गली-गली में शोर है

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भैरयाना बोले तो, पॉलिटिकली बैंक-करप्‍ट होना। जैसे, बीजेपी एलाइन्स से बाहर जमीन की तलाश में जुटी जेडीयू। इसके बिहारी मन्त्री गिरिराज सिंह एक खास जाति के वोट-बैंक को जुगाड़ने के लिए कह बैठे कि रणवीर सेना का सरगना ब्रह्मेश्‍वर मुखिया जीवन के अन्तिम पल तक ‘गांधी-वादी’ रहा!

अब्बी भैया को आज दिल्ली से आना था। सुबह वाली ट्रेन से। मिलने-मिलाने और बाजार-हाट का दिन भर का बिज़ी शेड्यूल बिल्कुल तय था। कल सुबह की नरसिंहपुर रवानगी भी पहले से फ़िक्स थी। वे आये तो पर आते ही ऐलान कर दिया कि शाम पाँच से पहले आराम के सिवाय और कुछ नहीं करेंगे। दिल्ली से भोपाल थ्री टियर के कन्फ़र्म रिजर्वेशन से आये थे। वह भी लोअर बर्थ से। ऐसे में, उनका बर्ताव डरा रहा था। सो, कारण पूछने की हिम्मत जुटायी। उन्होंने मुस्कुरा कर ‘डोण्ट फिकर’ कहा और बीती रात की अपनी पूरी राम-कहानी बखानी —

रात की गाड़ी के लिए समय से टेसन पहुँच गये थे। ओवर-नाइट ट्रेन वहीं से शुरू होनी थी। समय से लग गयी। अमूमन सारे कॉमन पैसेंजर्स अपनी-अपनी रिजर्व बर्थ पर काबिज भी हो गये। टाइम हो गया पर बड़ी देर तक ट्रेन नहीं हिली। ताका-झाँकी में पता चला कि रेल महकमे के किसी धुरन्धर के दो नजदीकियों को प्लेटफ़ॉर्म पधारने में विलम्ब हो रहा था। महकमे के कारिन्दे उनका वेट कर रहे थे — वे महकमे को ओब्लाइज करें तब ट्रेन चलाने की व्यवस्था हो। आखिर, आने वाले आये। उनके अपने लाव-लश्‍कर के अलावा स्टेशन एरिया में मौजूद महकमे का हर छोटा-बड़ा चमचा भी कोच में घुस आया। वीवीआईपियों ने डिनर के लिए बढ़िया नॉन-वेज पेश करने का फरमान जारी किया। लिहाजा, डिनर-पैक आया और चमचे कृत-कृत्य एक्सप्रेशन में कदम-बोशी करते हुए कोच से बाहर हुए।

खैर, इस पूरे दौर में निचली बर्थ के रात भर के मालिक अब्बी भैया आराम से लेटना तो दूर, ले-दे कर ठीक से बैठ तक नहीं सके। भीड़ के जाने से जगह मिली तब पीठ टिकी। लेकिन हाय री किस्मत, बस टिका भर पाये। रेल्वे के वे दोनों दामाद उनके ऊपर वाली बर्थों के मालिक थे। मिडिल बर्थ पर रात्रि-भोज सजा। अपनी हैसियत-जनित कल्चर के मुताबिक नॉन-वेज से पहले मँहगी वाली बोतलें खोलीं और उनके खाली खोखे अब्बी भैया पर पटके। सिरहाने रखा चश्मा टूटते-टूटते बचा। फिर, देर रात तक दर्प की महफ़िल जमाये रखी। लब्बो-लुबाब यह कि वे दोनों यात्रा का लुत्फ़ उठाते रहे और बेचारे भैया बेबसी की कोफ़्त में करवटें बदलते रहे। अब, सारे जरूरी कामों को दर-किनार कर, रात की थकान को दिन में कम्पन्सेट करना चाह रहे थे।

