बदले-बदले सरकार नजर आते हैं!

Fourth Pocket

ओबामा भले ही बड़-बड़ाते फिरें कि इण्डियन्स बदले जमाने के कम्पल्शन्स को समझ नहीं रहे हैं लेकिन मैंने नोटिस किया है कि हमारे घाघ पॉलिटीशियन्स केवल नाम के ही नहीं बल्कि चरित तक के पक्के घाघ हो गये हैं।

जब से हिन्दी लिटरेचर में अलंकारों को पढ़ने-समझने की उमर पायी है, भाषा-लालित्य का एक बेहतरीन एग्ज़ाम्पल सुनता आया हूँ — कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय, या खाये बौरात है बा पाये बौराय। पढ़ाने-सिखाने वाले बुजुर्ग बतलाते हैं कि कनक (धतूरा) और कनक (सोना) को कम्पेयर करता यह अलंकार बहुत पुराना है। इतना कि इसके सामने सत्ता हथियाने के लिए होने वाली झीना-झपटियों की सारी ताजा बातें महज नव-जात ही ठहरेंगी।

जानता हूँ। मेरी अकल पर सवाल खड़ा करने का परमानेण्ट ठेका उठाने वालों को मेरी इस बात में सिर्री-पन का एक नया तड़का ही दिखेगा। उन्हें लगेगा कि सावन के महीने में भी सूखे की मार झेलते-झेलते मेरे दिमाग़ के सारे कैमिकल्स सूख गये हैं। लोचा सामने आने लगा है। पर मैं साफ़ कर दूँ कि मैं दुर्वासा की कलियुगीन रेप्लिका ‘ममता’ के पॉलिटिकल नफ़े-नुकसान की पोथी को हाथ लगाने को भी तैयार नहीं हूँ। वो क्या है ना, राजनीति में जो जैसा करता है वैसा फल पा भी लेता है। वह भी हाथ के हाथ। एण्ड, दीदी ने भी अपने हाथ जला ही लिए। खबरें हैं कि वे अब ऐसे रोल को तलाश रही हैं जिसमें और कुछ मिले न मिले कम से कम मुफ़ीद मलहम का मेहनताना तो मिल ही जाए!

‘रोल’ की बात उठी जरूर है लेकिन कोई कन्‍फ़ूजन न पालें। मैं इसे महज संजोग मानता हूँ कि सब कुछ एक सीक्वेन्स में हुआ है। पहले खुर्शीद मियां ने फरमाया कि राहुल लीड रोल लेने से बचते हैं। फिर माता जी ने जोड़ा कि ख़ुद अमूल बेबी ही तय करेगा कि उसका घुड़-चढ़ी का मुहूर्त कब आयेगा? इसके बाद बेटा श्री ने ऐलान किया कि वह ‘बड़ी’ भूमिका के लिए तैयार हैं। वैसे, मजाक उड़ाने का बिजनेस करने वालों ने निरा बालक मन से निकली इस बात में भी सीरियस सी गुंजाइश ढूँढ़ ली है। हुआ यह कि प्रेसीडेण्ट के लिए हुई वोटिंग के तुरन्त बाद, नेचुरल एक्साइटमेण्ट में, अमूल बेबी की जुबान बे-वक़्त सी फिसल गयी। कह बैठे कि वे तो तैयार हैं लेकिन जिम्मेदारी ‘कौन सी’ होगी और इसे ‘कब देना’ है यह मम्मी सोनिया और अंकल मनमोहन को तय करना है! गोया, यह महज ‘स्लिप्स ऑफ़ टंगू’ है। जाहिर सी बात है। जो जितना बड़ा हैसियत-दार होगा, उसकी जुबान भी तो उतनी ही ज्यादा फिसलेगी!

लेकिन, मेरे ऐसा कहने से यदि आपको लगने लगे कि ‘बौराने’ वाला जुमला जुबान की ऐसी फिसलनों पर भारी पड़ता है तो यह आपकी अपनी ही सोच होगी। इस सोच की भी भली चलाई। अब देखिये ना, प्रणव को वोट करते-करते मुलायम झौंकिया गये और उनका ठप्पा फिसल कर संगमा पर ठुक गया। यों, बाद में इतना भूल-सुधार तो कर ही लिया कि एक और ठप्पा लगा कर संगमा के मुँह से भी अपने वोट का कौर छीन लिया। यह दीगर बात है कि अब कुछ लोग फुस-फुसा रहे हैं कि मियां मुलायम उस दिन की दवा की अपनी डोज़ लखनऊ से साथ लाना भूल गये थे। शायद इसी से उनके दिमाग ने दिल का कण्ट्रोल सडनली खो दिया था। लेकिन, कुछ इस ओर इशारा करने की कोशिश कर रहे हैं कि ऐसा करके आज की राजनीति के इस महा-बली यादव ने आने वाले दौर के अपने धोबी-पाट की बानगी ही तो दिखायी है!

