‘ना’ कहने का अधिकार

Atithi-Vichar

वर्षों तक पत्रकारिता के सक्रिय हिस्से-पुर्जे रहे आये सत्येन्द्र त्रिपाठी ने अपना एक आलेख प्रकाशनार्थ हमें भेजा है। विषय-वस्तु की सर्व-कालीन सम-सामयिकता के कारण ही, १० जनवरी १९९८ को राष्‍ट्रीय हिन्दी दैनिक ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित हो चुकने के बाद भी, मैं इस आलेख को (किंचित्‌ सम्पादन के साथ) यहाँ स्थान दे रहा हूँ।

सत्येन्द्र त्रिपाठी लिखते हैं —

“यह अधिकार मिलना आसान नहीं होगा। राजनैतिक दलों, उनके मठाधीशों, ज़मीन से कटे सत्ता-लोलुप और चाटुकार नेताओं तथा सत्ता के दलालों को स्वीकार नहीं होगा कि यह अमोघ अस्‍त्र जनता के हाथ में चला जाए। ऊपर-ऊपर वे भले ही इससे सह-मत होते दिखें लेकिन भीतर ही भीतर वे इस लड़ाई को उलझाने, और वास्तविक शक्‍ति को आम नागरिक के हाथों स्थानान्तरण को लटकाने, का भरसक प्रयास करेंगे। ठीक वैसा ही जैसा उन्होंने ‘सूचना का अधिकार’ और ‘महिला-आरक्षण’ जैसे मुद्दों के साथ किया है। किन्तु यदि जनता इस बेकाबू सत्ता-तन्त्र को सच-मुच में ही नियन्‍त्रित करना चाहती है तो उसे ‘ना’ कहने के अधिकार की माँग समवेत्‌ स्वर में करनी होगी। हासिल भी करना होगा। तभी उसकी वास्तविक सम्प्रभुता स्थापित होगी। सच्चे लोक-तन्‍त्र का निर्माण भी तभी हो सकेगा।”

कहने को, जनता लोक-तान्‍त्रिक राज्य-सत्ता की नियन्‍ता है। उसके द्वारा चुने गये प्रतिनिधि ही सरकारें बनाते और बिगाड़ते हैं। लोक-तन्‍त्र सबको समान मताधिकार देता है। और, इस अधिकार का प्रयोग कर बहु-संख्यक नागरिक जिसे चुनते हैं, वही सबका प्रतिनिधि होता है। इससे अधिक न्याय-संगत्‌ व्यवस्था और हो भी क्या सकती है? पर, लोक-तन्‍त्र यदि वास्तव में बहुसंख्यक नागरिकों के विवेक-पूर्ण चुनाव पर आधारित है तो, उसका हमारा स्व-रूप आज इतना कुरूप क्यों है? स्व-तन्‍त्रता की प्राप्‍ति के पचासवें वर्ष में क्यों हर ओर हताशा और खण्डित सपनों का इतना कुहासा छाया हुआ है? क्या दिशा-हीन विधायिका, बे-लगाम भ्रष्‍ट प्रशासन और बाज़ार बनता जीवन — यही जनता-जनार्दन की आकाँक्षा का फ़लित है, जिसे एक के बाद एक हो रहे चुनाव भी नहीं बदल पा रहे? नागरिक यह सब नहीं चाहते हैं। परन्तु, मत-पेटियों के रास्ते पर चल कर, वे इसी दल-दल में कैसे धँसते चले जाते हैं? इन सभी प्रश्‍नों का उत्तर, अंग्रेजों से उधार ली गयी, लोक-तन्‍त्र की हमारी परिकल्पना की विसंगतियों में छिपा हुआ है।

सबसे पहले तो, यह धारणा ही भ्रान्त है कि निर्वाचित प्रतिनिधि बहुसंख्यक मतों के द्वारा चुना गया होता है। किसी भी चुनाव में मत-दान का प्रतिशत्‌ साठ से ऊपर कम ही जाता है। बहु-कोणीय मुकाबलों में जीतने के लिये, औसतन, इनमें से तीस-पैंतीस प्रतिशत्‌ मत-दाताओं का समर्थन हासिल करना ही पर्याप्‍त होता है। दूसरे शब्दों में जिसे भी कुल मत-दाताओं में से एक-तिहाई का समर्थन मिल जाये, वही सिकन्‍दर बन जाता है। बहुकोणीय चुनावी संघर्ष में, जैसा कि वर्तमान परिदृश्य के अधिकांश चुनाव-क्षेत्रों में होता है, जीतने वाले प्रत्याशी को, प्रायः, कुल मत-दाताओं के लगभग बीस प्रतिशत्‌ मत ही मिले होते हैं। उसकी जय-जयकार, और उसके गले में पड़ी फूल-मालाओं, से यह तथ्य झुठलाया नहीं जा सकता कि वह सत्तर से अस्सी प्रतिशत्‌ तक मत-दाताओं के समर्थन से वंचित रहा होता है।

