राष्‍ट्र-भाषा हिन्दी के प्रति मीडिया का दायित्‍व

Bahas

पत्र-कारिता और मीडिया की सचाइयाँ परस्पर भिन्न हैं। यह भिन्नता इस व्यवहारिक सचाई से समझी जा सकती है कि ‘पत्र-कारिता’ की प्रतिष्‍ठा एक सामाजिक धर्म की रही है जबकि ‘मीडिया’ की आज की औसत पहचान पत्र-कारिता के सहारे व्यावसायिक हितों की पूर्ति करने वाले एक संस्थान के पर्याय की है।

बात को आगे बढ़ाया जाए तो ऐसा कहना कतई आपत्ति-जनक नहीं होगा कि हिन्दी की सुधि लेने का प्राथमिक दायित्व इसके साहित्य-कारों का है। समाचार-माध्यमों को ऐसा कोई विशेषाधिकार कभी भी प्राप्‍त नहीं रहा कि वे भाषा के संवर्धन का ठेका हथिया सकें। सीमित से अपवादों को छोड़ दें तो मीडिया के नाम से पहचान पा चुके आज के समूहों का पहला, और सम्भवत: एक-मात्र भी, ध्येय व्यावसायिक सफलता है।

इन स्थितियों में, मीडिया से ‘भाषा के प्रति दायित्‍व’ जैसी किसी भी अपेक्षा को रखने अथवा न रखने का प्रश्‍न अपने आप में ढेरों प्रश्‍न-चिन्हों से घिरा हुआ मिलता है।

बीते दिनों हिन्दी पढ़ाने वाले महाविद्यालयीन गुरु-जनों के बीच एक राष्ट्रीय विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के खर्चे-पानी के सौजन्य में हुई इस शैक्षिक गोष्ठी में यों तो अनेक विषय रखे गये थे किन्तु एक विषय था ‘राष्‍ट्र-भाषा हिन्दी के प्रति मीडिया का दायित्‍व’। आयोजकों के मानस में राष्ट्र-भाषा के प्रति कितना सम्मान था, या कहें कि राष्ट्र-भाषा के प्रति उनकी समझ किस स्तर की थी, इसे हिन्दी-विषयक इस विषय में ‘मीडिया’ जैसे विशुद्ध अंग्रेजी शब्द के उपयोग से ही जाना जा सकता है। फिर भी, क्योंकि तथा-कथित शोध का एक मुद्दा उठा था इसलिए मुझे लगा कि शिक्षण-पाठन से इतर, औसत भारतीय दृष्टि-कोण से, इस विषय पर एक बहस खोली जाए।

सच कहें तो, ‘राष्‍ट्र-भाषा हिन्दी के प्रति मीडिया का दायित्‍व’ कुछ अधिक ही क्लिष्‍ट विषय-वस्तु है। क्लिष्‍टता का आरम्भ इसी एक सरल से तथ्य से हो जाता है कि सरसरे ढंग से देखने पर, ‘राष्‍ट्र-भाषा हिन्दी’ तथा ‘मीडिया’ के रूप में, इसके मात्र दो कारक-तत्व दिखलायी देते हैं जबकि यथार्थ में इसके तीन घटक हैं — ‘राष्‍ट्र-भाषा’, ‘हिन्दी’ और ‘मीडिया’। किन्तु, क्लिष्‍टता यहीं समाप्‍त नहीं होती। ‘राष्‍ट्र-भाषा’ और ‘मीडिया’ नामक घटक भी, अपने आप में, अलग-अलग क्लिष्‍टताओं से परि-पूर्ण हैं।

भाषा के अर्थ में ‘हिन्दी’ के प्रादुर्भाव की गाथा अधिक पुरानी नहीं है। भारतीय सन्दर्भ में तो, एक पारिभाषिक शब्द की तरह, स्वयं ‘भाषा’ का प्रचलन भी नया-नया है। जहाँ पहली सचाई यह है कि सर्व-प्रचलित लिपि तथा बोली के रूप में संस्कृत के अवसान का आरम्भ होते-न होते, भारत में विविध ‘स्थानीय बोलियाँ’ प्रचलन में आने लगी थीं वहीं दूसरी सचाई यह भी है कि इनमें से अनेक को लगभग समान लिपि का सहारा मिला। वर्तमान में इस लिपि के परिष्‍कृत स्वरूप को ‘देव-नागरी’ के रूप में जाना जाता है। इस देव-नागरी के प्रादुर्भाव व विकास के पृष्‍ठ उलटने पर समझ में आता है कि इसमें लिपि-बद्ध की जा रही विभिन्न उत्तर-भारतीय बोलियों के सम्मिश्रण से ही ‘हिन्दी भाषा’ का प्रादुर्भाव हुआ। आरम्भ में इसका जो नाम-करण हुआ था उसे ‘खड़ी-बोली’ के रूप जाना गया। प्रचलन तथा परिष्‍कार के आसरे और समूचे उत्तर भारतीय सामाजिक परिवेश का सर्वाधिक समर्थन प्राप्‍त कर इस खड़ी-बोली ने ही, धीरे-धीरे, अपनी पहचान ‘हिन्दी भाषा’ के रूप में स्थापित की।

