आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : २

Sarokar

केन्द्र की कागजी लफ़्फ़ाजी के प्रकाश में सवाल यह है कि विकल्पों के चुनाव का अधिकार क्या सच में गाँवों के हाथ में होगा? या, विकल्पों के निर्धारण के विकल्प पर शासन-प्रशासन के गिनती के पूर्वाग्रहित कर्ता-धर्ताओं का स्वत्वाधिकार होगा? गाँवों की जीवन शैली मूलत: कृषि-प्रधान है, आदर्श ग्राम योजना क्या इसे संरक्षित रख पायेगी?

‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ को आरम्भ हुए तीन महीनों की अवधि पूरी हो चुकी है और इसलिए योजना की नब्ज को टटोलने का समय आ चुका है। योजना के आरम्भ किये जाने की औपचारिक घोषणा के दो महीने पूरे कर लेने पर योजना पर उठाये अपने पहले सवाल (आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : १) में मैंने लिखा था कि सांसद की भावना’ योजना के भविष्य का सबसे प्रबल पक्ष है। अपने इसी आलेख में मैंने यह भी लिखा था कि सारा खेल सांसद की इच्छा-शक्ति में निहित है। अपने इन सोच पर मैं आज भी अटल हूँ कि योजना को स्वीकारने वाले प्रत्येक सांसद की नीयत की, और योजना के अपने प्रस्तावित स्वरूप को जमीन पर उतार पाने की उसकी क्षमता की भी, नियमित समीक्षा होती रहेगी। क्योंकि, यदि किसी सांसद ने गोद लेने के लिए चुने अपने ग्राम के लिए ठोक-बजा कर, तथा पूरी सद्‌-नीयत से भी, कोई प्रस्ताव रखा है तो उसे अस्वीकार करना, तथा उसमें असहयोग करना भी, मोदी की सरकार के लिए भारी पड़ेगा।

अपने उसी पहले सवाल में मैंने यह भी लिखा था कि योजना के ‘सदाशय’ पर पूरा भरोसा कर भी लिया जाये, तब भी यह यक्ष-प्रश्न तो अनुत्तरित ही रहता है कि मोदी की इस योजना में ‘ग्राम’, और वह भी, ‘आदर्श ग्राम’ जैसा कोई तत्व आखिर कहाँ है? मेरा मानना है कि मोदी सरकार की ताजी योजना और उसकी सफलता-असफलता की ईमान-दार समीक्षा इसी धुरी पर केन्द्रित होगी। जाहिर है, आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल का मेरा दूसरा पहलू मोदी सरकार की नीयत में निहित है। लेकिन सरकार की नीयत की किसी प्रकार की कोई समीक्षा करने से पहले योजना के सरकारी ‘पोस्टर’ पर एक नजर डाल लेना ठीक रहेगा।

इस दृष्टि से महत्व की पहली बात यह है कि आदर्श ग्राम योजना के लिए दिशा-निर्देश जारी करते हुए ११ अक्टूबर २०१४ के अपने सन्देश में प्रधान मन्त्री ने कहा था —

“…इस योजना का उद्देश्य गाँवों को अपने विकल्पों का चुनाव करने के योग्य बनाना और उन्हें इन विकल्पों के चयन का अवसर देना है। इस योजना से दिशा मिलेगी और मुझे विश्वास है कि हमारे स्थानीय गाँववासी अपनी मेहनत और उद्यमी कौलों से अपना पथ प्रस्त करेंगे।”

और, दूसरी बात यह कि योजना के लिए केन्द्र सरकार की ओर से जारी की गयी आरम्भिक प्रचार-सामग्री से पहली नजर में दिख जाता है कि मोदी ने गांधी और जेपी की खूबसूरत आड़ ली है। आदर्श ग्राम योजना के लिए दिशा-निर्देश के रूप में जारी हुई पुस्तिका में हरिजन में प्रकाशित गांधी के अनेक कथनों को उद्धरित भी किया गया है। इनमें ७ जुलाई १९३६ के अंक से लिया गया निम्न अंश योजना के सन्दर्भ में बड़े महत्व का है —

“प्रत्येक देश-भक्त के समक्ष यह चुनौती होगी कि भारत के गाँवों का ऐसा पुनर्निर्माण किस प्रकार किया जाये कि कोई भी व्यक्ति उनमें भी उतनी ही आसानी से रह सके, जैसे कि शहरों में रहा जाता है।”

