‘आप’ का सबसे बड़ा सबक

Sarokar

आन्दोलन में सामाजिक सोच चाहे जितना भी गहरा हो, इस सोच को राजनीति के साँचे में कतई नहीं ढाला जा सकता है। आन्दोलन राजनीति के भटकाव को नियन्त्रित करने वाली जन-धारा है। ऐसी आदर्श स्थिति में किसी जन-आन्दोलन का सत्ता में विलोप कैसे किया जा सकता है? भले ही वह उसी के कारण अस्तित्व में आयी हो।

आम आदमी पार्टी के भीतर का घटना-चक्र बीते दिनों इतनी तेजी से और इतनी ज्यादा धुरियों पर घूम चुका है कि इन दिनों वह एक राजनैतिक दल मात्र नहीं रह गयी है, आम चर्चा का बड़ा मुद्दा भी बन गयी है। चर्चा मुख्यत: दो स्तरों पर हो रही है।

पहला स्तर उन व्यक्तियों के समूहों का है जो रोजी-रोटी और मौसम-बसेरे की चिन्ताओं के अलावा किसी और बात के लिए मुश्किल से ही समय निकाल पाते हैं। यों, इस स्तर की चर्चाओं में भी कई बार जमीनी सचाई के साथ-साथ उस पर किये गये बड़े तीखे कटाक्ष भी सुनने में आ जाते हैं लेकिन इनके बीच होने वाली चर्चा बड़ी सीमा तक क्षण-भंगुर ही होती है — बहुत कुछ पौ के फटने और सूरज के ढलने की तरह। इन समूहों में उभरने वाली तमाम छवियाँ आनन-फानन में अपने रंग बदल लेती हैं। जाहिर है, इनके बीच होने वाली चर्चा के महत्व को केवल चुनावी माहौल में ही गम्भीरता से नापा-तौला जाता है। और इसीलिए, आज की तारीख में भी आम आदमी पार्टी के बारे में इन समूहों में होने वाली चर्चा को उतनी गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा है।

चर्चा का दूसरा स्तर उन व्यक्तियों के बीच का है जो अपने ‘वैचारिक’ होने का स्वांग भी रचते हैं और एक सीमा तक होते भी हैं। इनके बीच हो रही चर्चाएँ निश्चित रूप से उनके तार्किक होने का आभास देती हैं। यह समूह राजा को रंक और रंक को राजा बनाने लायक माहौल बनाने की क्षमता रखता है। यद्यपि यह भी बड़ी सचाई है कि राजा और रंक की अदल-बदल की सारी जद्दो-जहद में इस दूसरे समूह के व्यक्ति मात्र उत्प्रेरक की ही भूमिका अदा कर पाते हैं; बदलाव के मुख्य घटक तो पहले समूह के सदस्य ही होते हैं। आम आदमी पार्टी की आन्तरिक कलह पर इस दूसरे समूह के मुखर व्यक्ति अपनी-अपनी दृष्टि से प्रति-दिन नयी समीक्षाएँ सामने ला रहे हैं। देश की चिन्ताएँ गिना रहे हैं।

सतही तौर पर देखने यह एक उत्साह-जनक स्थिति है जिसमें देखने, सोचने और समझने के लिए आम नागरिक को बहुत कुछ उपलब्ध कराया जा रहा है। वैकल्पिक राजनीति की आवश्यकता पर नये सिरे से जोर दिया जा रहा है। पहले स्टिंग-ऑपरेशनों के खुलासों की भर-मार और फिर पार्टी की पीएसी तथा एनई बैठकों के नाटकीय संवादों और टीवी-क्लिपिंग्स के बाद बच रही सारी कसर पूर्व में विधायक रह चुके पार्टी के ही राजेश गर्ग के इस खुलासे ने पूरी कर दी कि स्वयं केजरीवाल ने ही अपने विधायकों को जेटली और गडकरी के नाम से झूठे फोन करवा कर कहलवाया था कि वे १० करोड़ में भाजपा के हो जायें। पार्टी के ही एक दूसरे पूर्व विधायक ने दावा ठोक दिया कि सत्ता की लालसा में सब ओर हाथ-पैर मार रहे अरविन्द ने अपनी पार्टी के विधायकों को घर में कैद कर लिया था। ऐसे तमाम उदाहरणों के ढेर पर बैठा कर बतलाया जा रहा है कि कैसे वह ‘महान्‌’ व्यक्ति महज ‘उथला’ राज-नेता साबित हो कर रह गया जिसे वैकल्पिक राजनीति का आज का प्रबल मसीहा मान लिया गया था?