ठीक इसी तरह, भारतीय इतिहास में ‘राष्‍ट्र’ एक बहुत नया शब्द है। इसका प्रादुर्भाव अंग्रेजों के पलायन की भूमिका के समानान्तर हुआ था। नयी पीढ़ी को भले ही अट-पटा लगे लेकिन सचाई तो यही है कि ‘अखण्ड भारत’ के नाम से जाने गये ऐतिहासिक कालों में भी यह ‘राष्‍ट्र-तत्व’, इस भू-खण्ड के निवासियों के हृदय का भाव, कभी नहीं रहा। हाँ, समय-समय पर किसी एक बल-शाली, या कहें कि प्रबल-प्रतापी, शासक के आधिपत्य में शासनाधीशों के असीम व विस्तृत राज्य-समूह अवश्य बने। इस सूची में रामायण और महाभारत काल से लगा कर चन्द्रगुप्‍त काल तक की पूरी सूची को रखा जा सकता है। स्वतन्त्र भारत में ही पहली बार ‘राष्‍ट्र’ की जन-भावना व्यवहारिक रूप से अस्तित्व में आयी। किन्तु, इससे पहले ही, यह व्यवहारिक सचाई भी उजागर हो गयी थी कि इस राष्‍ट्र के संचालन के लिए नागरिकों की एक सर्व-स्वीकार्य राज-नैतिक प्रक्रिया का निर्धारण, और उसका पालन भी, आधार-भूत आवश्यकता होगी।

राष्‍ट्र-निर्माण की नींव के गढ़े जाने की प्रक्रिया के बीच ही, बिल्कुल स्पष्‍ट समझ पड़ने वाले कारणों से, इस स्वतन्त्र राष्‍ट्र का राज-नैतिक नेतृत्व जिनके हाथ में आया उस कथित सम्भ्रान्त वर्ग की सोच यह थी कि सरकारी काम-काज के लिए, केवल और केवल, अंग्रेजी ही सबसे उपयुक्‍त भाषा रहेगी। किन्तु, बहु-संख्य नागरिक इस विचार से सहमति नहीं रखते थे। साहित्य और सामाजिक सोच में अग्रणी उन व्यक्‍तियों ने असहमति के इस सुर को पूरी मुखरता दी जो व्यापक भारतीय अस्मिता के संरक्षण को ध्येय बना कर ही, अपने-अपने ढंग से, स्वतन्त्रता-आन्दोलन से जुड़े थे। इसी बिन्दु पर ‘राष्‍ट्र-भाषा’ के भारी दिखावे से भरे आधुनिक नाटक का सूत्र-पात हुआ।

तथ्यों की निष्‍पक्ष समीक्षा करने से सारे षडयन्त्र को आसानी से समझा जा सकता है। यह भी समझा जा सकता है कि इसके पीछे देश पर अनन्त काल के लिए अंग्रेजी को थोपे रखने की अभिजात्य कुटिलता काम कर थी। पहले कदम के रूप में अंग्रेजी को सरकारी काम-काज की भाषा घोषित कर दिया गया। अंग्रेज-पोषित यह वर्ग स्वाभाविक रूप से विकसित और पर्याप्‍त समृद्ध हो चुकी विभिन्न देशज भाषाओं अर्थात्‌ बोलियों को तो, टक-साली हिन्दी के विकास के नाम पर, पतन के गर्त की ओर पर्याप्‍त दूरी तक पहले ही ठेल चुका था। अब बारी गिरते-पड़ते, किसी तरह रूप लेते, हिन्दी के इस नये ‘भाषाई’ संस्करण की थी। ‘हिन्दी भाषा’ को उसकी अपनी ही नियति पर छोड़ देने से वह न केवल अपने अस्तित्व को बनाये रखने में सफल हो जाती अपितु, समय का सहारा पाकर, नैसर्गिक रूप से विकसित भी होती जाती। यह इसलिए सम्भव होता क्योंकि समस्त वैचारिक मत-भेदों के बाद भी, एक बड़े भू-खण्ड और यहाँ बसने वाली दुनिया की सबसे विशाल जन-संख्या के बीच, परस्पर सम्बन्धों के निर्वाह की आवश्यकता जैसी, अपनी एक अन्तर्निहित शक्‍ति तो होती ही है। यही समय की ऐसी कसौटी है जिस पर खरा उतरने-न उतरने में भाषाई विकास का इतिहास छिपा होता है।