यद्यपि अपने इस प्रयास में जेपी अर्थात्‌ जय प्रकाश नारायण को तो वे ठीक से भुना नहीं पाये लेकिन अपने वैचारिक पोस्टरों में उन्होंने गांधी के सोच की पाई-पाई का दोहन करने का जी-तोड़ प्रयास अवश्य किया है। और, सारा खतरा इसी असीमित दोहन में है क्योंकि इससे कुतर्कों की एक अनन्त श्रृंखला कभी भी आरम्भ हो सकती है। वह इसलिए कि दोहन, वह भी असीमित, किसी भी दार्शनिक सोच के व्यवहारिक पालन की तुलना में उसके नाम पर किये जाने वाले भावनात्मक शोषण के ज्यादा समीप होता है। आदर्श ग्राम योजना को स्वीकारने वाले सांसदों के लिए लक्ष्य के रूप में केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित किया गया निम्न सूत्र-वाक्य इसी खतरे की ओर संकेत करता है —

“सांसद आदर्श ग्राम योजना का लक्ष्य मौजूदा सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए महात्मा गांधी के इस व्यापक और ऑर्गेनिक विजन को सार्थक बनाना है।”

दरअसल, उसकी आत्मा पर ‘मौजूदा सन्दर्भ’ का भरमाने वाला मुलम्मा चढ़ा कर नेहरू पहले ही गांधी के सोच को रसातल की पर्याप्त गहरायी तक ढकेल चुके थे। और, लगता है कि बची-खुची कसर को मोदी जल्दी पूरा कर देंगे।

गांधी के सोच को किसी भी पूर्वाग्रह से ऊपर उठ कर समझने का प्रयास करें तो दिख जाता है कि वह ग्राम्य स्वाबलम्बन के लिए जूझते रहे। यह स्वाबलम्बन देश के भीतर छोटी-छोटी सम्प्रभु सत्ताएँ नहीं खड़ी करता है। इसके उलट, यह ऐसे परस्पर वैयक्तिक व क्षेत्रीय आदान-प्रदान या कहें कि लोकाचारी व्यवसाय की पैरवी करता है जिसमें एक भी पक्ष अथवा घटक विवश या फिर बेचारा-दयनीय नहीं हो। यह एक ऐसा अनोखा समाज-दर्शन है जो ग्रामीण समाज को शहरी शोषण से तो संरक्षित करता ही है, उसकी ही अनेकानेक छोटी-छोटी, किन्तु स्वाबलम्बी, इकाइयों को भी अपनी ऐसी ही पड़ोसी इकाइयों की प्राकृतिक कमियों की भर-पायी नि:स्वार्थी भाव से करने को प्रेरित करता है। एक-दूसरे की पहुँच के स्वाभाविक दायरे में रहने वाली सभी आदर्श ग्रामीण इकाइयाँ परस्पर पूरक होने का दायित्व ब-खूबी निभाती हैं। वह भी, किसी भी अर्थ में अपनी किसी प्रभुता का कोई बोध कराये बिना।

“ग्राम स्वराज के बारे में मेरी राय यह है कि गाँव अपने आप में पूर्ण गण-राज्य हो, अपनी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के लिए अपने पड़ोसी गाँवों पर निर्भर न हो परन्‍तु कई अन्य ऐसी जरूरतों की पूर्ति के लिए उन गाँवों पर निर्भर हो, जिनके लिए निर्भर होना आवश्यक हो। अतः प्रत्येक गाँव का पहला सरोकार स्वयं अपने लिए अनाज और कपड़ों हेतु कपास की फसलें उगाना होना चाहिए। गाँव में मवेशियों के लिए चरागाह, वयस्कों और बच्चों के लिए मनोरंजन की सुविधाएँ और खेल के मैदान होने चाहिए। इसके बाद भी यदि और जमीन उपलब्ध हो तो गाँव में गाँजा, तम्‍बाकू, अफीम जैसी फसलों को छोड़ कर अन्य नकदी फसलें उगाई जायेंगी। गाँव के पास अपना थियेटर, स्कूल और सार्वजनिक हॉल होगा। स्वच्छ जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए गाँव की अपनी व्यवस्था होगी। यह कार्य नियन्‍त्रित कुओं या तालाबों से किया जा सकता है। अन्‍तिम आधार-भूत पाठ्य-क्रम के स्तर तक शिक्षा अनिवार्य होगी। यथा-सम्‍भव प्रत्येक कार्य-कलाप सहकारिता के आधार पर चलाया जाएगा। आज की तरह अस्पृश्यता के श्रेणी-क्रम वाली कोई जाति प्रथा नहीं होगी।’’ (हरिजन, २६ जुलाई १९४२, वॉल्यूम ७६, पृष्ठ ३०८-०९)

