अबकी बारी, उसकी बारी!

Fourth Pocket

प्रेसीडेण्ट के इलेक्‍शन को ही लें। यह पक्का है कि यह छींका जुलाई में टूटने वाला है। और, जब छींके के टूटने की श्योरिटी हो तो उसमें अपना नाम ढूँढ़ने वालों की लम्बी सी कतार तो तैयार होगी ही होगी। सो, वह भी तैयार है जिसमें हर वैरायटी के पॉलिटिकल प्राणी शामिल हैं। कर्णी सिंह जैसे आउट-डेटेड भी!

“मान गये गुरू, मरा हाथी भी लाख का होता है!” कन्धे पर पड़ी एक जोर-दार धौल और दहलाने वाले इस कान-फोड़ू धमाके की टाइमिंग्स इतनी सिंक्रोनाइज़्ड थीं कि नासा के सबसे तेज-तर्रार कम्प्यूटर के लिए भी यह पहेली सॉल्व करना मुश्‍किल होता कि मुझे पहली ठोकर इन दोनों में से किसने मारी थी?

ना, ना! इसे मेरी अप-संस्कृति मत मनिये। डर लगता है कि जैसे ’दार जी को शिखण्डी से कम्पेयर कर के कुछ कह देने से कांग्रेसी साइड वाले दुर्वासा लोग टीम अन्ना के कोर मेम्बर्स पर चढ़ दौड़े थे, कहीं उसी तरह आप भी मुझसे खफ़ा न हो जाएँ। इसलिए जैसे भूषण महाशय ने सफ़ाई दी है कि ‘शिखण्डी की तरह’ इस्तेमाल किये जाने की बात करके उन्होंने भरे-पूरे परिवार वाले हमारे कांग्रेसी-पुंगव पीएम पर कोई पर्सनल, वह भी शिखण्डी जैसा ओछा-घटिया, हैल्थ-बुलेटिन जारी नहीं किया था; ठीक वैसे ही, मेरी एक्सप्लेनेशन यह है कि घण्टों से ऐसे ठसा-ठस रोड-जाम में फँसा हुआ था कि कन्धे से कन्धा छिला पड़ रहा था। इंच-इंच तपास कर भी पैरों को ब-मुश्‍किल कुछ मीटर ही घिसटा पाया था। ऐसी बे-बसी में धौल जमाने वाले को, घूरने के लिए ही सही, मुड़ कर देख पाना ठोकर खा कर लड़-खड़ाने जितना दुश्‍वार था। समझ रहे हैं ना — फड़नवीस ने भी तो कहा था कि संकट की घड़ी में आदमी अपनी पर उतर ही आता है।

‘अपनी पर उतरने’ से ध्यान आया। कहते हैं कि एक बार अमीरी का खून लग जाए तो आदमी अमीरी बर-करार रखने के लाख जतन ढूँढ़ने से भी नहीं चूकता — सही-गलत के ख़यालों को ठोकर मार कर भी! देश के ताजा हालातों ने इसे रि-प्रूव भी कर दिया है। चलिए, मान लेते हैं कि पिटरोल के जो भी दाम बढ़े हैं वो घूस-खोरी, दलाली वगैरह-वगैरह से सरकारी खजाने को हुए नुकसानों की चुल्लू भर भर-पायी के लिए बढ़ाये गये हैं। लेकिन इससे क्या? कुछ तो करना था! और, कोलीजन-गवर्नेंस में यही सबसे आसान तरीका है। लेकिन, मँहगी कारों और सीक्योरिटी गार्डों से घिरे हाई प्रोफ़ाइल पॉलिटीशियन्स और बिज़नेस पर्सन्स ने जैसे पूरा का पूरा यूनिवर्स ही सिर पर उठाने की ठान ली है। ऊपर से तुर्रा यह कि इसके लिए ग़रीब की बे-हाली का सियापा पढ़ा जा रहा है। वह भी इतनी नेक-नीयती से कि लोग इन ‘नेक-नीयत’ इन्सानों को किसी न किसी शोक-सभा की सदारत के लिए न्यौतें ही न्यौतें।

कण्डोलेंस मीटिंग्स में बुलाये जाने को तरसते ‘नेक’-दिल इन्सानों से याद आया कि फ़िल्मों के लिए ही सही, किसी ने बड़ा सटीक लिख छोड़ा है — पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए। अब आप कहेंगे कि मैं भी भेड़ों के उसी झुण्ड में शामिल हूँ जिसको क्रिटिसाइज़ करने का दिखावा कर रहा हूँ। बिल्कुल ग़लत। जरा पॉलिटिक्स से लगा कर क्राइम तक के सारी तरह के माफ़ियाओं की ओर से अदालतों में पैरवी करते आ रहे सीनियर लायर, मेरा मतलब है वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता, जेठमलानी को याद कीजिए। वही जेठमलानी जिनके बारे में माना जाने लगा था कि पॉलिटिक्स की लेटेस्‍ट आपा-धापी में गुम-नामी के गर्त में इतने गिर गये हैं कि पार्टी वर्कर्स तक भूल चुके हैं कि वे बीजेपी कोटे से पार्लियामेंट में बिराजते हैं! पार्टी-प्रेसीडेण्ट को लगातार दूसरी बार भी पार्टी का मुखिया चुने जा सकने के बीजेपी के हालिया डिसीजन से बौखलाये ‘राम’ करप्‍शन पर चुप्पी के लिए गडकरी पर बरस गये।

