गयी भैंस पानी में!

Fourth Pocket

भरोसे की भैंस के पड़ा जनने वाले बुन्देली उलाहने में हाथ पर हाथ धरे बैठने के नुकसानों की पॉसिबिलिटी को अण्डर-लाइन करके दिखलाने से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन, भैंस के पानी में जाने का भोपाली ताना पूरी की पूरी पूँजी के ही हाथ से फिसल जाने के दर्द को बयांन करता है।

गर्मी के इस मौसम में मण्डी से ताजी सब्जियाँ खरीद लाना बड़ी चुनौती है। इससे जूझने की कोशिश में जुटा था कि पीछे से कसा फ़िक़रा कानों में ऐसे घुसा जैसे मेरे कान और वह नामाकूल फ़िक़रा वेयर मेड फ़ॉर ईच अदर! पलटे बिना रह ही नहीं सकता था। सो, पलटा और देखा कि पीछे खड़े बड्‍डे मुस्कुरा रहे थे। एक पुराने दोस्‍त को बरसों बाद इस तरह से अपने लिए सम्बोधित हुआ पाकर मेरे मुँह से भी एक शिकायत फूटी, “न आगा और न पीछा, यह क्या बात हुई?” लेकिन बड्‍डे थे कि मुस्कुराते ही रहे। इस चीर-हरणी मुस्कुराहट ने दिग्गी पर किये किसी के हालिया रिमार्क की याद दिला दी। गंगा को बचाने की नौटंकी-श्रृँखला में एक दिन के लिए भोपाल में गद्दी जमा कर बैठे स्वरूपानन्द की एक लाइव टीवी क्लिपिंग को देख कर उस दिल-जले का कहना था, ‘सरकारी सन्‍त के चरणों में अ-सरकारी कारिन्दा!’

बड्‍डे की मुस्कुराहट से बीते दिनों के दो वाक़ये और याद आ गये। और हाँ, आपके दिल की आप ही जानें, मेरी नजर में तो दोनों आपस में कतई अन-रिलेटेड हैं। पहला वाक़या एमपी के श्योपुर जिले का है। हुआ यह था कि किस्मत का मारा एक जंगली मोर किसी कुएँ में गिर गया। और, क्योंकि कुआँ आज के पॉलिटिकल हालातों जितना सूखा और गहरा था, बेचारा उससे निकल नहीं पाया। वह तो भला हो किसी का जिसने उसे देख लिया और, सरकारी महकमों की सख़्ती से डर खाकर, जंगल-महकमे को इसकी खबर दे दी। लब्बो-लुबाब यह कि जब जंगलात के सरकारी करिन्दे तीन दिनों तक अपनी सारी अक़्ल और जुगत भिड़ा कर भी उसको निकाल नहीं पाये तो एक निपट देहाती लोकल बन्दे ने अपनी मुफ़्तिया सेवा ऑफ़र की और झट से मोर को निकाल दिया!

बोले तो, मोर हैरान-परेशान कि सरकारी ओहदों की छोटी-बड़ी खाट तोड़ते कारिन्दों की प्रॉब्लम क्या थी कि वे सब मिल कर भी तीन दिनों तक वह नहीं कर पाये जो एक अन-ट्रेण्ड लोकलाइट ने आते ही कर दिखाया? वैसे, यह ‘प्रॉब्लम को समझ लेना’ भी कुछ कम प्रॉब्लम नहीं है। कई बार यह समझ नहीं पाने वाले की हकीक़त भरी मुसीबत होती है। तब इसे जेन्यूइन प्रॉब्लम कहते हैं। लेकिन, कई बार जब किसी से पूछा जाता है कि उसकी प्रॉब्लम क्या है तो उसे पॉलिटिकल प्रॉब्लम कहा जाता है। वह इसलिए कि पूछने वाले की असली नीयत अगले की दिक्‍कत समझने की नहीं बल्कि उसकी मुसीबत बढ़ाने की होती है। ठीक वैसे ही जैसे हमारे मोस्ट लाइकली नैक्स्ट प्रेसीडेण्ट की कैण्डिडेचरी के मामले में हुआ। मेरा दूसरा वाक़या इसी पॉलिटिकल प्रॉब्लम से जुड़ा है।