राज-नैतिक दल इस चुनावी गणित को बख़ूबी समझते हैं। अतः उनका सारा जोर येन-केन-प्रकारेण एक तिहाई मत-दाताओं को रिझाकर उन्हें मत-पेटियों तक पहुंचाने पर होता है। इसी को ध्यान में रख कर चुनावी रण-नीति बनायी जाती है, गठ-बन्‍धन और ताल-मेल के समीकरण बिठाये जाते हैं और प्रत्याशी तय किये जाते हैं। जाति-वादी और सम्प्रदाय-वादी राजनीति का आधार भी यही संकुचित दृष्‍टि है। इसमें, किसी को भी, न तो पूरे चुनाव-क्षेत्र की वास्तविक बुनियादी समस्याओं की चिन्ता होती है और न ही, उनके निराकरण का ईमान-दार व विवेक-पूर्ण प्रयास करने वाले, प्रत्याशी ढूँढ़ने की आवश्यकता समझी जाती है। सारा ध्यान ऐसा मोहरा ढ़ूँढ़ने पर टिकाया जाता है जो जीतने लायक मत जुटा सके। हर चुनाव क्षेत्र को जातियों और वर्गों में बाँट कर देखा जाता है। यदि किसी चुनाव-क्षेत्र में किसी विशेष जाति या सम्प्रदाय का बाहुल्य होता है तो राजनैतिक दल का प्रत्याशी खड़ा करते हैं, ताकि जाति या साम्प्रदायिक लगाव की भावनाओं को भुनाया जा सके। इसी गणित में एक-दूसरे की काट ढ़ूँढ़ी जाती है। किसी भी क़ीमत पर जीतने का यह खेल तब और भी विकृत हो जाता है जब इसके लिये बाहु-बलियों, धन-पतियों और अपराधियों को प्रत्याशी बनाया जाता है। यह भयावह प्रवृत्ति अब अपवाद न रह कर आम हो गयी है। कोई भी दल इससे अछूता नहीं है। और, अपनी इस नीयत को उचित ठहराने के लिये, सभी दल एक-दूसरे पर उँगली भी उठाते रहते हैं। कहा जाता है कि प्रतिद्वन्द्वी दल के अपराधी सर-गना प्रत्याशी का सामना करने के लिये हमें भी वैसा ही जबर प्रत्याशी खड़ा करना ज़रूरी हो जाता है! और इस तरह लोक-तन्‍त्र, मध्य-युगीन, बल-प्रदर्शन और छीना-झपटी के बेशर्म प्रदर्शन में बदल जाता है।

इन प्रवृत्तियों का ही परिणाम है कि आज, संसद्‌ और विधान-सभाओं में, आपराधिक पृष्‍ठ-भूमि वाले या अपराधियों से साँठ-गाँठ रखने वालों की भर-मार है। वे, सभी दृष्‍टियों से समस्याओं पर गम्भीरता पूर्वक विचार करके समाधान खोजने के मंच न रह कर, हो-हल्ला और तोड़-फोड़ ब्रिगेडों के जैसे अखाड़े बन गये हैं। भ्रष्‍ट आचरण राजनीति-कर्मी की पहचान बनता जा रहा है।