करप्शन से एक धुरन्धर और याद आ गये। ‘धुरन्धर’ मंजे ‘एक समय के धुरन्धर’। जी हाँ, खैरनार साहिब। एक दौर था जब इनकी तूती बोलती थी। बाद में पता नहीं क्या हुआ, शायद भ्रष्‍टाचारियों के रुतबे का ग्राफ़ इतना और ऐसा सर-पट ऊँचा उठा कि खैरनार जी की खैर-खबर लेने वाले ढूँढ़े-ढूँढ़े भी नहीं मिले। तभी अचानक हजारे का ग्राफ़ ऊँचा उठने लगा। कहने वालों ने तो कह भी डाला कि हजारे की पीक खैरनार की पीक से, सैण्टीमेण्टली, कहीं ज्यादा ऊँची उठी। ग्राफ़्स के सैण्टीमेण्ट्स की इस अदला-बदली में सज्जनता हिन्द महासागर में डूब गयी। देखने में आ रहा है कि खैरनार अन्ना की नेक-नीयती के पीछे लट्‍ठ ले कर ठीक वैसे ही पड़ गये हैं जैसे कि अन्ना कांग्रेस के पीछे पड़े हैं।

लब्बो-लुबाब यह कि, सब दूर बस मौके को लपकने की होड़ मची हुई है — ‘मत चूक्यो चौहान’ वाले लहजे में। और, हम सभी जानते हैं कि अनियन्‍त्रित पैदाइश के मारे हमारे देश में इन पायरेटेड चौहानों की भर-मार हो गयी है। और हाँ, जैसे दूबरे की किस्मत में एक न एक बार दो आसाढ़ आ ही जाते हैं वैसे ही हमारे देश के चौहान भी एक न एक चन्दबरदाई कबाड़ ही लेते हैं। यों, अमूमन यह बहुत ऑवियस नहीं होता लेकिन जैसे बरसात शुरू होते ही मेंढकियाँ ही मेंढकियाँ दिखायी देनी शुरू हो जाती हैं ठीक वैसे ही इन चौहानों के नसीब से भी कोई न कोई छींका टूटता ही रहता है। अब, प्रेसीडेण्ट के इलेक्‍शन को ही ले लें। यह पक्का है कि भारी-भरकम सा यह छींका जुलाई में टूटने वाला है। और, जब छींके के टूटने की श्योरिटी हो तो उसमें अपना नाम ढूँढ़ने वालों की लम्बी सी कतार तो तैयार होगी ही होगी। सो वह भी तैयार है जिसमें हर वैरायटी के पॉलिटिकल प्राणी शामिल हैं — देश के लिए निकम्मों लेकिन खुद और करीबियों के लिए बेहद फ़ायदे-मन्द से लगा कर कई-कई बार आउट-डेटेड साबित हो चुके बन्दे भी। और तो और, खुद ‘महाराजा’ कर्णी सिंह जैसों को भी लगने लगा है कि अबकी बार उनकी बारी पक्की है!

यों, मेरी तरह आपको भी लगने लगा होगा कि अटल बिहारी के दौर से शुरू हुआ यह ‘अबकी बारी, मेरी बारी’ वाला डेमोक्रेटिक खेल रजवाड़ों-सल्‍तनतों वाले दौर के पुराने दरबारी ढर्रे में ढल गया है। इस ढर्रे की पुख़्ता पहचान यह है कि यदि कोई दरबारी चमचा तख़्त-नशीन शख़्शियत के कुछ ज्यादा करीब नजर आने लगे तो यह नजारा बाकी के चमचों में से किसी को भी फूटी आँखों नहीं सुहाता। कबर खोदने के तरीके तलाशे जाने लगते हैं। सिंघवी दफ़न हुए तो कहा गया कि उनकी कब्र चिदम्बरम ने खोदी थी, सिब्‍बल के साथ मिल कर। सुनते हैं, अब सिंघवी भी पलट-वार के लिए तैयार हैं — ड्रम-बीट पर थिरकते चिदम्बरम की फोटू दिखा-दिखा कर अफ़वाहें फैला रहे हैं कि नेहरू, इन्दिरा और राजीव के नक्शे-कदम पर चलते हुए अन्ना पीएम की कुर्सी की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है!

(२७ मई २०१२)