यहाँ उस तुर्की के उदाहरण को सामने रख कर बात को आसानी से समझा जा सकता है जहाँ जन-क्रान्ति के दबाव में खलीफ़ा सत्ता-त्याग को विवश हुआ था। क्रान्ति के बाद सत्ता की बागडोर अतातुर्क के हाथ में आयी। खलीफ़ा के समय में अंग्रेजियत का बोल-बाला रहा था क्योंकि वह अंग्रेजों के प्रति खुला रुझान रखता था। उसके शासन-काल में तुर्कों की मातृ-भाषा तुर्की सरकारी काम-काज में अंग्रेजी से पर्याप्‍त पिछड़ गयी थी। इसके विपरीत, तुर्की के प्रति अतातुर्क के रुझान से सभी परिचित थे। इसीलिए, तत्‍कालीन अभिजात्य वर्ग ने अतातुर्क के सत्ता सम्हालते ही उस पर इस बात का हर सम्भव दबाव डाला कि जब तक तुर्की भाषा सरकारी दायित्व के निर्वाह लायक पर्याप्‍त ‘सम्पन्न’ और ‘सक्षम’ नहीं हो जाती है अंग्रेजी को ही सरकारी काम-काज की भाषा बनाये रखा जाए। उसे यह समझाने का प्रयास किया गया कि इसके लिए अधिक से अधिक दस सालों तक और अंग्रेजी को झेलते रहना पड़ेगा। तब, तुर्की को राज-काज की भाषा घोषित करते हुए अतातुर्क ने जो कहा वह देशज सम्मान का अनोखा उदाहरण बन कर इतिहास के पन्नों में शामिल हो गया। उसने कहा, “समझ लो, वे दस साल अभी के अभी पूरे हो गये हैं।“ इस सरल सी देशज निष्‍ठा तथा उसके प्रति अदम्य आत्म-विश्‍वास का ही परिणाम है कि जहाँ तुर्की तत्‍काल प्रभाव से समूचे राष्‍ट्र की सर्व-स्वीकार्य भाषा बनी वहीं यूरोपीय समुदाय में तुर्की की स्वातन्त्रोत्तर महत्ता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

स्वतन्त्र भारत में हिन्दी की गाथा इसके सर्वथा उलट है। अंग्रेजों से सत्ता-मुक्‍ति के बाद भी यहाँ अंग्रेजियत के स्मारकों को सहेजने की प्रवृत्ति ही सत्ता-शीर्ष पर सवार रही। इसकी पूर्ति के लिए उसको शासकीय भाषा बनाने के दिखावे की सोची-समझी आड़ में, हिन्दी के ‘सर्व-मान्य मानकी-करण’ की दिशा में कुछ सिर-फिरों को बढ़ावा मिला। रघुवीर जैसे लोगों ने हिन्दी का ऐसा स्वरूप परोसा कि गैर हिन्दी-भाषियों की कौन कहे स्वयं हिन्दी मातृ-भाषी भी उसे अपने गले से नीचे नहीं उतार पाये। भुला दिया गया कि ‘भाषा-शुद्धता’ जैसी कोई चीज हो ही नहीं सकती है। भाषा-विकास की इस आधार-भूत सचाई की खुली उपेक्षा कर दी गयी कि काल और परिवेश के प्रवाह में भाषा सहज और नैसर्गिक रूप से, स्वत: विकसित और समृद्ध होती है। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी के विरोध में ऐसा वातावरण बन गया जिसने सुनिश्‍चित कर दिया है कि आगामी अनेक दशकों तक ‘राष्‍ट्र-भाषा’ हिन्दी को ‘राष्‍ट्र की भाषा’ के रूप में स्थापित कर पाना अब बहुत टेढ़ी खीर हो चुका है।

