सुशासन की आधार-भूत शिला है जानकारी तक पहुँच का अधिकार

Ateet Ka Jharokha

आदर्श लोक-तन्त्र की निरापदता की आधार-भूत शर्त यही है कि शासन-तन्‍त्र के कार्यकरण से सम्बन्धित किसी भी जानकारी तक पहुँच का अक्षुण्ण अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्‍त हो। यह अधिकार जानकारी तक पहुँच का अधिकार लोक-तन्‍त्र के, यथार्थ में भी, नागरिकों द्वारा ही संचालित किये जाने को सुनिश्‍चित करता है।

नये दौर के एक आर्थिक चिन्‍तक ने संस्कारों और भौगोलिक परिस्थितियों की आधार-भूत भिन्नताओं का एक सामाजिक सिद्धान्‍त गढ़ा है। यह सिद्धान्‍त समाजों में बँटी दुनिया की इस बन्‍धन-कारी सी बहुरूपता को बड़ी आसानी से समझा देता है। सिद्धान्‍त कहता है कि सभ्यता-विकास के क्रम में सामने आयी परिस्थितियों के प्रभाव में समूची दुनिया वास्तव में सामाजिक आधारों पर निर्मित हुई चार शासन-शैलियों में बँटी हुई है जिन्हें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र प्रभुत्व-शैली के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए। सिद्धान्‍तकार कहता है कि जहाँ इन चारों शैलियों में क्रम-बद्धता है वहीं समय के अन्तराल से हुए विकास-क्रम के कारण विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में, एक ही समय पर, अलग-अलग प्रभुत्व-शैलियों का प्रभाव देखने को मिल जाता है।

पूँजीवाद, उसकी प्रतिक्रिया में उपजे साम्यवाद और फिर उसके बाद जन्मे कथित समाजवाद जैसे वैचारिक विभाजनों के बीच विचार-शैलियों का उक्‍त भारतीय सोच निश्‍चित रूप से अधिक व्यवहारिक है। यह सोच प्रभुत्व-शैलियों के बारे में आधुनिक दुनिया की अधिक प्रचलित ‘वाद’ शैली वाले चिन्तन के आधारभूत विरोधाभास को रेखांकित करते हुए उसके अधकचरेपन को भी उजागर करता है।

सिद्धान्‍त की समझ को आगे बढ़ायें तो मालूम पड़ेगा कि इन चारों में शूद्र-प्रभुत्व की शैली शासन-तन्‍त्र की सबसे प्राचीन शैली है। इसके बाद क्रमश: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य प्रभुता वाली शासन-शैलियाँ विकसित हुईं। सिद्धान्‍तकार का, आर्थिक सोच पर आधारित, राजनैतिक सिद्धान्‍त यह है कि ‘वैश्य’ शैली के पराभाव में ‘शूद्र’ शासन के पुनर्भाव का हाथ होता है जो काल-चक्र में स्वयं भी ‘ब्राह्मण’ शासन-शैली से पराभावित होता है। सरल शब्दों में, यह वैचारिक विकास तथा पराभाव की एक ऐसी क्रम-बद्ध किन्तु अन्‍तहीन चक्रीय शृंखला है जो सभ्यता के उस विकास की स्वाभाविक देन है जिसके मूल में जीव-जगत्‌ का वह सर्व-व्यापी मूल दोष है जिसे ‘प्रभुता की भूख’ कहना अधिक सुरक्षित रहेगा।

प्रभुता की इन भूखों के अपने-अपने पक्षधर हैं जो अपनी धारणाओं को, कदाचित्‌, सत्ता-मद में पनपने-फलीभूत होने वाले नैतिक स्खलन की नकेल कसने की आवश्यकता के विकास के रूप में प्रस्तुत करते मिल जाते हैं। इस सिद्धान्‍त के परिप्रेक्ष्य में ज्ञात इतिहास की समीक्षा करने से इस अनोखे सत्य का स्पष्‍टीकरण भी अपने आप मिल जाता है कि शूद्र-राज्य की कालावधि न्यूनतम और वैश्य-राज्य की अधिकतम क्यों होती है?

