औक़ात है तो दिखाओ!

Fourth Pocket

दूसरे को अपनी औक़ात साबित करने की चुनौती देना एक तरह की ‘औक़ात रि-गेनिंग’ टेक्‍टिस ही है। अपने दिग्गी भाई को भूले नहीं होंगे। कभी बड़े औकात-दार हुआ करते थे। आज-कल टीम अन्ना को धूर देते फिर रहे हैं कि औक़ात हो तो शिवराज के मुँह पर कालिख पोत कर दिखाओ!

हम कुछ फुरसतिए और निठल्ले देश के हालातों पर गपिया रहे थे। ठिया वही पुराना — चाय की गुमटी और पटिया-मंच। हममें एक बन्दा विचारक किस्म का भी है। और, हम सब कन्शेससली मानते आये हैं कि हमारे बीच यही ऐसा बन्दा है जिसे हमारा ‘थिंक-टैंक’ होने का ओहदा दिया जा सकता है। बिदाई की बेला में पटिया-गोष्‍ठी के मिनिट्स को वर्बली प्रोनाउन्स करने की जिम्मेदारी अमूमन इसी की होती है। हमारे बीच हुई बात को कल उसने कुछ इस तरह से सम-अप किया —

“ग़जब की अफ़रा-तफ़री है! जो मालिक किस्म के हैं वे इस आपसी कॉम्पिटीशन में भिड़े हैं कि किसकी कितनी औक़ात है? ये औक़ात-दार जर-ख़रीद किस्म को धमका रहे है — ख़बर-दार, जो अपनी औक़ात दिखायी। और, जो न तो औक़ात-दार है और ना ही जर-ख़रीद उस बेचारे कॉमन-मैन को चुनिन्दा बुलन्द आवाज वाले समझा रहे हैं कि वह गांधी को ब्लाइण्डली फ़ॉलो करे। इस दंगल पर फ़ेमस बन्दरों की नाईं, वह न तो कुछ देखे, न सुने और न ही कुछ बोले। यानि, हालातों के प्रति कतई इण्डिफ़रैण्ट रहे।”

लेकिन, जैसे पहले ’दार जी को देश का पीएम बनवा कर और फिर, कुछ साल बाद, पीएम हो सकने वाले प्रणव दा को अपना प्रेसीडेन्शियल मोहरा डिक्लेयर करते हुए आज की ‘मदर इण्डिया’ ने दुनिया को चौंकाया था ठीक उसी तर्ज पर चाय की गुमटी वाले ने भी अपना असन्‍तोष दर्ज कराया। अपनी बँधी-बँधायी डेली ग्राहकी को जोखिम में डालते हुए उसने, अचानक ही, अपनी परमानेण्ट वाली चुप्पी तोड़ी। हमारी निजी बात-चीत में अपनी टाँग अड़ाते हुए बोला, “आप भूल रहे हैं कि इण्डिफ़रैण्ट पॉपुलेशन की भी अपनी दो वैरायटीज़ हुआ करती हैं। और, अपनी रिक्वायरमेण्ट्स के मद्दे-नजर. क्योंकि इनके पर्सपैक्‍टिव्ज़ एक-दूसरे से जुदा होते हैं हालातों के प्रति इनके रिएक्‍शन्स भी जुदा-जुदा हुआ करते हैं।”

एक मामूली से टी-मेकर की ऐसी इण्टेलेक्‍चुअलिस्टिक बात सुन कर हम सन्न रह गये। लिहाजा, सदमे से बाहर आने के लिए चाय के एक और राउण्ड की दरख़्वास्त की और डबल से विचार में जुट गये। लेकिन क्योंकि हम सारे के सारे लोग ही चुक गये थे, हमने यूनानिमसली उस टी-मेकर से ही मिन्नत की कि रात का डिपार्टिंग रिमार्क वही बुलन्द करे। इस रिपॉन्सिबिलिटी को उसने क़बूल लिया और अपनी बात को आगे बढ़ाया — इस इण्डिफ़रैण्ट पॉपुलेशन की वे जो दो वैरायटियाँ हैं उनमें से एक ‘इम्पोटेण्ट’ और दूसरी ‘उभय-लिंगी’ है। वेरायटी के इसी फ़र्क़ के मद्दे-नजर इन दोनों किस्मों के फ़्रस्टेशन्स निहायत जुदा होते हैं। और क्योंकि इनमें इण्टरेस्ट-बेस्ड ‘कॉमन कन्शेसस’ नहीं बन सकती है इसीलिए औक़ात-दारों की स्ट्रिक्‍ट वार्निंग्स के बाद भी दोनों वैरायटीज़ के कुछ ऐसे बन्दे दिखाई पड़ जाते हैं जो, यदा-क़दा ही सही, अपना ख़ुद का ही राग अलाप देते हैं।”