“आदर्श भारतीय गाँव इस प्रकार बना होगा … उसके आस-पास पाँच मील की परिधि में उपलब्ध सामग्री से बने कुटीरों में पर्याप्त रोशनी और हवा की आवाजाही की व्यवस्था होगी … गाँव के रास्तों और गलियों में कोई धूल-मिट्टी नहीं होगी। गाँव में आवश्यकतानुसार कुएँ होंगे और उनका जल सभी को उपलब्ध होगा। गाँव में सभी के लिए प्रार्थना-स्थल होगा। सार्वजनिक बैठक स्थल, पशुओं के लिए सार्वजनिक चरागाह, सहकारी डेयरी, प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल होंगे जिनमें औद्योगिक शिक्षा मुख्य घटक होगी और इस गाँव में विवादों के समाधान के लिए पंचायतें होंगी। गाँव के लिए खाद्यान्न, सब्जियों और फलों तथा खादी का उत्पादन भी गाँव में ही होगा। मोटे तौर पर आदर्श गाँव का मेरा विचार तो यही है।” (हरिजन, ९ जनवरी १९३७, वॉल्यूम ६४, पृष्ठ २१७-१८)

“उसी गाँव को बेहतर गाँव माना जाए … जहाँ यथा-सम्‍भव सबसे ज्यादा ग्रामोद्योग पनप रहे हों, जिसमें कोई व्यक्ति निरक्षर न हो, जहाँ सड़कें साफ-सुथरी हों, जहाँ मल-त्याग के लिए नियत स्थान हों, कुएँ साफ-सुथरे हों, विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्द हो और अस्पृश्यता की कुरीति पूर्णतः समाप्त हो गई हो, जहाँ सभी को सन्‍तुलित मात्रा में गाय का दूध, घी इत्यादि मिल रहा हो, जहाँ कोई भी व्यक्ति बे-रोजगार न हो और जहाँ कोई लड़ाई-झगड़े व चोरी की घटनाएँ बिल्कुल न होती हों।” (मुन्नालाल शाह को पत्र; हरिजन, ४ अप्रैल १९४१, वॉल्यूम ७३, पृष्ठ ४२१)

गांधी के सोच के यह उद्धरण उनके ग्राम्य-दर्शन की बानगी भर हैं। और, अपनी आदर्श ग्राम योजना के कागजों में मोदी सरकार ने इन्हें पर्याप्त स्थान भी दिया है। लेकिन, इसकी परख होना अभी शेष है कि गांधी-विचार से उक्त अंश गांधी के सोच को भारत भूमि पर व्यवहार में उतारने की ईमान-दार नीयत से प्रेरित हो कर उद्धरित किये गये हैं या फिर गांधी से अपने-आप को जुड़ा हुआ दिखाने की मोदी की किसी राजनैतिक रण-नीति से। इस भ्रम को स्वयं मोदी ने ही जमीन दी है। आदर्श ग्राम योजना को आरम्भ करने की घोषणा करते हुए मोदी ने ११ अक्टूबर २०१४ को दिल्ली के विज्ञान भवन में जो लम्बा भाषण दिया था उसका निम्न अंश गांधी के बारे में मोदी को पढ़ाये गये बचकाने पाठ को स्वयं उजागर कर देता है —

“महात्मा गांधी के जीवन में गाँव का जिक्र हर बात में आता है। गांधी जी १९१५ में विदेश से वापस आये। दो साल के भीतर-भीतर उन्होंने जो कुछ भी अध्ययन किया, वही बिहार के चम्पारन में जा कर के गाँव के लोगों के अधिकार के लिए लड़ना शुरू कर दिया।”

