना भारी-भरकम सपोर्ट ऑफ़र करेगा उसी तरफ़ टिक जाने वाली। लेकिन, जैसे लुटिया और टिकोनों की म्यूचुअल रिलेशन-शिप परमानेण्ट नहीं होती है वैसे ही इनके पॉलिटिकल ऑब्लिगेशन्स भी निहायत पर्सनल और बे-हद अन-स्टेबल होते हैं।

जैसे हर रात के बाद दिन आता है या, जिन्हें मेरे इस लहजे से ऐतराज हो उनकी तसल्ली के लिए, जैसे हर दिन के बाद रात आती ही आती है ठीक वैसे ही पॉलिटिकल ऑब्लिगेशन्स की हर अन-स्टेबिलिटी का एक छोर निहायत परमानेण्ट डिपेण्डेबिलिटी से जुड़ा होता है। देखिये ना! कांग्रेस के असली वजन-दारों के दिलों में प्रेसीडेण्ट के लिए बाबू मोशाय से ज्यादा भरोसा हामिद अन्सारी के लिए है। कहने वाले कहते हैं कि ताजे दौर में दोनों ही सरकार के ‘संकट-मोचक’ साबित हुए हैं। अच्छा चलिए, आपके टोकने को समझते हुए एक जरूरी सुधार किये देता हूँ — एक ट्रबल-शूटर तो डुसरा तारन-हार! लेकिन दादा मोशाय का अतीत चुगली खाता है कि, मैरिट पर ही सही, उन्होंने आला-कमानों पर आँखें भी तरेरी थीं। जबकि उनके रकीब को वह भी नहीं दिखता-समझ पड़ता है जिसे हर कोई, सहज इन्द्रियों से, देख-समझ सकता है। जैसे इतना ही इनफ़ न हो, पार्लियामेण्ट के अपर हाउस के ताजे सीवरेज-गैस काण्ड की ओर यह कह कर उँगली उठाई जा रही है कि बदबू समझ नहीं आयी तो नहीं आयी, सांसदों की पुर-जोर शिकायत पर सदन को स्थगित करने से पहले मेम्बरान की इजाजत भी तपासी गयी — शैल वी एडजॉर्न द हाउस? यों, लोकपाल की निरर्थकता पर अपने ख़यालात पब्लिक करके मिसाइल-मैन ने भी एक टेस्ट-फ़ायर किया है। इससे पहले वह कह चुके थे कि अपने कैण्डिडेचर पर समय आने पर ही मुँह खोलेंगे।

सॉरी टु से, रत-जगे का निचोड़ महज इतना है कि जैसे गणित में दो और दो चार होते हैं वैसे ही पॉलिटिकल एम्बीशन में जितने बीरबल होंगे, हाँडियाँ भी तो उतनी ही चढ़ेंगी!

(१३ मई २०१२)