पूछा जा रहा है कि ‘वैकल्पिक राजनीति का विकल्प क्या हो?’ और इसी एक छोटे से सवाल ने केवल आज का ही नहीं, शाश्वत सा यह सवाल खड़ा किया है कि ‘आप’ से निकला सबसे बड़ा सबक क्या है?

उन सारे के सारे ‘विचारकों’ ने, जिन्होंने राजा को रंक और रंक को राजा बनाने की मुहिम के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष प्रणेता होने की पहचान कमा कर रखी है, ‘आप’ से निकले सवालों को अपनी-अपनी तरह से परोसने में जमीन-आसमान एक कर रखा है। वे समझा रहे हैं कि कैसे एक ‘विशेष’ व्यक्ति संयम-धीरज को ताक पर रख कर एकदम ‘आम’ हो चुका नजर आने लगता है! कुछ इसके पीछे उस आदमी के अपने ही ओछे होने की सचाई को साबित करने में जुटे हुए हैं तो कुछ इसके पीछे उन महत्वाकांक्षियों की ओछी हरकतें गिनाने में लगे हैं जो उसकी घेरे-बन्दी किये हुए हैं। संक्षेप में कहें तो, विचारकों की यह पूरी की पूरी भीड़ राजनीति के स्तर में आये स्खलन के कारणों और उनसे बचने के उपायों पर अपने उच्च विचार रही है। किन्तु इनमें से एक भी यह कहता नहीं पाया गया कि, समय-काल के हिसाब से, स्थापित राजनीति का चाहे जो विकल्प खड़ा हो जाता हो, यह विकल्प भी धीरे-धीरे एक नयी वैकल्पिक राजनीति की दरकार रखने लगता है। दरअसल, यही राजनीति है।

मुझे आश्चर्य होता है कि इन बीते कुछ दिनों में मैं ऐसा एक भी ‘विचारक’ को देख, सुन अथवा पढ़ नहीं पाया जो यह समझाने का प्रयास कर रहा हो कि आन्दोलन वैकल्पिक राजनीति के निमित्त चाहे जितने बन जायें, वे अपने आप में राजनीति के पर्याय कभी नहीं हो सकते हैं। राजनीति और आन्दोलन परस्पर विपरीत ध्रुव ही रहेंगे। ऐसे विपरीत ध्रुव जो न तो परस्पर शत्रु हैं और ना ही नैसर्गिक रूप से यथा-सम्भव दूरस्थ। यह दोनों ही ऐसे विपरीत ध्रुव हैं जो अपनी-अपनी दार्शनिक शुद्धता के शिखर पर पहुँच कर परस्पर पूरक तो हो जाते हैं किन्तु एक नहीं होते। दरअसल, इनके बीच का परस्पर विपरीत भाव केवल इस अर्थ में होता है कि आन्दोलन राजनीति के भटकाव को नियन्त्रित करने की जन-अपेक्षा को मरने से बचाये रखने वाली उस धारा का नाम है जो जन-भूमिका के योग-दान से ही पुष्ट और समृद्ध होती है। इसके उलट, राजनीति आन्दोलनों को ललचा-भटका कर उन्हें लील लेने में माहिर उस आचरण की अभिव्यक्ति का दूसरा नाम है जो जन-अपेक्षा को अपनी सबसे निचली प्राथमिकता पर रखती है।

तो, ‘आप’ से निकला सबसे बड़ा सबक क्या है?

औरों के लिए चाहे जो हो, मेरे लिए तो पहला सबक यही है कि ‘आप’ एक प्रयोग था। ऐसा प्रयोग जो अतीत से मिले सबकों के बाद भी दोहराया गया। बीते सबकों से आँखें मूँदे रख कर। और यह दोहराव शुतुरमुर्ग के से भाव में नहीं बल्कि अपने-अपने स्वार्थों में आकण्ठ डूबे होने के कारण से किया गया। कोई सीखे या नहीं, ऐसे दोहराव से यह सबक भी निकलता है कि आन्दोलनों में बढ़-चढ़ कर की जाने वाली किसी भी भागी-दारी को आन्दोलनों में मिल पायी व्यापक जन-हितकारी सफलताओं की व्यवहरिक उपयोगिता की कसौटी पर ही कसना चाहिए; उनकी तात्कालिक चमक की नकली चका-चौंध के प्रभाव की किसी तराजू पर नहीं।

दूसरा सबक यह है कि आन्दोलन एक अविरल धारा है। ऐसी अविरल धारा जो सफलता के प्रत्येक पड़ाव के बाद भी सतत्‌ रूप से प्रवाहित होती रहनी चाहिए। इसलिए भी कि पूरा करने को नित्य नये सामाजिक दायित्व मिलते रहेंगे। और इसलिए भी कि जो कुछ किया जा चुका है उसका पुनरीक्षण कर छूट गयी कड़ियों को पिरोने की, और उनके दोषों में सुधार करने की भी, आवश्यकता बनी ही रहती है।