गांधी १० अप्रैल १९१७ के दिन पहली बार बिहार के चम्पारन पहुँचे थे। वहाँ जा कर उन्होंने पाया कि निलहे फिरंगी अकाल की सी स्थितियों में रह रहे स्थानीय ग्रामीणों को खाद्यान्न के स्थान पर नील की खेती के लिए तो विवश कर ही रहे हैं, उपज को नाम-मात्र की कीमत पर सीधे उन्हें ही बेचने को भी मजबूर कर रहे हैं। यही नहीं, देश की मिल्कियत सम्हाले बैठे फिरंगियों द्वारा उन पर भारी-भरकम टैक्स भी थोपा जा रहा है। तब गांधी ने इस शोषण के विरोध में, अपने आप में अनोखा, पहला विशुद्ध अहिंसक आन्दोलन आरम्भ किया। यह सच है कि वह गाँव के लोगों के अधिकार की लड़ाई थी। लेकिन, यथार्थ में यह दक्षिण अफ्रीका में उनके द्वारा किये गये अनुभव का निचोड़ था जिसने उन्हें आन्दोलित किया था। यह दक्षिण अफ्रीका में अनुभव किये गये नस्ल-विरोधी अपमान का, तब भारतीय धरती पर पल्लवित हो रहा, शोषण पक्ष था जिससे मुक्ति के लिए चम्पारन आन्दोलन की नींव डाली थी गांधी ने। आज के आन्दोलन-कारियों की बोली में बोलें तो, ‘अभी तो यह अँगड़ाई है, आगे और लड़ाई है’ वाले लहजे में। और, चम्पारन का वह आन्दोलन शहर तथा गाँव के किसी भी प्रत्यक्ष-परोक्ष भेद से सर्वथा दूर था।

पूर्वाग्रह से ऊपर उठने को तैयार हो तो कोई भी देख सकता है कि चम्पारन, यथार्थ में, अधिकार-सम्पन्न विदेशी व्यवसाइयों द्वारा अधिकारों से वंचित किये गये देशज नागरिकों के असीमित आर्थिक शोषण से मुक्ति का प्रतीक है। जबकि, ‘विकास’ के सपनों की आड़ में भारतीय गाँवों को अध-कचरे से शहरों में बदलने की सत्ता के देशी मठाधीशों की हठ-धर्मी ऐसी विशुद्ध व्यावसायिकता से हट कर और कुछ भी नहीं है जो देश को, एक बार फिर से, इसके सर्वथा उल्टी दिशा में ही ले जायेगी। अपने किस्म के किसी नये चम्पारन को गढ़ने।

योजना के ‘आदर्श’ को ले कर केन्द्र सरकार द्वारा की गयी कागजी लफ़्फ़ाजी के प्रकाश में सवाल यह है कि केन्द्र की आदर्श ग्राम योजना का मूल्यांकन किन पैमानों पर होगा? सवाल यह भी है कि अपने लिए विकल्पों के चुनाव का अधिकार क्या सच में गाँवों के हाथ में होगा या, विकल्पों के निर्धारण के विकल्प पर शासन-प्रशासन के गिनती के, पूर्वाग्रहित, कर्ता-धर्ताओं का स्वत्वाधिकार होगा? गाँवों की जीवन शैली मूलत: कृषि-प्रधान है, आदर्श ग्राम योजना क्या इसे संरक्षित रख पायेगी? क्या भूमि अधिग्रहण बिल योजना के इस आदर्श पक्ष को सुदृढ़ करेगा या फिर, गाँवों के हितों की बलि चढ़ा कर चम्पारन के ब्रितानी मॉडल को ही नये सिरे से पुनर्जीवित कर देगा?

मोदी की आदर्श ग्राम योजना के ‘आदर्श’ और ‘ग्राम’, दोनों ही, निम्न आधार-भूत तराजू पर नापे-तौले जायेंगे —

१. गाँवों की जीवन शैली मूलत: कृषि-प्रधान है। आदर्श ग्राम योजना क्या इसे संरक्षित रख पायेगी?;

२. पानी यद्यपि शहरी और ग्रामीण दोनों ही श्रेणी के नागरिकों के जीवन का बड़ा महत्व-पूर्ण तत्व है फिर भी पानी की भूमिका दोनों श्रेणियों में समान धरातल पर स्थित नहीं है। कृषि-प्रधान ग्रामीण क्षेत्रों के लिए पानी नहाने-धोने-पीने से आगे जीवन और जीवन-यापन के अनेक बहुआयामी पक्षों का आधार-भूत तत्व है। आदर्श ग्राम योजना क्या गाँवों में पानी के सर्वोत्तम संग्रहण को सुनिश्चित कर पायेगी?;