हो सकता है कि तत्‍कालीन सरकारी तन्त्र की इस मंशा में नीयत की किंचित्‌ सचाई भी रही हो कि वह हिन्‍दी को सरकारी काम-काज की भाषा बनाना चाहती थी। इसके बाद भी, इसके लिए हिन्दी को ‘राष्‍ट्र-भाषा’ घोषित करना बिल्कुल आवश्यक नहीं था। बीते दिनों की घटनाएँ साक्षी हैं कि यदि इस घोषणा से बचा गया होता तो हिन्दी के सरकारी स्वरूप के लिए चाहे जितने भी मानकी-करण रचे-गढ़े गये होते, वे ‘हिन्दी’ के लिए अस्तित्व-घाती प्रमाणित नहीं होते। तब एक ‘मानक सरकारी’ हिन्दी होती और होती एक ‘देशज हिन्दी’। लेकिन तब, सरकारी तन्त्र और सरकारी अन्ध-भक्‍तों को यह अधिकार नहीं मिला होता कि वे देशज हिन्दी के नैसर्गिक विकास को आयातित अंग्रेजियत से ओत-प्रोत करने में रंच-मात्र भी योग-दान कर पायें। हिन्दी के दुर्भाग्य से वह राष्‍ट्र-भाषा और सरकारी राजनैतिक नीयत के दो, विपरीत ध्रुवीय लेकिन समान उद्देशीय, पाटों के बीच पिस रही है।

राष्‍ट्र-भाषा के विकास में मीडिया के दायित्‍व की पड़ताल ने भाषाई विकास के इस विरोधाभास में एक और, सर्वथा नया, आयाम जोड़ दिया है। आरम्भ इस एक सहज तथ्य से होता है कि हिन्दी में ‘मीडिया’ नाम के ऐसे पारिभाषिक शब्द को शाश्‍वत्‌ सचाई की तरह परोसा जाने लगा है जिसकी अपनी ही सचाइयाँ किसी एक अक्ष पर स्थिर रही नहीं मिलतीं। वैसे, इस पर आपत्ति नहीं उठाई जा सकती कि इस नये शब्द ‘मीडिया’ का विकास पहले से चले आ रहे एक दूसरे शब्द ‘मीडियम’ से हुआ। लेकिन आधुनिक समाज की इस भुलक्‍कड़ी पर हँसी आने से रोके नहीं रुकती है कि स्वरूप का यह संक्षिप्‍ती-करण पहले-पहल विज्ञान-जगत की भाषाई पहल पर हुआ था। शाब्दिक विकास का इतिहास साक्षी है कि इसके बाद ही, धीरे-धीरे, इसका प्रयोग आम जन के बीच होने वाले व्यापक सम्प्रेषण (जिसे अंग्रेजी भाषा में ‘मास कम्युनिकेशन’ कहा जाता है) के लिए भी किया जाने लगा। सामान्य जन तक बनी इसकी इसी आम पहुँच ने यह भ्रम फैलाया कि ‘मीडिया’ का प्रादुर्भाव प्रचार-प्रसार के सम्प्रेषण के लिए प्रयुक्‍त होने वाले व्यापक माध्यम के अर्थ में हुआ। बाद में, आम जन के बीच बनी अपनी दैनन्दिन पकड़ का लाभ उठाते हुए समाचार-माध्यमों ने इस पर, एक तरह से, अपना एकाधिकार ही जमा लिया।

