सिखाया पूत : दरबार चढ़े भी, नहीं भी!

Fourth Pocket

सचिन ने पहले अपने नॉमिनेशन को प्रपोज़ करने और फ़ाइनल करने वालों की अक़्ल का तमाशा बना दिया। फिर, आईपीएल में खेलने की खातिर, अपने देश की टीम में शामिल होने से मना करने वाले पीटरसन की आलोचना कर साबित किया कि एक न एक सिखाया पूत, आखिर-कार, दरबार चढ़ ही जाता है।

“ख़यालों की अजीब सी फ़ितरत होती है। साइन्‍स की समझ से टोटली परे। ऐसा पेश्‍तर भी होता था, जब साइन्स दानों को पूरी दुनिया केवल तीन डायमेन्शन्स का जोड़-तोड़ समझ आती थी। फिर, जब एक सिर-फिरे साइन्स दां ने परसैप्शन में समय का चौथा डायमेन्शन और घुसेड़ दिया तब भी साइण्टिफ़िक समझ में कोई खलल नहीं पड़ा। ख़यालों को, फितूर से आगे, कोई साइण्टिफ़िक तवज्जो अब तक नहीं मिल पायी है। लेकिन साइन्स को अपने ठेंगों पर लेकर चलने वालों को इससे क्या? साइन्स से प्रभावित होकर कुछ-कुछ करप्‍ट हो गये बन्दों ने तो ख़यालों को फ़िफ़्थ डायमेन्‍शन तो बतलाया ही बतलाया है, उसके दो क्लासिफ़िकेशन्स तक कर डाले हैं — वे जो मन में उठते हैं और वे जो दिमाग़ में गुँगाते हैं।”

अपने तो बिल्कुल भी पल्ले नहीं पड़ा। सो, कल का रोना आज रोया। बुद्धि-जीवी और हाई-ली अप-डेटेड समझे जाने वाले अपने एक दोस्‍त से। बताया कि एक बुद्धि-जीवी ने एसएमएस भेज कर एक सेमीनार में न्यौता था। यों, उसे ‘न्यौता’ कहना शाब्दिक गुनाह है — ठेठ भाषा में लिख भेजा था कि एण्ट्री-फीस चुकाओगे तभी घुसने मिलेगा। चाहता तो टाल जाता। ठीक वैसे ही जैसे समझ-दार लोग, टीवी एड देख कर उमड़ने वाले, खरीद-दारी के ढेरों ख़यालों को अक्सर टाल दिया करते हैं। लेकिन, टाल पाता तो बाजार-वाद के ताबूत में एक कील ठुक जाने जितना नियर इम्पॉसिबिल एक्सैप्शन हो जाता! इस बाजार-वाद की अपनी औक़ात है — जब चाहे, जिसे चाहे फाँस ही लेता है। मैं भी फँस गया। सेमीनार, विथ फ़्री लंच पैकेट, अटैण्ड किया। खरच की भारी रकम में से कितनी वसूल हुई, इसे आप ख़ुद ही नापिये-तौलिये। सेमीनार का लब्बो-लुबाब मैंने दे ही दिया है। आपसे दमड़ी-कौड़ी माँगे बिना।

जानता हूँ, आप में से जो-जो मेरे उस दोस्‍त जितने ही अपडेटेड बुद्धि-जीवी हैं उन्हें लगेगा कि दुनिया की एक क्लिष्‍टतम सोशल पज़ल को कितने उम्दा ढंग से एक्सप्लेनेशन किया था बुद्धि के मेरे उस अनूठे सौदागर ने? पूरे पैसे वसूल हो गये होंगे! लंच फ़्री-फ़ण्ड में। उस दोस्‍त का रिएक्‍शन भी ऐसा ही था। और तो और, हवा में कल्पना की छलांग सी लगाते हुए उसने तो स्टिल अन-नोन फ़िफ़्थ डायमेन्शन की दो, यट टु बी एक्सैप्‍टेड, क्लासिफ़िकेशन्स का लेटेस्‍ट उदाहरण तक पेश कर दिया — आज ही दिल्ली के जन्‍तर-मन्‍तर में अन्ना और बाबा के बीच हुई गर्मा-गर्म गल-बहियों वाले नजारे की याद दिलाते हुए।

इतन कर वह ख़ुद तो रुख़सत हो गया लेकिन ख़यालों के ऐसे फ़ितूर को छोड़ गया जिसने मुझे घेर लिया। यों, फ़ितूर बेहद सिम्पल था। बतलाने वाले ने गल-बहियों को दोनों ही क्लासिफ़िकेशन्स की मिली-जुली तस्वीर बतलाया था — वे जो मन में उठते हैं और वे जो दिमाग़ में गुँगाते हैं। यह समझने के लिए मैंने बहुत सिर पीटा कि बाबा और अन्ना में से कौन दिमाग से सोचता है और कौन मन के हाँके हँकता है? लेकिन, जब यह समझ नहीं पाया तो थोड़ी देर के लिए ‘नींदं शरणं गच्छामि’ पर आ गया। उठा तो समझ गया कि सिखाये पूत के दरबार नहीं चढ़ने की बात निरी बकवास नहीं है। नहीं, इसलिए नहीं कि उस बन्दे की बात अपने भेजे में जरा सी भी जगह नहीं बना पायी थी। बल्कि इसलिए कि निद्रा देवी की असीम अनुकम्पा से समझ गया था कि ग़ालिब की क़लम से ‘ग़म और भी है जमाने में ग़ालिब, मुहब्बत के सिवाय’ कैसे लिखाया गया होगा?

