उल्‍टे बाँस बरेली को!

Fourth Pocket

उकसाये जाने पर भी मैं यह कहने को तैयार नहीं कि घबरा देने वाले ऐसे माहौल में ‘लोक-तन्त्र का गला घोंट देने’ का खुला आरोप झेल चुका शख़्स उतनी ही ताकत एक बार फिर से कब्जा सकता है। मैं तो बस यह सोच कर दु:खी हूँ कि बाँस के कन्साइन्मेण्ट्स उल्टे बरेली लौटने लगे हैं।

आजीवन अर्थ-शास्‍त्री रहे किसी इण्डियन का लिखा पढ़ रखा था कि दुनिया में ब्राह्मण से लेकर शूद्र तक का एक एण्ड-लेस शासन-चक्र चलता रहता है। उसकी थ्योरी थी कि दुनिया में सबसे पहले ब्राह्मणों का राज हुआ, उसके बाद ठाकुरों ने टेक-ओवर किया, उनसे बनियों ने हथियाया और तब शूद्रों ने वणिकों को खदेड़ भगाया। लेकिन जल्दी ही सत्ता एक बार फिर से ब्राह्मणों के हाथ लग गयी। उसने इसे एक कण्टिन्युअस साइक्लिक प्रॉसेस बतलाया था। उसने यह सब तब लिखा था जब खुद को प्रोग्रेसिव कहलवाने का शौक पालने वाले चुनिन्दा अक़्ल-मन्द इस दुनिया को बुर्जुआ और कम्यून शैलियों में बँटा हुआ ठहरा कर वर्ल्ड-फ़ेमस हो चुके थे।

लेकिन, आगे कुछ और कहूँ उसके पहले यह साफ़ कर देना चाहता हूँ कि वह इण्डियन थिंकर हमारे पीएम ’दार जी नहीं हैं। वैसे भी, पॉलिटिक्स के कीचड़ में अपनी पगड़ी की निचली कगार तक डूबते जाने के इन बीते सालों में ’दार जी की बद-नामी कुछ ऐसी हो गयी है कि ताजी पीढ़ी में कोई यह भरोसा करने को तैयार नहीं है कि वे सच में ही ‘अर्थ-शास्‍त्री’ हुआ करते थे। बल्कि, इस पीढ़ी को तो यह तक लगने लगा है कि यह बन्दा देश का अब तक का सबसे पहुँचा हुआ ‘अर्थ’-शास्‍त्री है।

खैर, ख़याल अपने-अपने। और, मेरा अपना ख़याल है कि क्योंकि इकॉनॉमिक्स का ठेठ हिन्दुस्तानी दर्शन गढ़ने वाला वह बन्दा प्योर इण्डियन था, बॉर्न भी और कल्चरली भी। उसका जेहन उस खालिस इण्डियन उलाहने से इम्प्रैस्ड रहा होगा जो हालातों का मजाक़ ‘उल्टे बाँस बरेली को’ कह कर उड़ाता है। दरअसल, यह उलाहना ‘लौट कर बुद्धू घर को आये’ के बनिस्बत ‘डाल का पंछी आखिर-कार लौट कर डाल पर ही आता है’ के ज्यादा नजदीक है। जानता हूँ, बातों को कहने का यह सलीका बहुतों को सुहाता है।

यों, सुहाने से ताजी पॉलिटिकल भगदड़ की याद आ गयी। यों, भगदड़ से इनीशियल फ़ीलिंग वन-डायरेक्शनल ट्रैफ़िक की होती है। हमारे देश में वह होती भी रहती है। जैसे, न्यूक्लियर डील पर सरकार का समर्थन करते समय मची थी। लोकपाल बिल पर पार्लियामेण्ट में हो रही बहस को बिलोरने की होड़ के समय भी। लेकिन यह तब होता है जब इण्टरेस्‍ट्स की कोई स्वीपिंग कॉमन-नेस होती है। वो आज नहीं है। आज तो मोल-तोल का वक़्त है। इन-फ़ैक्‍ट, प्रेसीडेन्शियल इलेक्‍शन्स ने पार्लियामेण्ट में खात रखने वाली छुट-भैया पार्टीज़ को आख़िरी अपार्चुनिटी दी है। ‘मुँह में राम, बगल में छुरी’ की तर्ज पर डबल-क्रॉस करने से भी नहीं चूका जायेगा। संगमा ने तो तब महज सम्भावना का दरवाजा दिखलाया था जब जेडीयू रायसीना हिल की दौड़ में कांग्रेस के साथ होने का बढ़-चढ़ा दिखावा कर रही थी। लेकिन, अब एक नयी बानगी भी दिखी है — एनडीए के बीजेपी धड़े ने हवा उड़ा दी है कि जेडीयू चीफ़ शरद यादव वाइस प्रेसीडेण्ट के लिए एनडीए कैण्डिडेट हो सकते हैं! गोया, भगदड़ के दो-तरफ़ा होने का मजा आने वाला है। क्या पता, बुद्धू लौट कर घर भी आ जाये! वह कहते भी हैं ना, एवरी थिंग इज़ फ़ेयर इन लव एण्ड पॉलिटिक्स!