वैसे, यह भी कोई अन-होनी अथवा निन्दनीय विकास-यात्रा नहीं है। इसमें यदि अट-पटा है तो वह यह कि इस अर्थ में ‘मीडिया’ के अस्तित्‍व को स्वीकारते हुए, अधिकांश, हिन्‍दी-जगत्‌ ने यह आधार-भूत भाषाई सचाई भुला डाली कि हिन्दी भाषा इस भाव के लिए पर्याप्‍त पहले से ही जिस शब्द के माध्यम से समृद्ध हो चुकी थी वह ‘पत्र-कारिता’ है। हाँ, इस धारणा से असहमति रखने वाले भी अवश्य होंगे किन्तु उनकी संख्या पर्याप्त कम ही होगी। यों, एक सीमा तक वे ठीक भी कहे जा सकते हैं लेकिन पत्र-कारिता और मीडिया की सचाइयाँ परस्पर भिन्न हैं। यह भिन्नता इस व्यवहारिक सचाई से समझी जा सकती है कि ‘पत्र-कारिता’ की प्रतिष्‍ठा एक सामाजिक धर्म की रही है जबकि ‘मीडिया’ की आज की औसत पहचान पत्र-कारिता के सहारे अपने व्यावसायिक हितों की पूर्ति करने वाले एक संस्थान के पर्याय की है। इस तरह से, मीडिया ऐसा शब्द है जिसका विस्तार अनन्त है। इसे भाषाई सन्दर्भ में सीमित कर देखने से समझा जा सकता है कि यहाँ यह समाचार-जगत्‌ भी हो सकता है और साहित्य-जगत्‌ भी। या फिर, पाठ्य और दृष्य-श्रृव्य माध्यम भी। दूसरे शब्दों में, ऐसा प्रत्येक माध्यम जो विचारों का सम्प्रेषण करता हो अब स्वत: ही मीडिया की श्रेणी में आ जाता है।

बात को आगे बढ़ाया जाए तो ऐसा कहना कतई आपत्ति-जनक नहीं होगा कि हिन्दी की सुधि लेने का प्राथमिक दायित्व तो इसके साहित्य-कारों का है। समाचार-माध्यमों को ऐसा कोई विशेषाधिकार कभी भी प्राप्‍त नहीं रहा कि वे भाषा के संवर्धन का ठेका हथिया सकें। यह सच है कि पत्र-कारिता से जुड़ा अतीत का इतिहास उन उदाहरणों से भरा पड़ा है जो दर्शाते हैं कि हिन्दी के विकास में समाचार-माध्यम ने उल्लेखनीय योग-दान किया था। लेकिन, यह सारे उदाहरण उस काल-खण्ड से हैं जब हिन्दी के साहित्य-कार भी इस दिशा में प्राण-पण से जुटे हुए थे। यही नहीं, समाचार-मध्यम बहुत सीमित ही होते थे और उनमें भी अधिकांश रूप में ऐसे व्यक्‍ति संलग्न रहे जिनकी एक टाँग हिन्दी साहित्य-जगत्‌ से किसी न किसी प्रत्यक्ष-परोक्ष अर्थ में सम्बन्धित रही।

किन्तु, आज के अधिकांश समाचार-माध्यम, बिना किसी संशय के, व्यावसायिक कारणों से पनपे और बढ़े हैं। आर्थिक अपेक्षाओं, और उनमें निहित परस्पर प्रतियोगी भाव ने, इन्हें विवश कर दिया है कि वे बिना रुके, निरन्तर भाव से, चौबीसों घण्टे कुछ न कुछ परोसते दिखें। इस विवशता ने इनकी भाषाई शुचिता को कुछ इस सीमा तक नष्‍ट-भ्रष्‍ट कर दिया है कि इनके ग्राहक को भी लगने लगा है कि भाषा-दायित्व के किसी भी बोध से इन्हें कुछ भी लेना-देना नहीं बचा है। यह स्थिति उनके लिए तो चिन्ता-जनक है जो यह मानते हैं कि भाषा की बानगी लेकर किसी भी संस्कृति का सटीक मूल्यांकन किया जा सकता है किन्तु बाजार को इसकी चिन्ता कब रही? बाजार उस दर्शन पर टिकता है जो कहता है कि जो बिकता है उसके ‘खरे सोना’ होने से कोई मुँह भला कैसे मोड़ सकता है?

स्पष्‍ट है, मीडिया के नाम से पहचान पा चुके आज के समूहों का पहला, और सम्भवत: एक-मात्र भी, दायित्‍व व्यावसायिक सफलता है। सफलता की इस अन्धी दौड़ में भाषा का रायता बचे या बिखरे इसका उसकी प्राथमिकता की सूची में कोई स्थान नहीं है। उसके व्यवहार से इसकी चिन्ता तनिक भी झलकती नहीं दिख रही है कि उसके प्रयोगों से कहीं हिन्दी का खोवा तो नहीं कुट रहा है? हाँ, संयोग-वशात्‌, यदि कुछ सकारात्मक घट जाए तो इस ‘फिसल पड़े की हर गंगे’ का डंका पीटने में एड़ी-चोटी का जोर लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। हल्के-फुल्के ढंग से, और छीछा-लेदर वाली शैली में, इतर भाषाई शब्दों के घाल-मेल के प्रयोग को इस तरह से स्वीकारा जा सकता है कि ऐसा करने से इस तरह के लेखन का चुटीलापन तो बढ़ता ही है उससे जुड़ा शाब्दिक मनोरंजन भी पर्याप्‍त बढ़ जाता है। किन्तु, इस विरल सहमति से यह निष्‍कर्ष निकाल लेना गम्भीर त्रुटि होगी कि भाषा में, अब तो, हर कुछ चलने लगा है।