आन्दोलन, यथार्थ में एक धर्म है। भारतीय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में कहें तो विशुद्ध ऋषि-धर्म। सत्ता से इसकी समझ चाहे जितनी भी बन जाये, उससे असहमति की गुंजाइश भी शाश्वत्‌ बनी रहती है। सरल शब्दों में, जन-हित के दायित्व दो भागों में विभक्त रहते हैं। पहला सत्ता की बाग-डोर सम्हालने वालों के जिम्मे। और दूसरा सत्ताधीशों के अनुचित राह पकड़ लेने पर उन पर जन-दबाव बनाने वालों के जिम्मे। सत्ता की बाग-डोर किसी के भी हाथ में क्यों न चली जाये, सत्ता की निगरानी और आवश्यकता पड़ने पर आन्दोलन की बागडोर थामने के दायित्व को हमेशा के लिए दफ़नाया नहीं जा सकता है। आन्दोलन में सामाजिक सोच चाहे जितना भी गहरा हो, इस सोच को राजनीति के साँचे में कतई नहीं ढाला जा सकता है। ऐसी आदर्श स्थिति में किसी जन-आन्दोलन का सत्ता में विलोप कैसे किया जा सकता है? भले ही वह सत्ता उसी के कारण अस्तित्व में आयी हो। और, यदि कोई आन्दोलन अपनी किसी पराकाष्ठा पर पहुँच कर राजनीति में तब्दील होता है तो उसकी ऐसी परिणति यही प्रमाणित करती है कि वह ‘आन्दोलन’ आन्दोलन के लिए नहीं बल्कि केवल और केवल ‘राजनीति’ के लिए पल्लवित-पुष्पित हुआ था।

अंग्रेजों से स्वतन्त्रता पा लेने के बाद गांधी ने जब यह आह्वान किया था कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाना चाहिए तब यथार्थ में उन्होंने देश के मानस को यही सन्देश देने का प्रयास किया था। किन्तु कांग्रेस पर काबिज महत्वाकांक्षियों की बड़ी फौज ने इसे स्वीकार नहीं किया। कर लेते तो देश का स्वातन्त्रोत्तर इतिहास बहुत कुछ दूसरा होता। उन्होंने गांधी के सुझाव को ताक पर रखते हुए आन्दोलन की जागीर पर सत्ता की डोर सम्हालना पसन्द किया। परिणाम में राजनीति का जो स्खलन हुआ, इतिहास उसका साक्षी है। लेकिन क्योंकि स्वतन्त्रता का आन्दोलन लम्बे दौर तक चला था, इस स्खलन की गति पर्याप्त धीमी रही।

इसके बाद जेपी आन्दोलन का दौर आया। जेपी के इस आन्दोलन ने जहाँ एक ओर हाशिये पर पहुँचा दिये गये बीते जमाने के ढेरों राज-नेताओं को एक नया राजनैतिक जीवन दिया वहीं दूसरी ओर देश के राजनैतिक क्षितिज पर अनेक युवा चेहरों को स्थापित किया। कालान्तर में जेपी आन्दोलन से नव-जीवन पा चुके और नये-नये उपजे यही सारे क्षेत्रीय क्षत्रप राजनीति के अपरिहार्य धुरन्धर बन गये। परिणाम में एक बार फिर से आया वही राजनैतिक स्खलन। किन्तु जेपी-आन्दोलन की अवधि क्योंकि स्वतन्त्रता-आन्दोलन की अवधि की तुलना में पर्याप्त संक्षिप्त रही थी, इस दूसरे स्खलन की गति पहले की तुलना में पर्याप्त तीव्र रही।

इन दोनों के विपरीत, अण्णा के कन्धों पर सवार हो कर केजरीवाल और उनके गुट ने गिनती के दिन ही आन्दोलन को दिए और खुद को राजनीतिज्ञ का चोला ओढ़ा दिया। ‘आप’ की राजनीति इसीलिए उँगलियों पर गिने जा सकने वाले दिनों में ही इतनी स्खलित हो गयी कि लोगों को आन्दोलन-कारियों से घिन होने लगी है।

सरल शब्दों में, ‘आप’ से निकला सबसे बड़ा सबक यही है कि यदि आम आदमी अपने ठगे जाने के दोहराव को रोकने की कामना सच में रखता है तो उसको आन्दोलन और राजनीति के अन्तर को समझने की अपनी योग्यता बढ़ानी होगी। तभी आन्दोलन राजनीति को उसकी शुचिता से पल्ला झाड़ लेने से रोक पाने में समर्थ रह पायेंगे।

(३१ मार्च २०१५)