बरदाश्‍त की हद

Fourth Pocket

ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये, एक बात साफ़ कर दूँ कि ख़यालों की मेरी टोकरी में, यूपी इलेक्शन में झेली इतनी बुरी हार की फ़ाइनल एनालिसेज़ के बाद, कांग्रेसी बेगम-हुजूर के आये उस रिएक्शन का आधा परसैण्ट भी नहीं था कि अनुशासन-हीनता कतई बरदास्‍त नहीं की जायेगी!

“यदि कहूँ कि दिन भर के खाली-पन से बुरी तरह चुक गया था तो मेरे इस ईमान-दार कबूल-नामे से आपको लगेगा कि मैं ख़यालों से बिल्कुल खाली हो चुका हूँ। ठीक भी है। पर, उतना भी ठीक नहीं कि आप, पहले तो अपने खयालों के सटीक होने की खुश-फ़हमी पाल लें और फिर, खुद के ही पाले अपने इस मति-भ्रम के लिए, मुझसे इतराने लगें। दरअसल, सुबह से ही मेरे पास ऐसे एक भी आइडिया का टोटा रहा जो मुल्क के हालातों पर निहायत फिट बैठें!”

ना, ना! यह मेरा नहीं बल्कि हमारे वाले पटिया-फ़ोरम के सबसे बेहतर बुजुर्ग का डिपार्चर-नोट था। गर्मी से सद्‍द हुई मई महीने की पटिया-गोष्‍टियों में ऐसे कन्फ़ेशन्स अमूमन एक्सैप्शनल ही होते हैं। और, हण्डरेड एण्ड वन पसैण्टेज वाले ऐसे सरेण्डर होते भी इसीलिए हैं कि कबूलने वाला आगे के और बत-कहाव से कन्नी काटना चाहता है — एक छोटी सी बदमाशी के साथ! और, उसका यह दाँव मुझ पर ब-खूबी चल गया।

उसके जाते ही मैं, अन-मना सा, घर वापस हो लिया। अन-मना इसलिए कि मुल्क के हालात पर बेचैन होते निठल्लों की लम्बी सी फेहरिश्‍त में खुद को कम से कम ‘टॉप ट्वेण्टी’ में दिखलाने को मैं तो न जाने कब से तरस रहा था लेकिन कम-बख़्त हम-वतन हैं कि अन्नाओं-बाबाओं, बहनजियों-दीदियों और कानून व संविधान के साथ खेल-खेल में बलात्‍कार तक कर गुजरने वाले नेताजीओं और संविधान-वेत्ताओं जैसी शख़्सियतों के आगे मुझ पर निगाह तक नहीं डाल रहे थे। अब तो, ऐसा भी सुनने में आया है कि किसी बड़ी अदालत ने ठहरा दिया है कि स्‍त्री की पवित्रता उसकी सम्पत्ति थोड़े ना है! ऐसे में, फ़्यूचर भी अपने हाथ से खिसका हुआ दिख रहा था। रंजो-ग़म का यह पहाड़ उस दिन इतना भारी फ़ील हुआ कि पटिया-गोष्‍टी में गिटकी दो प्याला चाय ही नींद के लिए काफ़ी साबित हुईं। बिना खाये-पिये बे-सुध सो गया।

अल सुबह होश वापस आने पर पाया कि रात भर में मेरी बे-चारगी काफ़ूर हो चुकी थी। वह कहते भी हैं ना कि दर्द की इन्तिहा ही दवा बन जाती है। जैसे, एक ही उल्लू काफ़ी है…! ठीक वैसे ही, केवल एक ट्रिगर ही काफ़ी होता है ख़यालों की टोकरी लबा-लब भरने के लिए — बाक़ी के ख़याल ख़ुद-ब-ख़ुद दौड़े आते हैं। अब यह पूछेंगे कि मेरा वह ‘ट्रिगर’ क्या था? और, कहाँ से सप्लाई हुआ था? तो, ‘ट्रिगर’ का राज तो डैज़र्ट की नाईं डिनर के फ़िनिशिंग-टच तक बचा कर रखूँगा लेकिन उसकी सप्लाई लाइन अभी के अभी उजागर किये देता हूँ — ख़यालों की बोनी खटिया के नीचे मिले अखबार ने की थी।

सुबह का कोई न कोई अखबार आपने भी बाँचा होगा। आज भी, कल भी और परसों-तरसों भी। और, यह बड़ी जानी-मानी बात है कि ढेरों अखबार ‘कट एण्ड पेस्ट’ इकॉनामी पर छापे जाते हैं। मेरा मतलब है, आज डिलीवर हुए अखबार में बीते दिनों डिलीवर हो चुके किसी अखबार की बासी-तिबासी खबरें भी मिल जाती हैं। ऐसे में, एक हिण्ट दिये देता हूँ कि मेरी खबर पॉलिटिकल थी। यह खुल्लम-खुल्ला हिण्ट देने की रिस्क महज इसलिए उठा रहा हूँ कि इतने समझ-दार तो आप होंगे ही कि सिबल और चिदम्बरम को बचाने और प्रणव मोशय को भुलाने की भाजपा-पोषित अफ़वाहों के पीछे छिपे मन्सूबों को, और उनके बासे-पन को भी, सूँघने की काबलियत रखते होंगे।