चाहे हम लोक-तन्‍त्र में उसकी सर्वोपरिता का कितना ही ढिन्ढोरा क्यों न पीटें, इस समूचे परि-दृश्य में, मत-दाता की हैसियत एक बेबस बन्‍धुआ मजदूर से ज़्यादा नहीं है। उसे जो मताधिकार मिला है उसका एक-मात्र आधार सक्षम, समर्पित जन-सेवक चुनना है। किन्तु, सभी के द्वारा ऐसा होने का दावा करने के बाद भी, प्रत्याशियों के जम-घट में ऐसे प्रत्याशी बिरले ही दिखायी देते हैं। साथ ही, चुनाव लड़ना अब एक ऐसा अत्यधिक खर्चीला व्यवसाय हो चुका है जिसमें फँसायी की पूँजी के पीछे स्वार्थों की भरी-पूरी श्रृँखला होती है। आज चुनाव जन-सेवा के लिये नहीं अपितु सत्ता पाने और उसका उप-भोग करने के लिये लड़े जाते हैं। इसलिए मत-दाता, अब अधिकतर, अपने आप को कुएँ और खाई के बीच ही पाता है। उसे या तो नाग-नाथ को चुनना होता है या साँप-नाथ को। विकल्प-हीनता की इस स्थिति में, एक ओर यदि चोर है तो हो सकता है कि दूसरी ओर महाचोर हो। या तो वह किसी धन-बली के पक्ष में खड़ा हो जाये या किसी बाहु-बली के।

सीख देने वाले फिर-फिर सुझाते हैं कि नागरिक यदि चरित्र-वान, कर्मठ और विचार-शील व्यक्‍तियों को ही अपना प्रतिनिधि चुनें तभी भ्रष्‍ट और दिशा-हीन राज-नीति का गुबार छँट सकता है। पर, ऐसे लोग वह लाये कहाँ से? मत-दाता तो उन्हीं प्रत्याशियों में से ही किसी को चुनने के लिये बाध्य है, जिन्हें राज-नैतिक दलों ने जातीय या साम्प्रदायिक गणित, गुटीय निष्‍ठाओं और धन या धौंस की सामर्थ्य और परिवार-वाद जैसे ओछे और निहित-स्वार्थी आधारों पर खड़ा किया होता है।

स्वाभाविक है कि आज औसत मत-दाता के मन में चुनावी राज-नीति के प्रति गहरी वितृष्णा घर कर चुकी है। एक सर्व-व्यापी हताशा का भाव है कि चुनावों से कुछ बदलने वाला नहीं है। विकल्प-हीनता की ऐसी अनुभूति ही ऐसा कारण है कि लगभग चालीस प्रतिशत्‌ मत-दाता तो अपने मताधिकार का प्रयोग करने की इच्छा भी नहीं रखते हैं। उन्हें, मत देने में समय गँवाने के स्थान पर, अपनी दिहाड़ी कमाना या पारिवारिक काम-काज निपटाना कहीं अधिक सार्थक लगता है। मत-दान में जो साठ प्रतिशत्‌ मत-दाता भाग लेते हैं उनमें भी ऐसे अपेक्षाकृत थोड़े ही होते हैं जो, सच में ही जन-प्रतिनिधि होने लायक जानते हुए, किसी प्रत्याशी के पक्ष में, हुलस कर, अपना मत देने गये हों। अधिकांश मत-दाताओं के निर्णय का आधार या तो उनका धार्मिक अथवा जातीय रुझान या फिर किसी पार्टी या प्रत्याशी से उनका पारम्परिक लगाव होता है। एक बड़ा वर्ग ऐसे मत-दाताओं का भी होता है जो केवल इसलिए किसी प्रत्याशी को वोट देते हैं कि, अन्तत:, किसी न किसी को तो चुनना ही है। अयोग्य प्रत्याशियों की भीड़ में से वे उसे चुन लेते हैं जो उन्हें सबसे कम अयोग्य समझ पड़ता है। बहुत से मत-दाता पिछले जन-प्रतिनिधि के या उसकी पार्टी के निकम्मेपन से खीझ कर, मात्र उसे हराने के लिये ही, विरोधी प्रत्याशी को अपना मत थमा देते हैं। फिर, वह चाहे कैसा भी क्यों न हो। ऐसे सभी कारणों से, दिये गये मत भले ही किसी किसी प्रत्याशी को जिता दें, उन्हें स्वतन्‍त्र, विवेक-पूर्ण और सकारात्मक मत-दान बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता है।