घर वापसी की बेला में हमारी जुबानों पर ताले जड़े हुए थे। एक सीमा तक दिमाग़ों पर भी। लेकिन हालिया घण्टों में सामने आयी खबरों ने कुछ ऐसा जोर मारा कि खाट पर पीठ टिकाते ही मेरे दिमाग़ का खटका खुल गया। बीते दौर के ढेरों किरदार एक के बाद एक जेहन में परेड कर गये। अपने भी और पराये भी, आजादी से लेकर प्रेसीडेण्ट इलेक्‍शन की ताजा-तरीन गहमा-गहमी तक, बीते लम्हों की इस परेड ने ऐसा धोबी-पछाड़ दिया कि कहाँ गुमटी वाले के आगे हमारी बोलती बन्द हो गयी थी और कहाँ मुझे उसकी फ़िलॉसफ़ी में खोट तक दिख गया — उसने माइनॉरिटी हिन्दुस्तानियों की बेहद खास एक ऐसी वैरायटी मिस कर दी थी जिसकी पॉपुलेशन लगातार बढ़त पर है। मेरा यह क्लासिफ़िकेशन कास्ट बेस्ड पॉलिटिकल क्लासिफ़िकेशन नहीं है। मेरे इस क्लासिफ़िकेशन में कभी औक़ात-दार रह चुके वे लोग आते हैं जिनकी औक़ात या तो मटिया-मेट हो चुकी है या फिर मटिया-मेट होने को है। और हाँ, इन सारे ही लोगों में एक कॉमन खासियत है — दिन-रात इसी जुगत में रहते हैं कि कैसे वह टर्निंग प्वाइण्ट हासिल करें कि खो चुकी अपनी औक़ात रि-गेन हो जाए?

नहीं, गलत समझ रहे हैं। यह ठीक है कि कांग्रेसी मोनार्की की लेटेस्‍ट तख़्त-नशीन मोहतरमा को लेकर एक खास खुलासा करने की टाइमिंग और, लगे हाथों, ‘अपनी अन्तरात्मा की आवाज नहीं सुनने’ जैसा कबूल-नामा भी कर लेने से क़लाम साहिब की नेक-नीयती पर उँगलियाँ उठना शुरू हो गयी हैं। बीते दिनों की फ़ाइलों से पहले ‘विदेशी मूल का मुद्दा मेरी राह में नहीं आयेगा’ और फिर ‘ हालातों ने अपने फैसले पर पुनर्विचार को मजबूर कर दिया’ जैसे सोनिया-उवाचों को दिखा-दिखा कर क़लाम साहिब को मुँह चिढ़ाना तो पॉलिटीशियन्स की फ़ील्ड है। मुझ जैसे एक अदना से हिन्दुस्तानी की इतनी संवैधानिक औक़ात कहाँ कि वह अपने एक्स प्रेसीडेण्ट पर, बहाने से ही सही, ऐसी फब्ती कस सके?

यह रि-गेनिंग टेक्‍टिस भी गजब का हथ-कण्डा है। इसमें टाइमिंग का खासा वजन होता है — वह कहते भी हैं ना कि खुदा मेहर-वान तो मच्छर भी पहल-वान! गौरी सोलह बार पिटा लेकिन सत्तरहवें फेरे में पृथ्वीराज को बन्दी बना कर ले भगा। गुजरात हो या कर्नाटक, धमकियों के ताजे बीजेपी-एपीसोड्स दरअसल ‘गौरी-टेक्टिस’ के हिन्दुस्तानी इलेक्शन-संस्करण ही हैं। बस, जरा से फ़र्क के साथ। गौरी लूटना चाहता था और ये लोग लूटने की अपनी खो खो चुकी औक़ात को वापस हथियाना चाह रहे हैं।

वैसे, दूसरे को अपनी औक़ात साबित करने की चुनौती देना भी एक तरह की ‘औक़ात रि-गेनिंग’ टेक्‍टिस ही है। नहीं समझे? कोई बात नहीं, समझाता हूँ — यह ठीक है कि उनके बुरे दिन चल रहे हैं लेकिन इतने बुरे भी नहीं कि अपने दिग्गी भाई को भूल गये होंगे। कभी बड़े औकात-दार हुआ करते थे। इतने कि अफ़वाहें तैरती रहती थीं कि मैडम हुजूर ने बेबी हुजूर को सिखाने-पढ़ाने और आगे बढ़ाने का ठेका इन्हें ही दे रखा है। फिर समय ने करवट ली। सब कुछ मटिया-मेट हो गया। इनका भी और उनका भी। सब देख रहे हैं कि कल का सिंधिया छोरा इन्हें धकिया कर आगे बढ़ चुका है। आज-कल टीम अन्ना को धूर देते फिर रहे हैं कि औक़ात हो तो शिवराज के मुँह पर कालिख पोत कर दिखाओ!

(०१ जुलाई २०१२)