तालिबान! तालिबान!!

Ateet Ka Jharokha

अवसर और छूट मिले तो देशज ‘विद्वान’ देश को यह पाठ पढ़ाने को तत्पर हैं कि समूचे उत्तर भारत में कमोबेश सारे वर्ग और जाति के लोग परस्पर आक्रान्‍ता, शोषक और अल्पसंख्यक हैं। और सम्‍भवत: यह भी कि यही सारे लोग, परस्पर मिलकर, समूचे दक्षिण भारत को आक्रान्‍त करते रहे हैं।

एक पुरानी कहावत है — भेड़िया आया! भेड़िया आया!! बदलते परिवेश, या यों कहें कि बदलाव की बलवती चाहत, ने इसे आज अचानक ही बदल कर रख दिया है। हमारे देश में आज लांछना का पर्याय हो गया है तालिबान या तालिबानीकरण। बिल्कुल, एक फैशन की तरह। यहाँ तक कि चोर (यानि कि खुद तालिबानी) ही कोतवाल को डाँटने में जुट गये हैं कि वे देश का तालिबानी-करण कर रहे हैं! और, अपने प्रजा-तन्‍त्र की महिमा का बखान क्या करना? सत्ता की लहरों में डूबते-उतराते, लेकिन उसके गलियारों की पतवार जम कर थामे बैठे, ‘जन-सेवकों’ की नजरों में इसमें (प्रजा-तन्त्र में) आम जन का समझ-दार होना बिल्कुल भी जरूरी नहीं। उल्टे, यह एक नुकसान-देह प्रस्तावना है!

भारतीय परिवेश में आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि का एक खास स्थान है। एक ‘लुटेरे-हत्यारे’ से महान् ‘सन्‍त’ में रूपान्तरण की उनकी गाथा भारतीय मानस में जो सदियों से उँकेरी हुई है वह इसलिए नहीं कि उन्हें डाकू के रूप में लांछित किया जाए। बल्कि, इसलिए कि धर्म-जाति से परे हिन्दू समाज के दो प्रमुख आधार-स्तम्‍भों, संस्कार और हृदय-परिवर्तन, की गुरुता स्थापित की जाये। इस शाश्‍वत्‌ सत्य को ‘हिन्दू समाज का विरोधाभास’ और ‘मनु-वादियों का षड़यन्त्र’ कहकर नकारा नहीं जा सकता। यह उसकी परिपक्वता और वैचारिक सम-रूपता का ही प्रमाण है कि महान् सप्‍तर्षियों में से एक पुलत्स्य का पौत्र और ऋषि विश्रवा का पुत्र होने तथा स्वयं भगवान शंकर का पौरोहित्य-पद निबाहने के बाद भी रावण अपनी कर्म-गति के कारण राक्षस-राज के रूप में ही ख्यात्‌ हुआ।

क्षुद्र राजनीति के खिलाड़ियों ने अर्से पहले शासकीय आयोजनों, उल्लेखों, प्रचार-प्रसार माध्यमों और पठन-पाठन सामग्री में, सदियों पुराने, उस अंश का उल्लेख भी प्रति-बन्‍धित कर दिया जो यह जानकारी देता हो कि महर्षि वाल्मीकि के जीवन का पूर्वार्द्ध अनुकरणीय नहीं था। इसके लिए एक शासकीय आदेश जारी किया गया जिसने बड़े ही बेतुके तर्क का सहारा लिया। तर्क यह था कि इस तथ्य के उल्लेख से एक वर्ग-विशेष की भावनाएँ आहत हो रही थीं!