इन तथ्यों के प्रकाश में यह देख और समझ पाना सहज है कि चुनाव जीतने वाला प्रत्येक व्यक्‍ति, वास्तविक अर्थों में, ‘जन-प्रतिनिधि’ नहीं होता। ऐसा इसलिए कि अधिकांश के साथ बहुसंख्यक मत-दाता का जनादेश नहीं होता। यह हमारी चुनाव पद्धति का दोष है कि व्यापक जन-समर्थन की चिन्ता किये बिना कोई व्यक्‍ति, मात्र 20 प्रतिशत्‌ मत-दाताओं के समर्थन को पक्का करके, चुनाव जीत सकता है। उपर से तुर्रा यह कि वह अपनी जीत को मत-दाता द्वारा दिये गये जनादेश की तरह प्रचारित करता है! यह दु:खद नहीं तो और क्या है कि हमारी विधायिका और प्रशासन का समूचा तन्‍त्र, कल्पित जनादेश की, इसी खोखली बुनियाद पर खड़ा हुआ है? इसे सच-मुच का लोक-तन्‍त्र ठहराना, एक प्रकार का, सर्वस्वीकृत पाखण्ड ही है।

वर्तमान चुनाव पद्धति मत-दाता को किसी एक प्रत्याशी को चुनने का अधिकार तो देती है, पर उसे सर्वथा अयोग्य प्रत्याशियों की समूची सूची को ही नकारने का अधिकार नहीं देती। प्रकारान्तर से, नागरिक के मताधिकार का तभी कोई अर्थ है जब वह प्रस्तुत प्रत्याशियों में से ही किसी एक के नाम पर अपने समर्थन की मोहर लगाये। और, इस तरह, चाहे या अन-चाहे एक न एक अयोग्य को ‘योग्य’ होने का प्रमाण-पत्र पकड़ा दे। किन्तु यदि, उसके सुविचारित मत में, प्रत्याशियों की समूची सूची में से कोई भी इस योग्य न हो तो उसका मताधिकार, व्यावहारिक रूप से, कतई निरर्थक है क्योंकि वह अपनी ऐसी राय को, मत-पत्र के माध्यम से, व्यक्‍त कर ही नहीं सकता है। ऐसा करने के लिए, अधिक से अधिक, वह मत-दान की प्रक्रिया का तिरस्कार भर कर सकता है। किन्तु, ऐसा करके भी, वह परिणाम को तनिक सा भी प्रभावित नहीं कर सकेगा क्योंकि मत-गणना में वोट न डालने वाले के मत का मूल्य शून्य के अलावा और कुछ नहीं होता। नागरिक पर थोपी गयी यह विवशता संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को दिये गये ‘समानता के अधिकार’ की मूल मंशा के सर्वथा विपरीत है क्योंकि इस तरह तो केवल किसी को योग्य मानने वाले के मत का ही मूल्य है, प्रत्याशियों की सारी की सारी भीड़ को ही सर्वथ अयोग्य मानने वाले मत-दाता के मत को कोई भी मूल्य देने से सिरे से नकार दिया गया है।

चुनाव की स्व-तन्‍त्रता का तभी कोई वास्तविक अर्थ है, जब व्यक्‍ति न केवल प्रस्तुत विकल्पों में से उपयुक्‍त विकल्प को चुनने के लिये स्व-तन्‍त्र हो बल्कि, उनके कतई अनुपयुक्‍त पाये जाने पर उसे, उन सब को एक साथ, नकार देने की स्व-तन्‍त्रता भी मिली हुई हो। ठीक उसी तरह, जैसे यदि किसी विवाह योग्य लड़के या लड़की से उसके अभिभावक कहें कि वह किन्हीं चार-छः लड़कियों या लड़कों में से किसी को भी चुनने के लिये तो स्व-तन्‍त्र है पर उसे उनमें से किसी एक को चुनना ही होगा! इसे स्व-तन्‍त्रता कहना हास्यास्पद है क्योंकि उसका निर्णय स्व-तन्‍त्र तो तभी हो सकता है जब उसे सभी कुपात्रों को अस्वीकार करने का भी अधिकार मिला हो। अयोग्य को नकारने की सुविधा के बिना केवल एक कमतर योग्य को चुनने का ही अधिकार मात्र लँगड़ी स्व-तन्‍त्रता है। इससे लोक-तन्‍त्र होने का भ्रम तो फैलाया जा सकता है किन्तु वास्तविक लोक-तन्‍त्र नहीं पाया जा सकता है। इस बाजारू युग की भाषा में कहें तो, यह ऐसा बाजार है जिसमें ग्राहक को वैकल्पिक ब्राण्ड पसन्द करने की छूट तो है, पर सभी ब्राण्डों को सिरे से नापसन्‍द करने का अधिकार बिल्कुल भी नहीं है। वह विवश है कि इनमें से ही किसी न किसी एक को खरीदे। ब्राण्डेड बाजार-वाद में उपभोक्‍ता की अपनी ही पसन्द और प्रस्तुत हुए सामान की गुण-वत्ता की परख-सम्बन्धी प्राथमिकताएँ सर्वथा गौण हो जाती हैं। चतुर व्यवसायी दावा कर सकते हैं कि ग्राहक के समक्ष विकल्प सदा ही उपलब्ध हैं। किन्तु, उपलब्ध हुए इन विकल्पों की समीक्षा करें तो स्पष्‍ट हो जाता है कि बाजार में घुसा व्यक्‍ति या तो बन्‍धुआ ग्राहक बन कर रहे नहीं तो बाजार के बाहर हो जाये।