अब, मेरे ऐसा कहने से अगर किसी को यह लगे कि चिदम्बरम ने मिनरल वाटर पर तो पैसा लुटाने लेकिन गेहूँ-चावल की कीमत में एकाध रुपये का इजाफ़ा होने पर आसमान सिर पर उठा लेने वालों की जो खिंचाई की थी वह प्रणव का साथ देने की थोथी सफाई देते ग़ैर-कांग्रेसियों को खिझाने की दबी-छिपी नीयत से किया था तो यह उसके अपने मन का पाप होगा। ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस के पतले हालात पर पूछे गये सवाल पर उनके भोले-भाले रिएक्शन को ले कर कुछ लोगों ने यह हाय-तौबा मचाया था कि सलमान खुर्शीद अमूल बेबी का ताबूत गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। लोग भूल जाते हैं कि ‘साख़ बचाने के लिए ढेरों पापड़ बेलने पड़ते हैं’ वाला यह राजनैतिक हथ-कण्डा खुर्शीद मियां ने खुद माँ-बेटे से ही सीखा है!

सीखने से याद आया — जरूरी नहीं कि ‘सीख’ की डायरेक्शन सौ फ़ीसदी ठीक हो। अब देखिये ना! सरकारी खजाने से बड़ी रक़में खर्चने के पीछे ‘नाल काटने’ की खास नीयत के होने की घटनाओं की बाढ़ भुगतते-भुगतते आम आदमी को यह कन्फ़्यूजन होने लगा है कि हर खर्च के पीछे यही नीयत होती है। प्रेसीडेण्ट और वाइस प्रेसीडेण्ट की कुर्सियों पर उनकी नाम-जदगी के धूमिल होने की खबरों के बीच जब अचानक यह खबर आयी कि पार्लियामेण्ट के लिए एक नयी बिल्डिंग बनाना तय किया गया है तो ऐसे कन्फ़्यूज्ड लोग चौंक गये थे। एक खास प्वाइण्ट ने उनका कन्फ़्यूजन गहरा दिया है। खबर है कि अन्तिम साँसें लेती इस पार्लियामेण्टरी पारी की चीफ़ मीरा कुमार ने एक हाई पावर कमेटी तक बना दी है जो नये पार्लियामेण्टरी घोंसले पर अपने उच्च विचार जल्दी ही उन्हें सौंप देगी।

खैर, डेमोक्रेसी में यह सब तो लगा ही रहता है। यों, हमारे यहाँ जब डेमोक्रेसी की नींव रखी गयी थी तब आइडिया यह था कि हमारे लीडर्स के ऊँचे आदर्श डेसीपेट कर टॉप से नीचे गहराई तक जायेंगे। ‘यथा राजा तथा प्रजा’ वाले त्रि-शंकु की तर्ज पर। यह ठीक भी था क्योंकि सोचा गया था कि ज्यों-ज्यों गंगा में जल बहेगा उसके प्रवाह में ‘राजा’ जैसा पुराना इफ़ैक्‍ट धुलता जायेगा। लेकिन कैलकुलेशन में कहीं कुछ गड़-बड़ हो गयी। ‘लीडर’ से ‘लीडर्स’ होने की प्रॉसेस में न जाने कब क्वालिटी-लॉस हो गया। मेजॉरिटी प्रोडक्‍शन-लाइन करप्‍ट हो गयी। धीरे-धीरे यह करप्शन नये सिरे से इण्टेसिफाई भी होने लगा। इस बार बॉटम में। कहने वाले कहते फिर रहे हैं कि ऊपर से नीचे बही धारा नीचे आते-आते इतनी इण्टेन्सिफाई हो गयी कि पलट कर नीचे से ऊपर की ओर बह पड़ी। इससे एक नया, उल्टा, पिरामिड बना। ‘यथा प्रजा तथा राजा’ वाला।

नहीं, आपके उकसाने पर भी मैं यह कहने को तैयार नहीं कि घबरा देने वाले ऐसे माहौल में ‘लोक-तन्त्र का गला घोंट देने’ का खुला आरोप झेल चुका शख़्स उतनी ही ताकत एक बार फिर से कब्जा सकता है। मैं तो बस यह सोच कर दु:खी हूँ कि बाँस के कन्साइन्मेण्ट्स उल्टे बरेली लौटने लगे हैं।

(१५ जुलाई २०१२)