अब यदि आप यह सोच रखते हों कि पॉलिटीशियन्स के बीच ज्यादा-तर तो अन्दरूनी मिली-भगत ही रहती है तो मैं एक बात साफ़ दूँ कि मैं उनमें से नहीं हूँ जिन्होंने अपने मन में यह पाप पाल लिया है कि घर में दुबक कर बैठ गये मनु सिंघवी जिस घिनौनी सीडी के चक्कर में पड़े वह सिबल और चिदम्बरम को उनसे हो रही जेलसी का प्रोडक्‍ट थी। सच कहूँ, मुझे उन शिगूफ़ों में न तो कोई दिलचस्पी है, और ना ही भरोसा, कि यह जलन इसलिए परवान चढ़ी कि सिंघवी ने आला-कमान और अहमद भाई के बीच पकती आ रही निहायत अन्दरूनी खिचड़ी में से कुछ दानों के स्वाद का चटखारा लेना शुरू कर दिया था। और हाँ, आड़े हाथों लेने के तेवर दिखाते-दिखाते जेटली भाई ने पार्लियामेण्ट के फ़्लोर पर यह जो सिंघवी को बख़्शा था, उसे भी मैं जस्‍ट संयोग ही मानता हूँ।

यही नहीं, संसद्‌ का ‘साठा सो पाठा’ मनाने की फ़ॉर्मेलिटी के फ़ोटो-शूट में दादा-मोशाय की कुर्सी पर जेटली को सु-शोभित कर अहसान जतलाने जैसे फ़ैक्‍ट के बाद भी, न तो मैं उन दिल-जलों से एग्री करता हूँ जो यह ताना मारने में जुटे हैं कि हमारी पर्लियामेण्ट सठिया गयी है। और, न ही उनकी ऐसी बातों पर तन्नक सा भी भरोसा करता हूँ जिनके सहारे वे पॉलिटिकल भुस के ढेर में यह कहते हुए चिनगारी लगाने की फिराक़ में हैं कि रियायत की यह बरखा जेटली ने नहीं बल्कि बीजेपी ने रची थी — सिंघवी के पिताश्री से रहे अपने सम्बन्धों की खातिर।

दरअसल, किसी अखबार में छपी मण्टो की एक शॉर्ट स्टोरी छपी थी। लब्बो-लुबाब यह था कि ने खीझ में भरे एक बन्दे ने अपनी पाँच राउण्ड पिस्टल से जो फ़ायरिंग की उसका रिजल्‍ट परसैण्टेज ५० रहा — कुल जमा दो मरे, दो बे-दाग़ बचे और एक घायल तो हुआ पर मरने से बच गया। इस रिजल्ट ने उसकी खीझ इस क़दर चौगुनी कर दी कि उसने पिस्टल एक निरीह बच्चे पर ही तान दी। उसे ऐसा करते देख कर उसके साथी ने टोका कि खाली पिस्तौल बच्चे पर ऐसे तानने का क्या तुक है? अपनी हार से खीझे हुए उस इन्सान का टके सा जवाब था, “एक निरीह बच्चे को यह सब क्या मालूम!”

जी हाँ, बिल्कुल ठीक समझे। यह किस्सा पढ़ते-पढ़ते मुझे भरोसा हो गया कि हमारे मुल्क की सो-काल्ड पर्लियामेण्टरी डेमोक्रेसी पर यह फब्ती, हो न हो, मेरे जैसे झल्लाये बैठे किसी दिल-जले ने ही कसी होगी। शायद, उसने मिसेज़ बच्चन के उस ऑब्जैक्‍शन को नोट किया होगा जो उन्होंने रेखा द्वारा शपथ लेते समय टीवी कैमरे का फोकस ज्यादा-तर उन पर ही रखने को लेकर उठाया था। या शायद, उसने मँहगाई के लगातार बढ़ने पर आयी असलम भाई की उस टिप्पणी को अदर-वाइज़ ले लिया था जिसका जिस्ट था कि जब इलेक्शन इतने मँहगे होंगे तब ये सब तो होना ही है!

लेकिन, ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये, एक बात साफ़ कर दूँ कि ख़यालों की मेरी टोकरी में, यूपी इलेक्शन में झेली इतनी बुरी हार की फ़ाइनल एनालिसेज़ के बाद, कांग्रेसी बेगम-हुजूर के आये उस रिएक्शन का आधा परसैण्ट भी नहीं था कि अनुशासन-हीनता कतई बरदास्‍त नहीं की जायेगी!

(२० मई २०१२)