स्पष्‍ट है, सभ्य समाज के इस विकास ने एक नया सोच यह भी दिया है कि मानव जाति की भलाई के लिए सत्ता के भ्रष्‍ट होने की दु:खद स्थिति से हर हाल में बचना होगा। लेकिन, सचाई यह भी है कि जीव-जगत्‌ में गहरे बैठी ‘प्रभुता की भूख’ के विभिन्न छद्म रूपों का समूल विनाश रेगिस्तान की मृग-मरीचिका सा ही अटल पक्ष है। प्रभुता की इसी भूख को उस सिद्धान्‍त में प्रतिपादित किया गया है जो कहता है कि सत्ता भ्रष्‍ट करती है और असीमित सत्ता असीमित रूप से भ्रष्‍ट करती है।

प्रभुत्व-शैलियों के इस दर्शन को परम-सत्ता की भूख के इस सिद्धान्‍त के साथ रखकर देखने से एक बड़ा रोचक तथ्य यह निकलता है कि, क्योंकि ‘सत्ता’ व्यवस्थित होने-करने का अपरिहार्य उपकरण है, ‘व्यवस्था’ का आरम्भ भले ही समाज-रचना के निर्विकार भाव से हुआ हो लेकिन स्वयं ‘व्यवस्थित होने’ की भावना में ही ‘व्यवस्था के असीमित पतन’ का बीज निहित रहा है। साम्यवादी शासन-तन्त्रों के अधोपतन के निकट अतीत का इतिहास इस धारणा को निर्विवाद रूप से पुष्‍ट करता है। यदि ऐसा मान लिया जाए कि प्रभुत्व की प्राचीनतम्‌ ‘शूद्र’ शैली, सैद्धान्‍तिक धरातल पर, प्रकारान्‍तर से आरम्‍भिक साम्यवाद का किंचित्‌ अव्यवस्थित रूप ही रही होगी तो बहुत सी बातें समझने में आसानी होगी।

इसी क्रम में, राजनैतिक दर्शन की भारी-भरकम सी उथल-पुथल के बीच ‘व्यवस्था’ की भावना से ओत-प्रोत एक नये सोच को बल मिला जो, वैसे तो, शूद्र और ब्राह्मण शासन-शैलियों का मध्यमार्गी है लेकिन, यदि यह अपने मन्तव्य को सच में पा सके तो, वह शासन-शैलियों की निरन्तर परिवर्तन-शीलता पर स्थाई विराम लगाने की क्षमता भी रखता है। इस सोच ने सर्वथा नयी एक ऐसी शासन-शैली सुझायी जिसके बारे में कहा गया कि वह नागरिकों की, नागरिकों के लिए और स्वयं नागरिकों द्वारा ही संचालित की जाने वाली शासन-व्यवस्था है। इसे ‘लोक-तन्‍त्र’ नाम दिया गया।

सत्ता में ही भ्रष्‍ट करने के भाव की अकाट्य मौजूदगी के सिद्धान्‍त की विवेचना कहती है कि लोक-तन्त्र में भी स्खलन की सम्‍भावनाएँ तो सदैव ही रहेंगी। क्योंकि ‘प्रभुता की भूख’ के समूल विनाश की अपेक्षा करना मृग-मरीचिका के प्रभाव में तपते रेगिस्तान में पानी की तलाश में निरर्थक भटकने जैसा ही है। दूसरे शब्दों में, सभ्य समाज के समक्ष केवल सत्ता के भ्रष्‍ट होने के दुष्परिणामों से बचने के समयोचित उपाय निरन्तर करते रहने का ही विकल्प है। इसके लिए, किया केवल यह जा सकता है कि ‘तन्त्र’ पर ‘लोक’ का इतना और ऐसा प्रभावी नियन्त्रण हो कि या तो ऐसी कोई सम्‍भावना पनपे ही नहीं या फिर, यदि वह अंकुरित होती दिखायी दे तो, उसे बिना किसी प्रकार का विलम्‍ब किये समूल नष्‍ट कर दिया जाए।

