आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : ३

Sarokar

कुल मिला कर दो प्रकार के शोर गूँज रहे हैं। पहला औसत उथली समझ के व्यक्तियों के लिए है जबकि दूसरा तनिक ज्यादा बौद्धिक बहस-बाजों को समर्पित। किन्तु, विरोध के इन दोनों ही शोरों में एक दुर्भाग्य-जनक समानता है — दोनों ही कृषि-भूमि के अधिग्रहण के विरोधी नहीं हैं। सारा विरोध या तो वाजिब शर्तों के या फिर वाजिब दामों के निर्धारण पर सिमटा हुआ है।

‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ पर उठाये अपने दूसरे सवाल (आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : २) में सत्ता के देशी मठाधीशों की हठ-धर्मी के उल्लेख के साथ मैंने लिखा था कि ‘विकास’ के सपनों की आड़ में भारतीय गाँवों को अध-कचरे से शहरों में बदलने की विशुद्ध व्यावसायिकता देश को, एक बार फिर से, अपने किस्म के किसी नये चम्पारन को गढ़ने की सर्वथा उल्टी दिशा में ले जायेगी। इसी आलेख में मैंने भारतीय गाँवों के हितों से जुड़े उन १० आधार-भूत तत्वों का भी उल्लेख किया था जिनसे किसी भी प्रकार का कोई समझौता करना ‘देशज आदर्श’ और ‘ग्राम्य हित’ की बलि चढ़ाने के सम-कक्ष होगा।

इस बिन्दु पर यह स्पष्टीकरण भी आवश्यक है कि सत्ता-धीशों की हठ-धर्मिता इस निकृष्ट-तम्‌ सामाजिक अपराध की गाड़ी का एक केवल एक पहिया है। जबकि त्वरित लाभ के असंयमित लोभ की भँवर में फँस कर लगातार दूषित होती जा रही ग्रामीण अंचल की मानसिकता राष्ट्र-घाती इस गाड़ी का दूसरा पहिया बनने बड़ी बे-करारी से आतुर है। और दुर्भाग्य से, तथा-कथित चिन्तकों के बीच आज के दिन कोई बहस यदि बच रही है तो वह केवल इतने पर ही सिमट चुकी है कि किसके हित प्रबल या कि प्राथमिक हों — किसानों के या नीति-निर्धारकों के? भाषाई शब्द-जाल में ‘जल, जंगल और जमीन’ का एक नया मुहावरा जुड़ गया है जो केवल और केवल ‘व्यक्ति’ केन्द्रित है। यों, स्वयं को मानव-हितैषी ठहराने वाली कतिपय ताकतें इसे ‘फिरका’ केन्द्रित करने के प्रयास भी करती रहती हैं किन्तु ‘राष्ट्र’ नामक सर्वथा जीवन्त तत्व की प्रमुखता तो दूर, इसकी नाम-लेवा गुंजाइश तक उनके बुने इस शब्द-जाल में नहीं छोड़ी गयी है।

चाहता तो यह था कि गाँव, ग्राम्य जीवन और विकृत होते जा रहे ग्रामीण परिवेश से जुड़े अपने सवालों पहले को पहले उठाऊँ। किन्तु क्योंकि बजट-सत्र की राजनैतिक आपा-धापी ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, २०१४ पर उठाये जाने वाले सवालों के शोर को प्राथमिकता दे दी है, सांसद आदर्श ग्राम योजना के परिप्रेक्ष्य में मेरा तीसरा सवाल इस अध्यादेश से जुड़े पहलुओं पर केन्द्रित है।

अध्यादेश के विरोध में कुल मिला कर दो प्रकार के शोर गूँज रहे हैं। पहला प्रकार औसत उथली समझ के व्यक्तियों को प्रभावित करने के लिए है जो कहता है कि भाजपा के प्रधान मन्त्री ने, भाजपा के ही भारी दबाव के प्रभाव में, यूपीए सरकार से पारित करवाये भूमि अधिग्रहण अधिनियम, २०१३ के सारे लाभ अब किसानों से छीन लिये हैं। जबकि, दूसरा प्रकार तनिक ज्यादा बौद्धिक बहस-बाजों को समर्पित है। इस प्रकार के शोर-गुल का दावा है कि २०१४ के अध्यादेश ने भूमि अधिग्रहण के १८९४ में प्रभावी हुए ब्रितानी तानाशाही स्वरूप को भी मात दे दी है। पूरी गम्भीरता से पड़ताल करने पर विरोध के दोनों ही शोरों में एक दुर्भाग्य-जनक समानता दिख जाती है — दोनों में से कोई भी कृषि-भूमि के अधिग्रहण का विरोधी नहीं है। सारा विरोध या तो वाजिब शर्तों के या फिर वाजिब दामों के निर्धारण तक सिमटा हुआ है। १८९४ से चल रहे भूमि अधिग्रहण अधिनियम के विरोध में उठे निकट अतीत के लगभग सभी आन्दोलन भी, फिर चाहे वे पश्चिम बंगाल के नन्दीग्राम अथवा सिंगूर के रहे हों या उत्तर प्रदेश के भट्टा पारसौल के या फिर उड़ीसा के खनन-क्षेत्रों के अथवा महाराष्ट्र की कृषि-उद्यानिकी की भूमि के; वाजिब शर्तों और वाजिब दामों की माँग करती इन्हीं दो धुरियों के चौगिर्द घूमे थे।