‘क्यों हुआ’ और ‘कैसे हुआ’ पर बहुत हो गया, अब बारी इसकी है कि देखा-समझा जाए कि क्या-क्या हुआ? जानता हूँ, खबरों की इतनी स्कैनिंग तो आप करते ही करते हैं कि अपनी पर्सनल जिन्दगी को केवल पॉलिटिक्स के बही-खातों के सुपुर्द कर चुके ‘भद्र’ जनों की अन्दरूनी खालों के रंगों को जान चुके हैं। यह भी जान चुके हैं कि आजीवन पॉलिटिकल बने रहने की भीष्म प्रतिज्ञा कर चुके ये महा-जन ‘राजनीति मत करिये’ जैसे मंचीय श्‍लोकों का कितनी शातिरी से इस्तेमाल करते हैं? फिर भी, प्रणब दा से जुड़े इस वाक़ये को बताने की जुर्रत कर रहा हूँ — बाबू मोशाय के नाम पर कांग्रेसी पसन्द की मुहर का ठप्पा लगते ही अपोजीशन में हाराकीरी की होड़ लग गयी थी लेकिन कलाम नाम की एक फाँस रूलिंग क्लास को फिर भी आँस रही थी। दादा को यह डर सता रहा था कि कहीं यह हवा असलियत का रुख न अख्तियार कर ले! तब पार्लियामेण्ट के आज के इस बेस्टम-बेस्ट मैनेजर की असली परीक्षा हुई। मीडिया इस कदर मैनेज हुआ कि लल्लू-पंजू तक सवाल उठाने लगे कि यदि प्रणाब दा के अन-अपोज़्ड इलेक्‍ट किये जाने में विरोधियों की ‘प्रॉब्लम’ क्या है?

प्रॉब्लम की भली चलायी — किसी को पता चले, उससे भी पहले यह उसके गले पड़ जाता है। अब देखिये ना! बिना इजाजत मिले आँय-बाँय बोल देने के आदी हो चुके दिग्गी से कन्नी काटने की शुरूआत में पार्टी ने सरे आम कह दिया कि उनके बोल-वचन से पार्टी को लेना-देना नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे आला-कमान को छोड़ कर बाकी बचे अद्धे-पौनिये ममता से कह रहे हैं कि सदर-ए-हिन्द के चुन लिये जाने के बाद से यूपीए को उनसे कुछ लेन-देना नहीं रहेगा। और, माटी-मानुष की बेचारगी देखिये। दीदी देश को बार-बार एक ही मैसेज दे रही हैं — कोई चाहे तो धक्का मार कर भले निकाल बाहर करे, वे खुद होकर यूपीए से बाहर नहीं होंगी!

ऐसी सियासी हालत में वन्स अपॉन ए टाइम, बुन्देल खण्ड के नाम से बुलाये जाने वाले सैण्ट्रल इण्डिया के एक बड़े हिस्से की कहावत याद आ रही है — भरोसे की भैंस पड़ा ब्यानी! जानने वालों का कहना है कि यह कहावत महज उम्मीद के आसरे जीने वालों पर फब्ती कसने के लिए गढ़ी गयी थी। इन्हीं जान-पाँड़ों में से कुछ कहते हैं कि बीते जमाने की भोपाल रियासत में भी भैंसों को लेकर बनी एक फब्ती बड़ी आम है — गयी भैंस पानी में।

वैसे, दोनों तानों में मार्के का फ़र्क है। भरोसे की भैंस के पड़ा जनने वाले बुन्देली उलाहने में हाथ पर हाथ धरे बैठने के नुकसानों की पॉसिबिलिटी को दिखलाने से ज्यादा कुछ नहीं है। मेरा मतलब है, इसमें एफ़र्ट करते रहने की इम्फ़ैसिस अण्डर-लाइन्ड है। लेकिन भैंस के पानी में जाने का भोपाली ताना, सूद तो सूद, पूरी की पूरी पूँजी के ही हाथ से फिसल जाने के दर्द को बयांन करता है। गोया, आदमी के हाथ में रोने के अलावा और कुछ रहता ही नहीं है।

सुना है, दीदी एक नयी पेन्टिंग बनाने की तैयारी कर रही हैं। जो जी में आये करके ही छोड़ने वाली दीदी को इसकी ‘तैयारी’ इसलिए करना पड़ रही है कि पेण्टिंग का सब्जैक्‍ट तो फ़ाइनल है लेकिन, कुछ को छोड़ कर उसके बाकी करैक्‍टर्स ने अपने-अपने नक़ाब अभी तक उघाड़े नहीं हैं। शी इज़ स्टिल कैप्‍ट वेटिंग! वैसे, मेरे सूत्रों ने बतलाया है कि पेण्टिंग की टाइटिल तय है। नहीं, ‘गयी भैंस पानी में’ नहीं बल्कि ‘आस निरास भयी’!

(२४ जून २०१२)