वास्तविक लोक-तन्‍त्र तो स्वातन्‍त्र-चेता, सम्प्रभु नागरिकों की सुविचारित स्वीकृति पर ही आधारित हो सकता है। स्वीकृति की गरिमा ‘अस्वीकार करने’ की शक्‍ति में ही निहित है — उसके बिना वह मात्र दो कौड़ी की ही है। यदि हम सच में चाहते हैं कि मत-दाता ही लोक-तन्‍त्र का अन्‍तिम और आधार-भूत निर्णायक हो तो उसके पास ‘ना’ कह पाने की, और उसके सुने जाने की भी, संवैधानिक सामर्थ्य होनी चाहिये। और, इसकी व्यवस्था कर पाना लेश-मात्र कठिन भी नहीं है। इसके लिए, चुनाव-प्रक्रिया में केवल इतना परिवर्तन करना ही यथेष्‍ठ होगा कि मत-पत्र में प्रत्याशियों और उनके चुनाव-चिन्हों की समूची सूची के बाद, सबसे अन्‍त में, एक विकल्प और भी हो — ‘इनमें से कोई नहीं’। मत-पत्र के इस विकल्प से सामने मोहर लगा कर मत-दाता उसके समक्ष प्रस्तुत हुए समस्‍त प्रत्याशियों के प्रति अपनी नापसन्‍दगी व्यक्‍त कर सकता है। ऐसे सभी नकारात्मक मत भी उसी प्रकार गिने जाने चाहिये जैसे किसी प्रत्यशी को मिले मत गिने जाते हैं। और, जब किसी प्रत्याशी को न केवल दूसरे प्रत्याशियों से अधिक मत मिलें बल्कि उनकी संख्या नकारात्मक मतों से भी अधिक हो तभी उसे विजेता और बहुसंख्यक मत-दाता के जनादेश का वास्तविक अधिकारी माना जाना चाहिये। वहीं दूसरी ओर, यदि नकारात्मक मतों की संख्या किसी भी प्रत्याशी को मिले मतों से अधिक हो तो इसका सीधा सा अर्थ यही होगा कि, उस चुनाव-क्षेत्र के बहुसंख्यक नागरिकों के विचार में, प्रस्तुत हुए प्रत्याशियों में से कोई भी उनका ‘जन-प्रतिनिधि’ होने की पात्रता नहीं रखता है। अतः उस चुनाव को रद्द करके यथा-शीघ्र दूसरा चुनाव हो जिसमें तात्कालिक रूप से नकारे गये सभी प्रत्याशियों के चुनाव लड़ने पर रोक हो। क्योंकि, यह मान लेने में कोई सैद्धान्तिक दोष नहीं है कि मत-दाता किसी व्यक्‍ति की राजनैतिक भूमिका को सदा-सर्वदा के लिए कूड़े-दान में नहीं फेकते हैं, इसलिए ऐसे नकारे गये प्रत्याशी, अपनी कमियों को दूर करके, भविष्य में होने वाले चुनाव लड़ने के अधिकारी हो सकते हैं। किन्तु, उनको नकारे जाने से होने वाले उप चुनाव में ही उन्हें फिर से प्रत्याशी की तरह प्रस्तुत होने देना जनादेश के साथ अभद्र खिलवाड़ करने जैसा ही अक्षम्य दोष होगा।, उन पर रोक लगने की स्थिति में दूसरे, सम्‍भवतः अधिक योग्य, प्रत्याशी चुनाव हेतु सामने आयेंगे। इस नयी व्यवस्था में आया जनादेश आईने की तरह स्वच्छ तथा स्पष्‍ट होगा। प्रत्येक प्रत्याशी को उसकी ठीक-ठीक औकात पता चलेगी — न केवल यह कि कितने मत-दाता उसे योग्य समझते हैं बल्कि यह भी कि कितने उसे अयोग्य मानते हैं। इसे दृष्‍टि में रखकर वह अपनी क्षमताओं, कार्य-शैली, आचरण व व्यवहार में सुधार करने विवश होगा। तभी उसे अधिक व्यापक जन-समर्थन मिल सकेगा।