बानगी की बात निकली तो बानगियों की एक पूरी फेहरिश्त जेहन में लेफ़्ट-राइट कर गयी। क्या, सुनना चाहते हैं? चलिए, सब तो नहीं पर दो-तीन तो अभी के अभी परोस देता हूँ —

लेडीजों की एक पॉलिटिकल लीडर हैं। एमपी की। अपनी ही पार्टी की सरकार होने से रुतबा-नशीं हो गयी बीजेपी की ये मोहतरमा अपनी संगी-साथिनों के साथ कोर्ट में हाजिरी को पहुँचीं। हाजिरी लाजिमी इसलिए हो गयी थी कि कोर्ट में हाजिरी से मुँह चुरा रही इन देवियों के खिलाफ़ अरेस्ट-वारण्ट निकल गया था। अमन-चैन कायमी के लिए लगी धारा १४४ को तोड़ कर जुलूस निकालने का १० साल पुराना एक मामला, वारण्ट की लामीली नहीं हो पाने से, पिछले तकरीबन छह साल से तारीख दर तारीख टरक रहा था। किस्सा कोताह यह कि बेहद पर्सनल, एक फौजदारी मामले में, सफ़ाई-देह होकर कोर्ट पधारने की जहमत उठाने के लिए भोपाल से इन्दौर पधारी मैडम साहिबा ने लाल बत्ती वाली अपनी ओहदे-दार गाड़ी का इस्तेमाल किया था।

दूसरी बानगी गांधी-दर्शन के आज के कांग्रेसी वर्ज़न की है। नहीं, एमपी की विधान सभा की कार्यवाही को रोकने की नीयत से, असेम्बली अध्यक्ष को खुले केबिन में कैद करके रखने वाली नहीं। अध्यक्षीय दण्ड को आसन्दी तक पहुँचने से रोकने वाली भी नहीं। यह सब तो उस चौ-हद्दी के भीतर हुआ जहाँ केवल चुनिन्दा रसूख-दार ही पहुँच पाते हैं। मेरा मतलब है कि मोर यदि जंगल में नाचता भी तो उसके नाच को देखता कौन? यह वाली बानगी तो राजधानी की भारी-भरकम ट्रैफ़िक वाली खुली सड़क के एक चौराहे पर देखने मिली। आला लीडर्स की मौजूदगी में भी खुली हुड़-दंग हुई। कांग्रेस के लोग बीजेपी पर बरसे तो इसमें अजूबा कुछ नहीं था। कुछ करते दिखने का जुनून था जिसकी रस्म-अदायगी पूरी शिद्दत से हुई। शायद कुछ ज्यादा ही शिद्दत से। इसीलिए दिग्गी राजा को सफ़ाई देनी पड़ी कि सब कुछ ‘गांधी’ की गाइड-लाइन को फ़ालो करते हुए हुआ! अब यह अलहदा बात है कि कुछ लोगों ने दिग्गी के इस ‘गांधी’ पर बड़ा सा क्वश्‍चन मार्क जड़ कर उसे अण्डर-लाइन भी कर दिया है! दरअसल, ये वे लोग हैं जिन्होंने यह भी देख लिया था कि जब मंच पर ठीक दिग्गी के पीछे खड़े किसी मुश्टण्डे ने कुछ ज्यादा ही उत्साह दिखलाया तो अपनी पर उतर आये दिग्गी राजा झल्ला कर बुरी तरह से चीख पड़े थे।

खैर, वापस झीना-झपटियों के मूल मुद्दे पर आता हूँ। यह बतलाने की कोशिश करता हूँ कि सत्ता के हमारे आज के खिलाड़ी इतिहास से सबक ले चुके हैं। मेरा मतलब है, ओबामा भले ही बड़-बड़ाते फिरें कि इण्डियन्स बदले जमाने के कम्पल्शन्स को समझ नहीं रहे हैं लेकिन मैंने नोटिस किया है कि हमारे घाघ पॉलिटीशियन्स केवल नाम के ही नहीं अब चरित के भी पक्के घाघ हो गये हैं।

कैसे? तो, जयचन्द और मीर जाफ़र को याद कीजिए। फ़ेमस है कि पहले सत्ता की डोर दूसरे के हाथ में देखने से बेचैन रहने वाले, कुढ़न के मारे, दुश्मन देश के सत्ताधीशों तक को न्यौत लेते थे। लेकिन यह कौम अब एक्सटिंक्‍ट हो गयी लगती है। दरअसल, अब कच्छ के रन से लगा कर बंगाल की खाड़ी तक केशुभाइयों और ममतामयी दीदियों की तो सेण्टर में पवारों की ऐसी नयी कौम छाने लगी है जो मिले-जुले डिब्बों की छुक-छुक गाड़ी को हिचकोले तो भर-पूर देती रहती है लेकिन पटरी से तभी उतारेगी जब केवल ड्राइवर और गार्ड के नहीं बल्कि कण्ट्रोलिंग केबिन्स पर भी उसी का कब्जा हो!

(२२ जुलाई २०१२)