महाभारत काल की एक किंवदन्ती अनायास ध्यान में आ रही है। कहते हैं कि वन-वास के अन्तिम दौर के आने तक जब अर्जुन मानसिक रूप से त्रस्त हो गया तब उसने कृष्ण से पूछा, “सारी समस्याएँ केवल पाण्डवों को ही क्यों पीड़ित कर रही हैं, जबकि दुश्चलन के भण्डार बन चुके कौरव मजे लूट रहे हैं?” कृष्ण ने मुस्कुरा कर कहा कि समय आने पर इसका उत्तर वे अवश्य देंगे। बात आयी-गयी हो गयी। फिर एक दिन भोजन बनाने से पहले द्रौपदी ने अर्जुन से चूल्हा बनाने के लिए तीन पत्थरों की माँग की। अर्जुन गया और कहीं से तीन पत्थर ले आया। भोजन करते समय कृष्ण ने अर्जुन से प्रश्न किया कि वह वे तीन पत्थर कहाँ से लाया था। अर्जुन ने सहज भाव से सामने इंगित करते हुए बतलाया कि उसने वे वहाँ से उखाड़े थे। “लेकिन वहाँ तो दो भवन दिखलायी दे रहे हैं, तुमने किससे ये पत्थर उखाड़े?” कृष्ण ने प्रश्न किया। अर्जुन ने बतलाया कि उनमें से जो टूटी हुई सी इमारत दिख रही है, वह उसी से वे पत्थर उखाड़ कर लाया था। “क्यों?, दूसरी से क्यों नहीं?” कृष्ण ने पलट कर प्रश्न किया। अर्जुन ने मुस्कुरा कर समझाया कि कैसे एक मजबूत भवन की तुलना में किसी खण्डहर से पत्थर उखाड़ पाना आसान होता है। मुस्कुराने की बारी अब कृष्ण की थी। उन्होंने कहा, “तुम्हारे उस दिन के प्रश्न का मेरा यही जवाब है — परिस्थितियों के फेर में कमजोर और निरीह से हो चुके को ही उखाड़ा जाता है क्योंकि इन्हें उखाड़ पाना सुविधा-जनक होता है।”

दरअसल, सरकारी सोच में भारतीय गाँव भी निरीह से हो कर रह गये हैं। ‘गरीब की लुगाई, सबकी भौजाई’ वाले भाव में। जिस किसी को भी कुछ हासिल करना होता है, गाँवों से छीन कर हासिल करता है। शहर से छीन लेने की औकात किसी में भी नहीं है। वैसे भी, शहर से छीन कर शहर ही तो बनेगा। और हाँ, ऐसा करने से शहर कभी बढ़ेगा भी नहीं। जबकि, सारे प्रयास सदा से ही, शहर को बढ़ाने की दिशा में अग्रसर होते रहे हैं। इसके उलट, शहर से छीन कर गाँव खड़ा कर देना देश के सामाजिक, राजनैतिक अथवा प्रशासनिक शब्द-कोषों में कभी रहा ही नहीं।