‘कारवाँ आते गये, हिन्दुस्तान बसता गया’ को ‘धर्म-ग्रन्‍थ’ की सीख की तरह अपने मानस में सम्हाले बैठे कतिपय बुद्धि ‘जीवियों’ ने सरकार पर देश का ‘तालिबानी-करण’ करने का आरोप चस्पा कर दिया है। लगभग बीस साल पहले, सरकारी खजाने के सहारे, टुकड़े-टुकड़े भू-भागों का अपना-अपना ‘स्थानीय इतिहास’ लिखाने और उसे राष्‍ट्रीय पहचान दिलाने की ‘उदारता’ दिखाने (और उसके माध्यम से दिलों के बँटवारे करने) की कोशिश कर चुके इन ‘विद्वानों’ को यदि अवसर और छूट मिले तो वे देश को यह पाठ पढ़ाने को तत्पर हैं कि, कम से कम, समूचे उत्तर भारत में कमोबेश सारे वर्ग और जाति के लोग, बुनियादी तौर पर, परस्पर आक्रान्‍ता, शोषक और अल्प-संख्यक हैं। और सम्‍भवत: यह भी कि यही सारे लोग, परस्पर मिल कर, समूचे दक्षिण भारत को आक्रान्‍त करते रहे हैं।

अर्थात्, इस समूचे भू-भाग को एक समग्र राष्‍ट्र के रूप में स्वयं को स्थापित करने का कोई नैतिक अधिकार ही नहीं है! लेकिन इस ‘दर्शन’ के प्रणेता, और उनकी छत्र-छाया में मलाई छान रहे उनके अपने चेले-चपाटी, बड़ी बेबाकी से इस बात से मना कर देंगे कि यह कृत्य उनकी अपनी ही तालिबानी मानसिकता का प्रतीक था। सच कहें तो, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, कथनी तथा करनी के भेद और उससे उपजे दोहरे मान-दण्डों वाली छद्म मानसिकता का ही दूसरा नाम है तालिबान।

दोहरे मान-दण्डों की बात ही लें। अभी बात इतनी गयी-गुजरी नहीं हुई है कि देश के मानस से वह बिसर जाए। उम्र से बुजुर्ग कुछ लोगों के पसन्‍दीदा चित्रकार हुसैन ने तमाम उम्र के साथ इस देश की संवेदनाओं का खासा अनुभव रखते हुए भी पूरे होशो-हवास में ‘सरस्वती’ नाम-करण से जो पेन्‍टिंग बनाई थी वह उनके अपने मानस में गहरी बैठी असहिष्णुता और अश्‍लीलता के मिले-जुले प्रतिनिधित्व से हटकर कुछ भी नहीं थी। लेकिन आज देश के ‘तालिबानी-करण’ को लेकर आरोप लगाते घूम रहे इन्हीं तत्वों ने तब हुसैन का यह कहकर बचाव किया था कि सरस्वती तो ‘किसी’ का भी नाम हो सकता है।

इससे दो टूक मना नहीं किया जा सकता है कि, सीमित दायरे में, यह एक स्वीकार्य तर्क है। लेकिन, तब क्या कहियेगा जब इनकी अगुआई करते खड़े कतिपय ‘राष्‍ट्रीय’ अखबारों में से एक ने अपने एक सप्‍ताहिक परिशिष्‍ट में छपे चित्र-फीचर (द हिन्दू, दिल्ली; २४ नवम्‍बर २००१) के लिए अगले ही दिन बड़ी तत्परता से अपने मुख-पृष्‍ठ पर एक समुदाय-विशेष से इसलिए बिना शर्त माफी माँग ली कि उस फीचर से उस समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँची थी? जबकि, अतीत में ‘सरस्वती’ पर दिये गये इनके अपने ही तर्कों पर कसें तो, उनका उक्‍त ‘दुर्भाग्य-जनक’ फीचर कहीं कुछ भी इंगित नहीं कर रहा था!

अर्थात्‌, वही दोहरे मान-दण्ड और तालिबान-तालिबान का खेल! जिसकी भर्त्सना का एक भी अवसर हम खोना नहीं चाहते। कोई भी ‘समझ-दार’ नहीं चाहेगा।

(१ जनवरी २००४; www.sarokaar.com से साभार)