अस्तित्व से आग्रहित अपरिवर्तन-शील प्राकृतिक नियम ही धर्म

Ateet Ka Jharokha

‘धर्म’ को ‘सत्य’ से प्रतिरोपित करने मात्र से गीता का यह गूढ़तम भाव अपने सरलतम रूप में सामने आ जाता है कि जीव-भेद से धर्म-भेद नहीं उपजता। स्‍त्रियों की रजो-वृत्ति से जुड़ी सहज प्राकृतिक अवस्था का ‘मासिक-धर्म’ कहलाना धर्म के इस आदि भाव का सरलतम उदाहरण है।

चारों ओर धर्म को जैसे गाली देने की फ़ैशन ही चल पड़ी है। अपने आप के ‘आधुनिक’ होने को प्रदर्शित करने की पहली शर्त सी बन गयी है, यह फ़ैशन। पढ़े-लिखों के बीच माना जाने लगा है कि जो इस दौड़ में पिछड़ गया, समझो वह आज के ‘सभ्य’ समाज और उसकी ‘पहचान’ बनी आधुनिकता से जैसे कोसों पिछड़ गया!

तो क्या धर्म सच में इतना अछूत है?

निश्‍चित रूप से नहीं। इसके बिल्कुल उलट, सचाई तो यह है कि धर्म की आज की समझ ही अछूत हो चली है। संक्षेप में रखें तो यह, यथार्थत:, धर्म को कतिपय बन्धन-कारी मान्यताओं के दर्पण में देखने की उन विवशताओं का ही परिणाम है जिन्हें नासमझी कहने में किसी को आत्म-ग्लानि कतई नहीं होनी चाहिए। इन मान्यताओं का विस्तार परिस्थितियों के अन्तर के साथ, और उनके भागीदारों के अनुकूल, बदलता रहा है; आज भी बदल रहा है।

यह धर्म के आडम्बर में फल-फूल रहे दिग्‌-भ्रम के फैलाये घोर अज्ञान का प्रभाव है कि आज ‘पूजन-अर्चन’ की विभिन्न शैलियों के आडम्बरों को ही धर्म का पर्याय मान लिया गया है। जबकि, यथार्थ यह है कि अपने मूल उद्भव में धर्म, दिखावे के, ऐसे किसी भी भाव से सर्वथा ऊपर है क्योंकि वह कोई शैली नहीं अपितु सर्व-स्वीकार्य, अविवादित और अटल-अमिट तथ्यों का ऐसा कोष-मात्र है जो न तो ‘तेरा’ है, न ‘मेरा’ है और न ही ‘उसका’ है। अस्तित्व के प्रतीक सृष्‍टि के समस्त भावों-प्रतीकों के बीच अस्तित्व की आधारभूत शर्तों के साथ, स्वयं प्रकृति द्वारा ही, अस्तित्व के सर्वथा प्रथम पल से ही निर्मित परस्पर सम्बन्धों के प्राकृतिक रूप से शाश्‍वत्‌ बन्धनकारी भौतिक नियम ही धर्म हैं।

बटोरे गये ‘आधुनिक’ ज्ञान के अन्‍धकार से घिरकर, इसे कोई माने या नहीं; ‘ईश्‍वर’ नामक काल्पनिक भाव इन्हीं नियमों के बन्धन को प्रकट करता है। क्योंकि, सर्वथा-सर्वदा सम-भाव ही धर्म का आधारभूत गुण है। और लक्षण भी। यही ‘ईश्‍वर’ नामचारी विश्‍वास का तत्व है। परिस्थितियों और घटकों के भेद से सत्य-सन्धान की दिशाओं में किञ्‍चित्‌ भेद का आभास होना स्वाभाविक है किन्तु सत्य-सन्धान की यह सारी दिशाएँ एक ही अटल बिन्दु पर केन्द्रीभूत होती हैं, इसमें दो राय नहीं हैं। यही केन्द्रीभूत शाश्‍वत्‌ अकाट्य-अटल ‘सत्य’ इस ‘ईश्‍वर’ तत्व का केन्द्रीय भाव है जो यथार्थ में ‘धर्म’ का ही अधिक व्यापक रूप से प्रतिष्‍ठित पर्याय है। स्‍त्रियों की रजो-वृत्ति से जुड़ी सहज प्राकृतिक अवस्था का ‘मासिक-धर्म’, ‘ऋतु-धर्म’ या ‘रजो-धर्म’ कहलाना धर्म के इस भाषाई आदि भाव का सरलतम उदाहरण है।

