April 2015 archive

…और गजेन्द्र फन्दे पर झूल गया!

Sarokar

गजेन्द्र के उस तथाकथित सुसाइड-नोट की विषय-वस्तु को, तार्किक रूप से, मृतक की निजी व्यथा का ईमान-दार कथन नहीं माना जा सकता है। इस नोट में यह कहीं नहीं लिखा गया है कि वह आत्म-हत्या कर रहा है। और इसी से, यह बड़ा स्पष्ट संकेत निकलता है कि उक्त विषय-वस्तु किसी अन्य ‘विचारक’ के उपजाऊ मष्तिष्क की हाई-ब्रिड फसल थी। Continue reading

यथार्थ-परक नजरिया पत्रकारिता को काल-जयी बनाता है

Sarokar

चुनौती-भरी प्रति-स्पर्धा में सालों-साल अपनी साख को अक्षुण्ण बनाये रखना हर दैनिक के बूते की बात नहीं है। नियमित अन्तराल से प्रकाशित होने वाली समाचार-पत्रिकाओं के लिए तो यह और भी दुश्कर है। ऐसा कर पाने के लिए दृष्टि का केवल निर्मल होना नहीं बल्कि उसका गहरा होना भी आवश्यक है। Continue reading