भूमि अधिग्रहण का ताजा अध्यादेश राजनैतिक-प्रशासनिक तन्त्र की इसी मानसिकता का अगला कदम है। और इस दृष्टि से, यूपीए काल में संसद्‌ में पारित हुए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, २०१३ की चर्चा लगभग बेमानी हो जाती है। सिवाय इस उल्लेख के कि कांग्रेस द्वारा प्रस्तावित स्वरूप में तब भाजपा ने जितनी आपत्तियाँ दर्ज करवायी थीं, २०१४ के अध्यादेश क्र० ९ में उन सभी को उसने अपनी ही पहल से निरस्त कर दिया है। वहीं, सारी चर्चा का स्तर यह है कि कृषि-भूमि के अधिग्रहण को ले कर बनने वाले कानून की समीक्षा में तराजू के एक पलड़े पर १८९४ में फिरंगियों द्वारा लागू किये गये अधिनियम को रखा जा रहा है तो दूसरे पलड़े पर २०१४ के एनडीए द्वारा प्रभावी किये गये ताजे अध्यादेश क्र० ९ को। ‘कृषि-भूमि का अधिग्रहण आखिर किया ही क्यों जाये?’ जैसे आधार-भूत सवाल को तो छूने से भी परहेज किया जा रहा है। जबकि, भारतीय ग्रामों का अस्तित्व इस एक सवाल की प्रदक्षिणा करने को मोहताज है।

अपने उपनिवेश के लिए १८९४ का कानून बनाना और भारत में उसे लागू कराना तत्कालीन ब्रितानी शासकों की प्राथमिकता थी क्योंकि ऐसा करके ही वे भारतीय भूमि पर अपना सर्वाधिकार सुरक्षित कर सकते थे। और इसीलिए, उनकी सबसे कड़ी शर्त यह थी कि न तो अधिग्रहित भूमि का वह प्रयोजन बदला जा सकेगा जिसके लिए उसे अधिग्रहित किया गया था और ना ही भू-स्वामित्व का अधिकार अधिग्रहित भूमि के उपयोग-कर्ता के पक्ष में स्थानान्तरित होगा। सरल शब्दों में, ब्रितानी शासकों ने अपनी आवश्यकता अथवा प्राथमिकता के अनुसार जिस भूमि के लिए जो गति-विधि निर्धारित कर दी वहाँ केवल वही गति-विधि हो सकती थी। अधिग्रहित भूमि का उपयोग-कर्ता, जो प्रकारान्तर से महज किराये-दार की हैसियत रखता था, न तो भू-उपयोग बदल सकता था और ना ही इस भूमि के अधिकार किसी अन्य को हस्तान्तरित कर सकता था। तत्कालीन सन्दर्भ में विचार करें तो यह गुलामों के भू-स्वामित्व को सर्व-शक्तिमान राजा में समाहित करने की ब्रितानियों की खुली नीति थी। १८९४ का भूमि अधिग्रहण अधिनियम, दरअसल, भारतीय भूमि की मिल्कियत ब्रितानी शासकों द्वारा हथिया लेने का चतुर कानून था

इसके उलट, २०१४ का अध्यादेश क्र० ९ भारतीय मिल्किययत की भूमि को बहुराष्ट्रीय व्यवसाइयों को हस्तान्तरित करने की नीयत से जारी हुआ दिखता है। अध्यादेश के माध्यम से भूमि अधिग्रहण के इस अत्यन्त विवादास्पद कानून को लागू करने की एनडीए की विवशता पर जेटली की यह दलील इस नीयत को पुष्ट करती है कि २०१३ के भूमि अधिग्रहण कानून को ३१ दिसम्बर २०१४ से पहले संसद्‌ की स्वीकृति लेनी थी अन्यथा इसके अनेक प्रावधान पहले से लागू अन्य १६ कानूनों पर प्रभावी नहीं हो सकते थे। संक्षेप में समझें तो इसका सरल सा तात्पर्य केवल यह है कि अतीत में अधिग्रहित भूमि के आबण्टन-हितग्राहियों ने आबण्टित भूमि को हथिया लेने के बाद आबण्टन की प्राथमिक शर्तों की जो खुली अवहेलना की हुई थी, हड़-बड़ी का यह सारा आयोजन उन्हें उसके वैधानिक खामियाजों से मुक्ति दिलाने का ही खुला प्रयास है। सरल शब्दों में, निरीह भू-स्वामियों से उनकी जमीनें छीन कर सबल धन-पतियों को बिना शर्त सौंप देने की बड़ी स्पष्ट राजनैतिक-प्रशासनिक जुगत है यह।

वर्तमान सरकार कह रही है कि यदि यह अध्यादेश नहीं लाया जाता तो निवेश-कर्ता भारत में पूँजी के निवेश को उत्सुक नहीं होते। इसी से एक उत्सुकता पनपती है कि कहीं मिट्टी के मोल आबण्टन में मिलने वाली अधिग्रहित भूमि की कालान्तर में मिलने वाली अकूत कीमत का लोभ ही तो निवेशक को आकृष्ट नहीं करता है? दूसरे शब्दों में, जिस भूमि की मिल्कियत हासिल करने के लिए भू-मालिक को सोने की गिन्नियों में भुगतान करना होता उसे ‘अधिग्रहण’ के नाम पर तांबे के चन्द सिक्कों में हथियाने की देशी-विदेशी पूँजी-निवेशकों की योजना का दूसरा नाम बन गया है भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, २०१४।