कुछ लोग कहते हैं कि औसत मत-दाता की उदासीनता ही राजनीति के पतन का कारण है। चुनाव के समय निर्वाचन आयोग लोगों से आग्रह करता भी है कि वे अपने मत का प्रयोग करें क्योंकि यह उनका अधिकार ही नहीं संवैधानिक दायित्व भी है। उत्तर प्रदेश के विधान-सभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी ने तो यहाँ तक कहा है कि प्रत्येक नागरिक के लिये मत-दान करना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिये। यद्यपि यह बात समझ से परे है कि इस तरह, मत-दान के लिए विवश करते हुए, हुए चुनाव को स्व-तन्‍त्र और लोक-तान्‍त्रिक कैसे कहा जा सकेगा? मूल बात तो मत-दाता को यह भरोसा दिलाने की है कि चुनाव की प्रक्रिया के मध्यम से राजनैतिक परिदृश्य को मत-दाता की इच्छा के अनुकूल बदला जा सकता है — इसके लिए उसे, बहुसंख्या में, एक-जुट होना होगा। प्रत्याशियों की योग्यता अथवा अयोग्यता का निर्णय पूरी तरह से उसे ही देकर मत-दाता के भीतर आत्म-विश्‍वास, विवेक और दायित्व-निर्वाह की भावना को जगाया जा सकता है। इस दृष्‍टि से मत-दाता को ‘ना’ कह सकने का अधिकार देने के परिणाम दूर-गामी और शुभ हो सकते हैं।

हो सकता है कि यह अधिकार मिलने के बाद भी कुछ मत-दाता मत-दान में भाग न लें। किन्तु, तब वे सचमुच में पलायन-वादी होंगे जो नैतिक रूप से अपने नागरिक कर्त्तव्य की अवहेलना कर रहे होंगे। चुनाव-सुधार से बदली परिस्थिति में, उन्हें भी इसे ब-खूबी निभाने के लिये प्रेरित किया जा सकता है। यही नहीं, निर्णायक शक्‍ति यथार्थ में ही मत-दाता के हाथ में आ जाने पर, राजनैतिक दल भी अपनी सोच में परिवर्तन करने को विवश होंगे। अभी वे जाति व धर्म की संकीर्ण गणित से या भाई-भतीजावाद, गुट-बाज़ी, धन-बल और बाहु-बल से प्रभावित होकर प्रत्याशी तय करते हैं। विद्यमान व्यवस्था के बूते जन्मे इस प्रकार के सोच से जनता के ऊपर, बहुधा, अयोग्य और अवांछनीय प्रत्याशी थोप दिये जाते हैं। किन्‍तु, अस्वीकार कर सकने का प्रावधान हो जाने के बाद, उन्हें क्षेत्र की समूची जनता के व्यापक हितों और आकांक्षाओं को ध्यान में रख कर ही अपने प्रत्याशी चुनना होंगे। परिणाम-स्वरूप अधिक अच्छे व्यक्‍ति सार्वजनिक जीवन में आने हेतु प्रेरित होंगे। जनता के तिरस्कार का भय ही राजनीति का शोधन करेगा।