३. उपलब्ध जमीन की गुण-वत्ता गाँवों का यक्ष-प्रश्न बन चुका है। आदर्श ग्राम योजना क्या कृषि-भूमि की बची-खुची गुण-वत्ता का सर्वोत्तम संरक्षण ही नहीं, उसकी क्षय हो चुकी गुण-वत्ता को वापस भी ला पायेगी?;

४. फिरंगियों से स्वतन्त्रता पा लेने के बाद भी शहरी और ग्रामीण आबादी के बीच जीवन-गुणवत्ता (जीवन-शैली नहीं) की खाई बढ़ती ही जा रही है। आदर्श ग्राम योजना क्या शहरी और ग्रामीण आबादी के बीच लगातार बढ़ रही इस खाई के पाटे जाने को सुनिश्चित कर पायेगी?;

५. जीवन और जीवन-यापन के प्रत्येक ग्रामीण पक्ष में रासायनिक उर्वरकों से ले कर रासायनिक कीट-नाशकों तक के अतिरेक-भरे उत्तरोत्तर प्रयोग भारतीय गाँवों को अबाध रूप से अभिशप्त कर रहे हैं। आदर्श ग्राम योजना क्या गाँवों में कृत्रिम रासायनिक संसाधनों के स्थान पर ऐसे स्थानीय प्रकृति-प्रधान संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा दे पायेगी जो स्वच्छता के स्तर को तो बढ़ाते ही हों, शुद्ध व स्वस्थ पर्यावरण तथा बेहतर स्वास्थ्य को भी सुनिश्चित करते हों?;

६. ग्रामीण आबादी में शहरों की ओर पलायन की प्रवृत्ति निरन्तर रूप से बढ़ रही है। ग्रामीणों का यह पलायन कृषि-कार्यों को ही शहरों में करने की नीयत से प्रेरित नहीं है। आदर्श ग्राम योजना क्या कृषकों और कृषि-श्रमिकों के बीच निरन्तर बढ़ रही इस दुर्भाग्य-जनक प्रवृत्ति पर सार्थक और प्रभावी रोक लगा पायेगी?;

७. ‘विकास’ जैसे भारी-भरकम जुमले की आड़ में भारतीय गाँव अपनी आधार-भूत पारम्परिक तथा व्यावसायिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शहरी व्यापारिक-तन्त्र पर मोहताज बनाये जा रहे हैं। आदर्श ग्राम योजना क्या, योजना-बद्ध रूप से लगातार बढ़ायी जा रही निर्भरता के, इस चंगुल से ग्रामीण आबादी की मुक्ति की कोई सार्थक पहल जमीन पर उतार पायेगी?;

८. आदर्श ग्राम योजना क्या स्थानीय प्राकृतिक स्रोतों-संसाधनों पर ग्रामीणों और स्थानीय ग्राम-पंचायतों के स्थान पर शहरी सोच रखने वाली शक्तियों और संस्थाओं को एकाधिकार सौंप देने वाली नीतियों की बिना शर्त तत्काल समाप्ति कर पायेगी?;

९. बढ़ती शहरी आबादी और उसकी बढ़ती ही जा रही आवश्यकताओं की भर-पायी के लिए कृषि-भूमि के असीमित व अनियन्त्रित दोहन की प्रवृत्तियाँ शहरी ही नहीं ग्रामीण आबादी में भी लगातार बढ़ रही हैं। आदर्श ग्राम योजना क्या (शहरी संस्कृति के प्रभाव में) उसे पुष्ट और पोषित बनाये रखने के अपने नैसर्गिक दायित्व से मुँह मोड़ते हुए, कुछ भी वापस सौंपे बिना, स्थानीय भूमि के असीमित व अनियन्त्रित दोहन की ग्रामीण आबादी में बढ़ रही प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लगाने की सार्थक पहल को जमीन पर उतार पायेगी?;

१०. आदर्श ग्राम योजना क्या धरती के ऊपर के प्रकृति-प्रदत्त प्रत्येक ऊर्जा-स्रोत के ऐसे दोहन को यथा-सम्भव बढ़ावा दे पायेगी जिससे ग्रामीण आबादी की भौतिक आवश्यकताएँ तो पूरी होती ही हों, ग्राम्य-क्षेत्र की धरती की अपनी समृद्धता में भी सकारात्मक वृद्धि हो।

(२१ जनवरी २०१५)