अब आप कहेंगे कि तुक और कौतुक के अन-क्राउण्ड किंग ग़ालिब का नाम ले कर कैसी बे-तुकी सी बकवास करने बैठ गया हूँ? तो, जरा कानों की गर्द झाड़ लीजिए — ग़ालिब साहिब ने स्ट्रेट-फ़ॉर्वर्ड यही तो कहा था ना कि जब पहले से ही बहुत से ग़म पाल रखे हों तो एक बे-हद नया-नवेला सा ग़म और क्यों पाला जाए? ठण्डे दिमाग़ से सोचेंगे तो जान जायेंगे कि अदब के इस बाजीगर ने समझाया था कि जो जिम्मेदारी साध न सको उसे मोल क्यों लेते हो? अब, इसी सीख को दरबार चढ़ने की उमर पा चुके पूतों पर ढाल कर देख लो — जो सीख लिया सो सीख लिया, नये के चक्कर में बिल्कुल मत पड़ो। नहीं तो बुरी भद्द पिटेगी।

नहीं, मेरी बात को सुन कर इस तरह से बाबा गांधी की ओर मत ताकिये। मत भूलिए कि दुनिया में अपवाद नाम की भी एक चीज होती है। हर सच्चा कांग्रेसी मुझसे एग्री करेगा कि उस कुनबे में ऐसा खून है जो कभी भी, कुछ भी सीख कर दिखलाता है, आगे भी दिखला सकता है। लेकिन, अमूल बेबी की ही मातु-श्री की स्टॉप-गैप वाली पहली च्वाइस वाले ’दार जी? एकॉनॉमिस्‍ट की तरह लाभ-हानि के सारे गुड़कतान पढ़े भी और उसी में बढ़े भी। फिर एक दिन, नफ़ा-नुकसान के ही पॉलिटिकल कम्पल्शन्स की बदौलत, सियासत के सरकारी पीक पर बैठा दिये गये! और कुछ कर पाये या नहीं, यह तो फ़्यूचर में होने वाली सीबीआई एन्क्वायरीज़ ही बतलायेंगी पर आज यह प्रूव करने के काम तो आ ही रहे हैं कि सिखाये पूत दरबार नहीं चढ़ते। ख़ुद तो पिट ही रहे हैं, लगता है कि पार्टी के ख़ुदाओं तक की कब्र खोद कर ही रिटायर होंगे। बाबा ने तो सरे आम फ़िकरा तक कस दिया — जागो, मोहन प्यारे।

लेकिन, आपसे यह कबूलने का भी जी हो रहा है कि आई एम नॉट वेरी मच श्योर। क्या पता कोई नया-नवेला सिखाया पूत दरबार चढ़ ही ले? कभी-कभी लगता है जैसे सचिन में पॉसिबिलिटी हो। नॉमिनेशन के तुरत बाद उसने कह दिया था कि वह पहले तो क्रिकेट ही खेलेगा। राजनीति-राजनीति तो तब खेलेगा जब क्रिकेट वाले खिलाना बन्द कर दें। पार्लियामेण्ट की मेम्बरी तो बस ट्रॉफ़ी है। सजावट में सजाने-दिखाने के लिए। सुन कर लगा जैसे सच्चू मियाँ ने अपने नॉमिनेशन को प्रपोज़ करने और फ़ाइनल करने वालों की अक़्ल का तमाशा बना दिया हो। लेकिन, आईपीएल की खातिर, अपने देश की टीम में शामिल होने से मना करने वाले इंग्लिश पीटरसन की आलोचना कर, ओथ लेने से पहले सचिन ने ठोक कर साबित किया कि एक न एक सिखाया पूत, आखिरकार, दरबार चढ़ ही जाता है। अब क्या यह बतलाना ही पड़ेगा कि देश की ओर से टी-२० खेलने से मना कर चुके सचिन खुद भी, पैसे की खातिर, आईपीएल में तो खेलते ही हैं? तो, हो गया ना कि सिखाया पूत राजनीति का दरबार चढ़ने को उतावला भी हुआ पड़ रहा है और शायद जल्दी ही चढ़ कर भी दिखा देगा।

(०३ जून २०१२)