आशंका उठायी जा सकती है कि तब मत-दाता इस अधिकार का प्रयोग उच्श्रृंखल ढंग से कर सकते हैं। और, यदि ऐसी बातें आम हो गयीं तो जगह-जगह चुनाव बार-बार करवाने की स्थिति निर्मित होगी। हो सकता है कि ऐसी आशंकाएँ वे व्यक्‍ति ही उठाएँ जो, अधिकांश रूप से उसके अन-पढ़ होने के बाद भी आज, आम नागरिक की विवेक-बुद्धि की दाद देते हैं। यह सच है कि इस सचाई से, आँखें बन्द करके, मना नहीं किया जा सकता है कि आरम्भ में कुछ मत-दाता राजनीतिज्ञों के आचरण से खीझ कर नकारात्मक मत दें परन्तु यह भी ठोस सचाई है कि अधिकांश मत-दाता इसका प्रयोग तभी करेंगे जब वह सच-मुच में ही, प्रस्तुत हुए प्रत्याशियों में से, किसी को भी गले नहीं लगा पा रहे होंगे। हो सकता है यह अधिकार मिलने के फल-स्वरूप पहली बार अनेक सीटों का चुनाव निरस्त करके वहाँ फिर से चुनाव करवाने की आवश्यकता पड़ जाये। किन्तु, यदि यही उन क्षेत्रों के बहुसंख्य मत-दाता का निर्णय हो तो उसे शिरो-धार्य किया ही जाना चाहिये।

नागरिक के मूल-भूत कर्त्तव्यों को परिभाषित करते हुए हमारा संविधान उससे अपेक्षा करता है कि वह निजी तथा सामूहिक सभी गति-विधियों में श्रेष्‍ठता की ओर बढ़ने का प्रयास करे, ताकि देश निरन्तर अभिक्रम और उपलब्धियों के नये शिखर छू सके। लोक-तन्‍त्र में जनता-जनार्दन के लिये मत-दान सबसे महत्वपूर्ण सामूहिक यज्ञ है। तब, उसमें श्रेष्‍ठ जन-प्रतिनिधि को तलाशना क्या उसका अहम् संवैधानिक दायित्व नहीं हो जाता? राजनीति में अपराधियों की घुस-पैठ से चिन्‍तित मुख्य चुनाव आयुक्‍त एम.एस. गिल ने भी कहा है कि भले ही कानून ऐसे सभी लोगों को चुनाव लड़ने से न रोक पाये पर क्षेत्र की जनता तो उन्हें हरा कर विधान-सभाओं और संसद्‌ में उनका प्रवेश निषिद्ध कर सकती है। किन्तु, यदि उसके क्षेत्र के सारे के सारे ही प्रत्याशी खोटे हों तो मत-दाता क्या करे? क्या गिल साहब फिर यह कहेंगे कि वह कम बुरे को चुन ले और उसे ही श्रेष्‍ठ मान ले? वही तो हम इस झूठे लोक-तन्‍त्र में अभी कर रहे है! यदि चुनाव आयोग चुनावों को, सच में ही, सच्चे जनादेश का माध्यम बनाना चाहता है तो उसे स्वयं पहल करके मत-दाता को अयोग्य प्रत्याशियों को नकारने सकने का अधिकार दिलाने का सच्चा प्रयास करना चाहिये। वह राष्‍ट्रपति से प्रार्थना कर सकता है कि इसके लिये संवैधानिक व्यवस्था की जाये।

तथापि, इस अधिकार का मिलना आसान नहीं होगा। राजनैतिक दलों, उनके मठाधीशों, ज़मीन से कटे सत्ता-लोलुप और चाटुकार नेताओं तथा सत्ता के दलालों को स्वीकार नहीं होगा कि यह अमोघ अस्‍त्र जनता के हाथ में चला जाए। ऊपर-ऊपर वे भले ही इससे सहमत होते दिखें लेकिन भीतर ही भीतर वे इस लड़ाई को उलझाने का, और वास्तविक शक्‍ति को आम नागरिक के हाथों स्थानान्तरण को लटकाने का, भरसक प्रयास करेंगे। ठीक वैसा ही जैसा उन्होंने ‘सूचना का अधिकार’ और ‘महिला-आरक्षण’ जैसे मुद्दों के साथ किया है। किन्तु यदि जनता इस बेकाबू सत्ता-तन्त्र को सच-मुच में ही नियन्‍त्रित करना चाहती है तो उसे ‘ना’ कहने के अधिकार की माँग सम-वेत्‌ स्वर में करनी होगी। हासिल भी करना होगा। तभी उसकी वास्तविक सम्प्रभुता स्थापित होगी। सच्चे लोक-तन्‍त्र का निर्माण भी तभी हो सकेगा।

(२३ मई २०१२)