सारे के सारे षडयन्त्र-कारी घाल-मेल को इस तरह से समझा जा सकता है कि १८९४ के ब्रितानी अधिनियम में अधिग्रहण के दो बड़े स्पष्ट विभाजन थे — सार्वजनिक और निजी उपयोग। दोनों के लिए अधिग्रहण के अलग-अलग प्रावधान थे और इनकी शर्तें भी अलग-अलग निर्धारित थीं। इसमें भू-मालिक को दिया जाने वाला मुआवजा अवश्य मिट्टी-मोल रहा किन्तु, मोटे रूप से, सार्वजनिक हित ही तब भू-अधिग्रहण का मुख्य कारक था। २०१३ के नये अधिनियम में भू-मालिक को बेहतर मुआवजों का प्रावधान किया गया। इसमें यह ध्यान भी रखा गया कि यदि  भूमि सार्वजनिक प्रयोजन के स्थान पर किसी निजी प्रयोजन के लिए अधिग्रहित की जा रही हो तो भू-स्वामी को उसके मुआवजे की राशि पर्याप्त बेहतर मिले। किन्तु, २०१४ के अध्यादेश क्र० ९ में ‘सार्वजनिक’ और ‘निजी’ प्रयोजनों की इस चौड़ी खाई को बड़ी सफ़ाई से पाट दिया गया है। बल्कि, ‘सार्वजनिक’ के ऊपर ‘निजी’ प्रयोजन को एक मौन प्राथमिकता सी भी दे दी गयी है। अब आबण्टन-हितग्राही अधिग्रहित भूमि का निर्द्वन्द्व मालिक हो जायेगा और इस तरह से इस भूमि की मिल्कियत का सौदा भी जिससे चाहे उससे कर सकेगा।

इसी बिन्दु पर भूमि-अधिग्रहण के सरकार के अधिकार के औचित्य पर प्रश्न खड़ा किया जाना चाहिए। फिरंगियों ने भारत-भूमि का मन-चाहा अधिग्रहण किया क्योंकि वे प्राकृतिक रूप से यहाँ के भू-स्वामी नहीं थे। फिर, सत्ता के विस्तार और उस पर अपनी पकड़ की मजबूती के लिए भी उन्हें ऐसे कानून का सहारा चाहिए था जिसकी सहायता से वे गुलाम देश में अपनी मन-चाही अधो-रचना का विकास कर सकें। एक बात और, तब ‘शहर’ नाम का भू-विस्तार अत्यन्त सीमित ही था। जो कुछ भी था उसका अधिकांश गाँव और जंगल ही था। किन्तु, अब परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन आ गया है। अधिकांश जंगल केवल सरकारी फाइलों में बच रहे हैं। गाँवों के बारे में भी कोई यह दावा ईमान-दारी से नहीं कर पायेगा कि वे कब तक बचे रहेंगे?

भूमि के अधिग्रहण की अभी तक की तथा-कथा का संक्षेप यह है कि भूमि-अधिग्रहण की सारी अन्धाधुन्ध गति-विधियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में ही केन्द्रित हुई है। वह भी, मुख्य रूप से उपजाऊ कृषि-भूमि के अधिग्रहण की। ऐसे में भूमि का ऐसा सारा अधिग्रहण, जो नि:सन्देह शहरी आवश्यकताओं की पूर्ति-केन्द्रित है, अब केवल कृषि-भूमि पर क्यों किया जाये? विशुद्ध शहरी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होने वाले भविष्य के किसी भी अधिग्रहण को अनिवार्य रूप से गाँवों से बाहर धकेलना होगा। इतना ही नहीं, कृषि-भूमि के उपयोग में परिवर्तन की स्वीकृति देने से भी कठोर परहेज करना होगा। ऐसा नहीं किये जाने पर भूमि के अधिग्रहण के सबसे ताजे प्रावधान सांसद आदर्श ग्राम योजना की सारी सम्भावनाओं को स्वयं ग्रामों के अस्तित्व को मिटा देने की दिशा में झौंक देंगे। और ग्रामीण-जन निरीह-बेचारे बने एक-दूसरे के मुँह ताकते मिलेंगे।

(१९ फरवरी २०१५)