वैसे तो शासन-शैली कोई भी हो, उसके दीर्घ-काल की सुनिश्‍चितता की सर्वोपरि शर्त यह है कि उसका केवल बहिरंग ही नहीं अपितु सम्‍पूर्ण अन्‍तरंग भी पूर्णत: निर्मल तथा पार-दर्शी हो। किन्तु अनुभव बतलाता है कि सत्ता-प्राप्‍ति के ध्येय के व्यवहारिक आधार पर अन्य शासन-शैलियों में सत्ता के ऐसे चरित्र की चाह रेत में से तेल निकालने जैसी ही दुष्कर है। जबकि इसके ठीक उलट, लोक-तन्त्र में, जिसके बारे में यह दावा किया जाता हो कि वह नागरिकों पर केन्द्रित नागरिकों की ऐसी व्यस्था है जो स्वयं नागरिकों द्वारा ही शासित है; सिद्धान्तत: इसे पाया जा सकता है।

बस, प्रत्येक नागरिक की सक्रिय जगरूकता ही इसकी एकमात्र शर्त है। आम नागरिक को उसके दायित्व का यह बोध कराने के लिए कहा जा सकता है कि अपनी निर्विवाद सफलता के लिए लोक-तन्त्र अपने सम्पूर्ण घटकों में शिक्षित नागरिक वर्ग तथा शासन-तन्त्र से सम्बन्धित प्रत्येक प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष पक्ष की ऐसी जानकारी की सम्पूर्ण पारदर्शिता की अपेक्षा करता है जो समस्त कार्य-कलापों के साथ ही सत्ता में आत्म-विहित भ्रष्‍टोन्मुखी लिप्सा को रोकने के लिए सरकारों तथा उनके विभिन्न उपकरणों को शासन के प्रति पूरी तरह से उत्तरदायी बनाने के लिए अनिवार्य है।

वैसे भी, कानून के राज्य के बारे में कहा यही जाता है कि इसमें कोई भी व्यक्‍ति कानून से ऊपर नहीं है। स्थापित लोक-तन्त्र में इसमें यह तथ्य और जुड़ जाता है कि इसमें प्रत्येक नागरिक बराबरी की हैसियत रखता है। सिद्धान्तत:, लोक-तन्त्र में नागरिकों के बीच ऊँच-नीच के किसी भाव का कोई स्थान नहीं है। आदर्श लोक-तन्त्र की निरापदता की आधार-भूत शर्त यही है कि शासन-तन्‍त्र के कार्यकरण से सम्बन्धित किसी भी जानकारी तक पहुँच का अक्षुण्ण अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्‍त हो।

यद्यपि, जानकारी तक पहुँच के इस अधिकार का तात्कालिक या कहें कि सतही भाव भले ही यह दिखता हो कि इससे नागरिक को अपने-अपने मनोवांछित तथ्य पाने के अवसर मिलेंगे किन्तु, लोकतन्‍त्र के दुर्भाग्य से, तात्कालिक लाभ की इसी चाहत के प्रचार ने यह विस्मरित करा दिया है कि लोक-तन्त्र की सबसे बड़ी मनोवांछ्ना आखिर क्या है जो इस अधिकार का सहारा पाये बिना कभी पूरी हो ही नहीं सकती? अपने-अपने निजी स्वार्थों की छाया में, दरअसल, इस तथ्य की घोर अनदेखी की जा रही है कि जानकारी तक पहुँच के अधिकार में निहित भाव का विस्तार और उसकी गहराई लोक-तन्त्र को समूचा और सच्चा स्वरूप प्रदान करती है।

जानकारी तक पहुँच का अधिकार लोक-तन्‍त्र के, यथार्थ में भी, नागरिकों द्वारा ही संचालित किये जाने को सुनिश्‍चित करता है। इससे भी ऊपर, सुशासन की आधार-भूत शिला है जानकारी तक पहुँच का अधिकार।

(३० दिसम्बर २००९; www.sajag-india.com से साभार)