जहाँ सच है कि ‘भाषा-शुद्धता’ जैसी कोई चीज नहीं होती वहीं इस सचाई से भी आँखें नहीं मूँदी जा सकती हैं कि भाषा-शुद्धता से मिली इस छूट के मूल में सोच यह है कि, समय और सांस्कृतिक प्रवाह में, भाषा सदैव विकसित होती रहती है। लेकिन, विकास के इस क्रम में आधार-भूत भाषाई अनुशासन से कोई छूट कतई नहीं ली जा सकती है। उदाहरण के लिए, न तो लिपि में और न ही उच्चारण में ‘केन्द्र’ में प्रयुक्‍त व्यंजन ‘न’ को अनुस्वार में स्थानान्तरित किया जा सकता है जबकि ‘मीडिया’ में इस आधार-भूत भाषाई अनुशासन की धज्जियाँ खुल कर उड़ाई जा रही हैं; ‘केन्द्र’ अब बहुतायत से ‘केंद्र’ के रूप में लिपि-बद्ध होता मिल जाता है। इसी तरह, मीडियाई प्रकाशनों में ‘हँसी’ (हास्य) को ‘हंस’ (पक्षी) का ग्रास बना दिये जाने के उदाहरणों की भरमार है। वैसे भी, जब स्वयं ‘हिन्दी’ ही मीडियाई कृपा से ‘हिंदी’ होकर सिमट गयी हो तब किसी अन्य विकृति का रोना क्या और क्यों रोया जाए?

अब तो, ‘मत’ अथवा ‘मत-पत्र’ के लिए ‘वोट’ या फिर ‘शाला’ अथवा ‘पाठ-शालाओं’ के लिए ‘स्कूल’ और ‘स्कूलों’ के देव-नागरीय प्रयोग की बातें स्वाभाविक तथा सामान्य मान ली गयी हैं। ‘शौचालय’ और ‘स्नाना-गार’ इस सीमा तक ‘लैट्रिन’ व ‘बाथ-रूम’ बन कर रह गये हैं कि भय है कि भाषाई शब्द-कोष से हिन्दी के यह शब्‍द कहीं विलुप्‍त ही न हो जाएँ। और, यह भय निरा काल्पनिक भी नहीं है। आज की पीढ़ी से कोई यदि यह पूछ बैठे कि क्या वह किसी ‘आढ़तिए’ को जानता है तो उसका मुँह खुला का खुला रह जायेगा। जबकि, उसके निजी ज्ञान की सूची में ‘कमीशन-एजेण्ट्स’ के नामों की भर-मार तक हो सकती है! और तो और, अंकों के मामले में तो हिन्दी के अंकों को जैसे तिलांजलि ही दे दी गयी है।

यह समूचा घटना-क्रम भाषा-विकास नहीं है। चौ-मुखी स्वीकारिता के लिए होने वाला स्वाभाविक लिपि-विकास भी नहीं है। जहाँ हिन्दी भाषा षडयन्त्र-पूर्वक आयातित हो रहे आयातित शब्दों के बोझ से दबायी जा रही है वहीं इसकी लिपि मात्र टंकन के लिए प्रयुक्‍त होने वाले साधनों की अंग्रेजी-प्रधान उन व्यावसायिक यान्त्रिक प्राथमिकताओं से प्रताड़ित की जा रही है जो मुख्यत: मीडिया-उन्मुख हैं। स्पष्‍ट है, हिन्दी भाषा को दुर्गति के यह दिन ‘मीडिया’ के अन्धा-धुन्ध विकास के परिणाम के रूप में ही देखने पड़ रहे हैं। इन स्थितियों में, मीडिया से ‘भाषा के प्रति दायित्‍व’ जैसी किसी भी अपेक्षा को रखने अथवा न रखने का प्रश्‍न अपने आप में ढेरों प्रश्‍न-चिन्हों से घिरा हुआ मिलता है।

(२५ जुलाई २०१४)