कौन किसके आसरे?

Fourth Pocketपहले डेवलप्ड कण्ट्रीज़ ने हमें सिखाया कि बड़ों के जूठन के आसरे जीने के क्या फ़ायदे हैं? अब ’दार जी गुरु-दक्षिणा चुका रहे हैं। एश्योर कर रहे हैं कि देश-हित जाये भाड़ में, इतनी दुर्गत के बाद भी हम ‘आसरा-संस्कृति’ का दामन थामे रहेंगे।

अब तक तो मानसून आ ही जाना चाहिए था पर नहीं आया। नहीं आया तो नहीं आया, कोई नयी बात तो है नहीं। हाँ, यह ठीक है कि अच्छी-खासी बढ़ गयी उमस उन लोगों को हलाकान कर रही है जो सेंसस और पॉलिटीकल गेन्स के लिए तो खुद को ‘ग़रीबी-रेखा’ के नीचे बना हुआ दिखाते हैं लेकिन असल जिन्दगी में इन्कम-टैक्स के ऑफ़ीशियल दायरे में शुमार लोगों से कई पायदान ऊपर बिराज कर जिन्दगी के लुत्फ़ लूटते हैं।

बखेड़ा खड़ा करने की माहिर भारतीयों की यह खास जमात सोते-जागते बाल की खाल उधेड़ने में जुटी है। सवाल उठा रही है कि यह दिन क्यों देखने पड़ रहे हैं? यह दीगर बात है कि वे ये सारे सवाल खुद की क्यूरियॉसिटी का पेट भरने की नीयत से नहीं बल्कि अपने पर्सनल इण्टरेस्ट को पूरा कर सकने वाले ऐसे जवाब परोसने का अवसर ढूँढ़ने के लिए उठाते हैं जो दूसरों की आँखों में धूल झौंक कर उनमें क्यूरियॉसिटी की इनकी मन-चाही खद-बदाहट मचा दें।

मेरी किस्मत! दोस्‍त किस्म के कुछ बन्दों ने चाय के नाम पर न्यौता और मैं भी, अन-जाने ही सही, ऐसी ही एक चाल में धर लिया गया। लेकिन, एक बात साफ कर दूँ  — धरा जरूर गया फँसा नहीं। चूँकि हर बार की तरह इस बार भी मानसून की देरी और मौसम की अन-सरटेण्टिटी को ही विषय-प्रवेश के लिए प्रिफ़र किया गया, अपनी बारी आने पर मैंने टके सा जवाब दे दिया, “सब भाग्य-विधाता का खेल है!” यों, मैंने इस पर कोई डिटेलिंग नहीं की कि विधाता से मेरा मतलब सबसे ताकत-वर ‘उस’ हस्‍ती से है जो उसे ही विधाता मान लेने वाली देशी कठ-पुतलियों को नचाने की मोनोपली रखती है। मैंने अपनी एक समझ और भी छिपायी — यह हस्‍ती उस आम आदमी की भी रोटी-पानी की इबारत लिखती है जिसने उसे अपना विधाता नहीं माना। जाहिर है, मेरे ऐसे दो-टूक कमेण्‍ट से चर्चा का मौसम तो ठप्प हुआ ही, मत-भेद की उमस भी खासी बढ़ गयी।

मेरी बात सुन कर आपको लग रहा होगा कि यह सब मैंने इसलिए कहा क्योंकि मैं देश की ताजा राजनैतिक उठा-पटक से जरूरत से ज्यादा ही डिप्रैस हो गया हूँ। बे-वजह। चलिए, एक हद तक आप ठीक भी होंगे। प्रेसीडेण्ट के इलेक्‍शन्स तो पहले भी हो चुके हैं। शुरूआती सिलेक्‍शन्स को दर-किनार करके देखें तो तीखी पॉलिटिकल तकरारें और मारा-मारियाँ भी हो ही चुकी हैं। फिर, लम्बे समय से, हमारे प्रेसीडेण्ट को ‘रबर-स्टॉम्प’ के निक-नेम से प्रोजेक्‍ट भी किया जाता रहा है। ऐसे मौके भी आ चुके हैं जब कुछ सिर-फिरों ने किसी-किसी को ‘पपेट’ तक कह डाला था। लेकिन, इस सब से यह तो कनक्लूड नहीं किया जा सकता है कि जिसे एक-दो सदमे आलरेडी मिल चुके हों उसने किसी नये सदमे को खाने का राइट ही खो दिया है।