‘धर्मों’ के नाम पर मचे हाहाकारी विनाश के इस दौर में धर्म की सही समझ पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गयी है। धर्म का ह्रास तो महाभारत काल में भी हुआ था। तब भीष्म जैसे धर्म-निष्‍ठ बुजुर्ग ने भी ‘भीष्म-प्रतिज्ञा’ करने और फिर बाद में, अविचारपूर्वक, उसके पालन पर ही डटे रहने जैसी गम्भीर भूल की थी। उनकी भूल की गम्भीरता यह थी कि अपने अतीत के किसी निजी पक्ष की सचाई को उन्होंने, स्पष्‍टत: पूरी तरह से बदल गयी परिस्थिति में भी, प्रकृति का सर्व-व्यापी और शाश्‍वत्‌ सत्य मान लिया था। तभी तो कृष्‍ण को बीच रण-भूमि में अर्जुन को सुनाते हुए जैसे ‘धर्मात्मा’ भीष्म को भी उपदेश देना पड़ा था कि जब-जब ‘धर्म’ की हानि होती है तब-तब केवल और केवल ईश्‍वर ही, स्वयं आकर, धर्म की पुनर्स्थापना करता है। यहाँ ‘धर्म’ को ‘सत्य’ से प्रतिरोपित करने मात्र से गीता का यह गूढ़तम भाव अपने सरलतम रूप में सामने आ जाता है कि जीव-भेद से धर्म-भेद नहीं उपजता।

जड़त्व और चेतना-बोध के उस भेद से, जिसे आधुनिक कहलाने वाली शिक्षा-पद्धति ‘विकास-क्रम’ की देन कहना पसन्द करती है; प्रजाति-विशेष के अपने ही जीवों के बीच अन्तर्विहित प्राकृतिक सम्बन्धों और जीवों के बीच अन्तर्प्रजातीय पारस्परिकता के बन्धनकारी दायित्व-निर्वहन में किञ्‍चित्‌ भेद अवश्य हैं किन्तु केवल इन्हें आधार बनाकर, कुतर्क पूर्वक, यह स्थापित नहीं किया जा सकता है कि धर्म मानव-प्रजाति का कोई स्वपोषित तुच्छ भाव है; कि धर्म में कोई प्रकृति-जन्य एक-रूप स्थिरता नहीं है।

परिप्रेक्ष्य अथवा सन्दर्भ की भिन्नता से धर्म के तन्तुओं में भिन्नता का आभास हो सकता है किन्तु पूर्वाग्रह से मुक्‍त तथ्य यही है कि यह आभास मात्र है। ऐसा आभास जो धर्म की ‘अस्थिर भिन्नता’ की नहीं, अपितु ‘विविधता से परिपूर्ण व्यापकता’ की देन है। इस भिन्नता का भी यथार्थ यह है कि वह उसे देखने-समझने वाले को, उसकी अपनी ही दृष्‍टि की संकीर्णता के अनुपात में, समझ में आती है। जबकि इसके ठीक उलट, यथार्थ यही है कि धर्म अपरिवर्तन-शील है, शाश्‍वत्‌ है और इसलिए व्यापक अर्थ में एक-रूप है।

ईश्‍वर के प्रतीक कृष्‍ण ने अपने विराट-स्‍वरूप को दिखलाकर, यथार्थ में, किसी ‘ईश्‍वरीय महानता’ से सम्पूर्ण जीव-जगत्‌ के दृष्‍टि-चक्षुओं को चुँधियाने का नहीं अपितु जीव-जगत्‌ के प्रत्येक घटक के ज्ञान-चक्षुओं को ईश्‍वर अथवा सत्‍य, या फिर कहें कि, धर्म के इसी तत्व को समझने और तदनुसार आचरण भी करने का सन्देश दिया था।

इसी बिन्दु पर सदा स्मरण रखने वाला महत्वपूर्ण तत्व यह भी है कि धर्म में अपने ‘पालन’ के प्रति ‘बन्धन’ का जो भी तत्व है, यथार्थ में, उसके केन्द्र में आग्रह की ही प्रबलता है। दूसरे शब्दों में, यों तो ‘धर्म-पालन’ पूरी तरह से स्वैच्छिक है और, इसलिए, इससे मुक्‍ति का अधिकार सहज-सुलभ भी है किन्तु, तब, जीवों के धर्म-च्युत होने से उत्पन्न होने वाले अस्तित्व-हारी प्राकृतिक-असामंजस्य के दुष्परिणाम भी अपरिहार्य हैं।

सही अर्थ में, प्रपंच नहीं, सृष्‍टि के अस्तित्व को अनन्त काल तक बनाये रखने की प्रेरणा से ओत-प्रोत आग्रह को व्यक्‍त करते ‘बन्धन’ का ही नामकरण है धर्म।

(१८ दिसम्बर २००९; www.sajag-india.com से साभार)