साँप भी मरे और लाठी भी न टूटे

Twarit

क्या रेल बजट से पहले अभी से ही भाड़े में इतनी ज्यादा बढ़ोत्तरी केवल इसलिए की गयी है ताकि जब रेल्वे में एफ़डीआई की योजना लागू हो जाये तब भाड़ा बढ़ा कर देश के हितों को चोट पहुँचाने के आरोप का टीका एफ़डीआई के माथे नहीं लगे और यह सरकार विदेशी पूँजी-निवेशकों के हाथों में देश-हित को गिरवी रख देने के गम्भीर आरोप से बची रह सके?

भारतीय रेल्वे ने आज अचानक ही यात्री किराये में १४% और माल भाड़े में ६.५% की भारी बढ़ोत्तरी की घोषणा की है। यह वृद्धि २५ जून से लागू होगी। एनडीए की नयी सरकार के गठन के बाद आने वाले पहले बजट-सत्र से पूर्व ही किराये में की गयी यह वृद्धि भारतीय रेल के इतिहास में की गयी अभी तक की सम्भवत: सबसे बड़ी एक-मुश्त वृद्धि होगी।

भाड़ा-वृद्धि की सफ़ाई में रेल मन्त्री सदानन्द गौड़ा दूर की एक ऐसी कौड़ी पेश कर रहे हैं जो बड़ी गजब की है। वे कह रहे हैं कि यूपीए की सरकार ने जाते-जाते भाड़ा-वृद्धि का प्रस्ताव कर दिया था और उसी के कारण एनडीए की नयी सरकार यह वृद्धि करने को विवश हुई है। आम आदमी के मन में यह सवाल उठने लाजिमी हैं कि क्या यह विवशता सचमुच इतनी गहरी थी कि कुछ दिनों बाद आने वाले रेल बजट तक रुकने की भी कोई गुंजाइश नहीं रही थी? या फिर, इस बढ़ोत्तरी की तह में अधिक गहरा कोई दूसरा गोरख-धन्धा पनपने वाला है?

दरअसल, अभी कुछ दिन पहले ही रेल मन्त्रालय से संकेत आये थे कि भारतीय रेल्वे में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को स्वीकृति दी जाने वाली है। खबरें हैं कि एफ़डीआई की यह रेल-योजना एकदम पक्की है और आसन्न बजट-सत्र में इसके सारे पत्ते खुल जायेंगे। विपक्ष में बैठने के अपने हाल ही के दिनों तक भाजपा एफ़डीआई का विरोध इसी आधार पर करती रही है कि इससे मँहगाई तो बढ़ेगी ही, देश और आम आदमी के हित भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होंगे।

तो क्या यह मान लिया जाये कि रेल-भाड़े में अचानक ही की गयी वृद्धि की यह घोषणा एक सोचे-समझे राजनैतिक गोरख-धन्धे को संरक्षण देने की योजना के तहत्‌ ही की गयी है? रेल बजट से पहले अभी से ही भाड़े में इतनी ज्यादा बढ़ोत्तरी केवल इसलिए की गयी है ताकि जब रेल्वे में एफ़डीआई की योजना लागू हो जाये तब भाड़ा बढ़ा कर देश के हितों को चोट पहुँचाने के आरोप का टीका एफ़डीआई के माथे नहीं लगे। और ‘अच्छे दिन’ का सपना दिखा कर सत्ता में आयी एनडीए की यह सरकार विदेशी पूँजी-निवेशकों के हाथों में देश-हित को गिरवी रख देने के गम्भीर आरोप से बची रह सके। गोया, साँप भी मर जाये और लाठी भी नहीं टूटे।

(२० जून २०१४)