उधर, उन्होंने खर्राटे लेने शुरू किये और इधर मेरे दिमाग़ की मशीनी टिक-टिक चालू हो गयी —  आज जब हैसियत-दारों का ऐसा चरित्र यूनिवर्सल फ़िनामिना बन चुका है तब अब्बी भैया जैसी बूढ़ी, दक़ियानूसी और गयी-गुजरी पीढ़ी की खीझ को कौन समझेगा? कहने-सुनने की बात कुछ और है लेकिन वो जो कहते हैं ना कि ‘जा के पैर न फटी बिवाई, वो का जाने पीर परायी’ उसी तर्ज पर दावा कर सकता हूँ कि जिसे आँख के आने या जाने का एक्सपीरिएन्स न हो वह हिन्‍दी की इस अदबी खूबसूरती को कैसे समझ सकता है? अदबी खूबसूरती से याद आया, जब से हिन्दी के अलंकारों को पढ़ने-समझने की उमर पायी है भाषा-लालित्य का एक बेहतरीन एग्ज़ाम्पल सुनता आया हूँ — कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय, या खाये बौरात है बा पाये बौराय। पढ़ाने-सिखाने वाले बुजुर्ग बतलाते हैं कि कनक (धतूरा) और कनक (सोना) को कम्पेयर करता यह अलंकार बहुत पुराना है। इतना कि इसके सामने सत्ता हथियाने के लिए होने वाली झीना-झपटियों की सारी बातें महज नव-जात ही ठहरेंगी। इसी तरह एक पहेली भी सुन रखी है — आये तो दु:ख, जाये तो दु:ख।

अब यदि आप यह कहेंगे कि मैं भटक गया हूँ तो गलती करेंगे। भारत की आज की दुर्दशा हिन्दी लिटरेचर के ऐसे एग्ज़ाम्पलों से बाहर नहीं है। यह दीगर बात है कि इसे आप समझ नहीं पा रहे हैं। ठीक वैसे ही, जैसे जिस किसी ने सत्ता-देवी का प्रसाद कभी चखा ही न हो या फिर जो सत्ता-प्रमाद को चख पाने के चान्स से बाल-बाल चूकने से कभी भैरयाया न हो वह इस प्रमाद को आइडेण्टिफाई कैसे कर सकता है?

वैसे, एक सवाल सूझा है — यह ‘भैरयाना’ तो समझते हैं ना? जी हाँ, एक-दम ठीक समझा। जेपी की वजह से अपनी नैया को डूबते देख कर इन्दिरा ने जो कुछ कहा-किया था, वही। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं यह कह रहा हूँ कि अन्ना और बाबा के कारण सोनिया पर जो आपदा आन पड़ी है उससे कांग्रेस भैरया गयी है। यह ठीक है कि पहले दिग्गी, फिर खुर्शीद और अब सामी बयान-दर-बयान फरमा रहे हैं कि ये लोग राष्‍ट्र-विरोधी ताकतों से घिर गये हैं लेकिन आम हिन्दुस्‍तानी की तरह मैं भी इससे इम्प्रैस्ड नहीं हुआ हूँ। जानता हूँ, ये लोग थक-हार कर खुद-ब-खुद चुप हो जायेंगे। हाँ, मुझे दिग्गी की चिन्ता हो जरूर रही है क्योंकि यह बन्दा, जो लम्बे समय से रामदेव को ठग और व्‍यापारी कहता आ रहा था अचानक ही सवाल उठा बैठा है कि बाबा बतलायें कि ग्यारह महीनों में ग्यारह सौ करोड़ का ‘काला-धन’ कहाँ से जुटा लिया? मैं तो इसे ही भैरयाना कहता हूँ। कोई दिग्गी से पूछे कि जब बाबा ने अपनी आय का खुलासा कर दिया है तो वह ब्लैक-मनी कहाँ रह गयी? खास कर तब जब बाबा उसे ब्लैक मनी बतला रहे हैं जिसके होने तक को भी छिपाया जा रहा है!

वैसे, भैरया तो और लोग भी रहे हैं। पहले ‘पार्टी-हित’ में पार्टी से ही निकाल दिये गये, फिर उसी पार्टी के ‘हित’ में वापस इज्जत अफ़जाई के साथ वापस लिये गये, एक बार फिर से पार्टी-हित में नेशनल वर्किंग कमेटी से खुद-ब-खुद बाहर हुए और अब पार्टी से ही बाहर हुए, एक गुम-नाम से सीडी-शो में कथित तौर पर बतौर हीरो पार्टिसिपेट करने के लिए बद-नाम हो चुके, बीजेपी के स्वयं-भू भाग्य-विधाता के ताजा बयानों को भैरयाना ही कहते हैं।

भैरयाना बोले तो, पॉलिटिकली बैंक-करप्‍ट होना। जैसे, बीजेपी एलाइन्स से बाहर जमीन की तलाश में जुटी जेडीयू। गली-गली में शोर है कि इसके बिहारी मन्त्री गिरिराज सिंह एक पार्टी के खास जातीय वोट-बैंक से निपटने के लिए किसी आल्टरनेट जाति के वोट-बैंक को जुगाड़ने के लिए कह बैठे कि भीषण नर-संहारों की आरोपी रणवीर सेना का सरगना ब्रह्मेश्‍वर मुखिया जीवन के अन्तिम पल तक ‘गांधी-वादी’ रहा!

(१० जून २०१२)