ठहरिये, समझाता हूँ। कांग्रेस न जाने कब से, वाया ममता दी, सदमे खाती आ रही है। न तो सदमे मिलने बन्द हो रहे हैं और ना ही कांग्रेस उन्हें खाने से मना कर रही है। ‘नो ऑप्शन्स लेफ़्ट’ वाली अन-एण्डिंग सिचुएशन है। हालत यह हो गयी कि कांग्रेस ने लिटमस टेस्ट के लिए प्रणब दा का नाम महज यह सोच कर उछाला कि और कोई नहीं तो ततैया दी तो अपोज़ करेंगी ही। यानि, एक तीर दो शिकार — दिखाने के लिए बाबू मोशाय का नाम आगे बढ़ाया भी और टीएमसी सुप्रीमो के तेवरों के कारण, कन्सेसस के नाम पर, वापस भी ले लिया। पर, मुलायम का आसरा ले कर दीदी ने कलाम के बैनर का ऐसा दँदेरा मचाया कि सारा का सारा कांग्रेसी गुड़ गोबर में तब्दील हो कर रह गया।

अब आप कहेंगे कि कांग्रेस ने भी तो मुलायम की छाँह अपनी तरफ खींच कर हिसाब की तराजू का बैलेन्स आखिर अपनी तरफ झुका ही लिया। ठीक। पर, ५०-५०। शायद आप यह नहीं देख पा रहे हैं कि कलाम के भूत से निपटने की हड़-बड़ी में प्रणव नाम की अन-चाही हड्‍डी कांग्रेस के अपने गले में अटक गयी। उसे कितनी बे-चारगी में दादा के कैण्डिडेचर को फाइनल करना पड़ा? गोया, वही ‘नो ऑप्शन्स लेफ़्ट’ वाला सदमा।

सदमा तो देश को भी लगता दिखता है — मिसाइल बम के फुस्सी फटाका निकल जाने का सदमा। खबरों के शिकारी बार-बार संकेत कर रहे हैं कि ‘सोच कर बतलायेंगे’ कहने वाले कलाम १०० परसैण्ट श्योरिटी पर ही अपने कैण्डिडेचर को फ़ाइनल करेंगे। उधर वे पतली गली से निकल लेंगे और इधर सदमे में डूबी अपोजीशनी सियासत अपना पुराना और पिटा-पिटाया रोना रोती फिरेगी — जब बाँस ही नहीं रहा तो बाँसुरी बजती तो आखिर कैसे बजती?

वैसे, एक देसी बाँसुरी देश के बाहर तो बज ही रही है। देशी राजनीति की बातों के बीच इसका जिक्र इसलिए निकल आया कि इसे कोई और नहीं बल्कि हालिया दौर में थू-थू कर रिजेक्‍ट किये जा चुके हमारे ’दार जी बजा रहे हैं। वह भी इण्टरनेशनल फ़ोरम पर। खबर है कि यूरो-जोन में बजी पीएम साहिब की इस बाँसुरी को जी-२० समिट में भी पूरी संजीदगी से लिया जा रहा है। लिया भी क्यों न जाये? खेमों में बँटी दुनिया को मिल-बैठ कर अपने इशूज़ आपस में ही सुलझा लेने की समझाइश देने के लिए प्रोफेसर मनमोहन से बेहतर विकल्प दुनिया भर में नहीं मिलने वाला। आप भले इन्हें ‘पपेट’ कहें, मैं तो केवल इतना कहूँगा कि कोलीजन गवर्नेंस के प्रणेता या फ़ालोअर ना सही, मनमोहन कोलीजन धरम के बेस्टम बेस्ट ऑपरेटर तो हैं ही। मँहगाई और मन्दी के एक्रॉस द वर्ल्ड माहौल में ‘आसरा-धर्म’ क्या होता है इसे समझाने के लिए हमारे ’दार जी से बेहतर एकॉनामिस्ट पॉलिटीशियन ढूँढ़े नहीं मिलेगा। जाने कब से मूरख देशी जनता को यह वेस्टर्न थ्यौरी समझाते आ रहे हैं कि पहले जो ‘को-एग्ज़िस्टेन्स’ अर्थात्‌ ‘सह-अस्तित्‍व’ कहलाया करता था, गठ-बन्धन के इस युग में उसी को ‘आसरा-धर्म’ अर्थात्‌ ‘जिओ और जीने दो’ कहा जाने लगा है।
समझ गये होंगे कि पहले डेवलप्ड कण्ट्रीज़ ने हमें समझाया कि बड़ों के जूठन के आसरे जीने के क्या फ़ायदे हैं? उनसे दीक्षा ले चुके ’दार जी अब, गुरु-दक्षिणा चुका रहे हैं। वह कहते भी हैं ना कि कभी गाड़ी नाव पर तो कभी नाव गाड़ी पर! मन्दी और अन-एम्प्लॉयमेण्ट का देसी अलार्म बजा कर गुरु घण्टालों को एश्योर कर रहे हैं कि देश-हित जाये भाड़ में, इतनी दुर्गत के बाद भी हम ‘आसरा-संस्कृति’ का दामन थामे रहेंगे — जीडीपी-ग्रोथ की बदरिया एक न एक दिन मेहरबान होगी ही!

(१७ जून २०१२)