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…और गजेन्द्र फन्दे पर झूल गया! – Jyoti Prakash

…और गजेन्द्र फन्दे पर झूल गया!

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Sarokar

गजेन्द्र के उस तथाकथित सुसाइड-नोट की विषय-वस्तु को, तार्किक रूप से, मृतक की निजी व्यथा का ईमान-दार कथन नहीं माना जा सकता है। इस नोट में यह कहीं नहीं लिखा गया है कि वह आत्म-हत्या कर रहा है। और इसी से, यह बड़ा स्पष्ट संकेत निकलता है कि उक्त विषय-वस्तु किसी अन्य ‘विचारक’ के उपजाऊ मष्तिष्क की हाई-ब्रिड फसल थी।

आखिर, गजेन्द्र फाँसी के फन्दे पर झूल ही गया। वह भी दिन-दहाड़े और हजारों की उन्मादी भीड़ के सामने। यह भीड़ बाकायदा आमन्त्रण दे कर और प्रचार-प्रसार के आधुनिकतम्‌ साधनों की सहायता से हाथ जोड़-जोड़ कर देश की राजधानी दिल्ली में इकट्‍ठी की गयी थी। किसानों की जमीन का अधिग्रहण करने वाले काले कानून के विरोध के नाम पर। दिल्ली सरकार के मुखिया अरविन्द केजरीवाल और उनके हिस्से में बने-बच रहे ‘आप’ के प्राय: सभी धुरन्धर इस भीड़ की आँखों के तारे थे। लेकिन गजेन्द्र की तथा-कथित आत्म-हत्या ने मीडिया की खबरों की धुरी पूरी तरह से पलट दी। ‘केजरीवाल एण्ड कम्पनी’ अभी भी खबरों के केन्द्र में हैं, शायद कहीं अधिक सुर्खियों से। अन्तर केवल यह आया है कि अब ये बेचारे ‘हमारी सफाई तो ले लीजिए’ वाली आक्रामक गिड़-गिड़ाहट से तर-बतर हुए दिख रहे हैं।

सारे आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच दिल्ली पुलिस से संकेत उछले हैं कि इस रैली के आयोजन की अन्तिम पुलिसिया अनुमति आयोजकों को मिली ही नहीं थी। दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने दावा किया कि आप ने पहले २२ अप्रैल की इस रैली को राम-लीला मैदान में आयोजित करने की अनुमति माँगी थी जिससे पुलिस ने मना कर दिया था। पुलिस के अनुसार इस रैली के राम-लीला मैदान में आयोजित होने से उसमें एक बड़ी भीड़ के जुटने की सम्भावना बनेगी। और, संसद्‌ के सत्र के दौरान एक बड़ी भीड़ को जुटाने की सहमति नहीं दी जा सकती थी क्योंकि इससे कानून व व्यवस्था की गम्भीर समस्याएँ खड़ी होतीं। इसीलिए, पुलिस ने रैली को जन्तर-मन्तर पर करने का सुझाव दिया था जहाँ लगभग पाँच हजार की भीड़ को सुविधा से व्यवस्थित किया जा सकता है। दिल्ली पुलिस का दावा यह भी है कि क्योंकि बाद में उसे अन्देशा हो गया था कि जुटने वाली भीड़ पाँच हजार से ऊपर पहुँच जायेगी, जिससे जन्तर-मन्तर पर कानून व व्यवस्था बनाये रखना सम्भव नहीं हो पायेगा; उसने आप को नये सिरे से चिट्‍ठी भेज कर कहा कि वे रैली को जन्तर-मन्तर पर नहीं बल्कि राम-लीला मैदान में ही आयोजित करें। फिर भी, रैली जन्तर-मन्तर पर ही आयोजित की गयी। इस सचाई के बाद भी कि वहाँ धारा १४४ लगा दी गयी थी।

घटना के अगले ही दिन जो सबसे शर्म-नाक खबरें तैरी हैं उनमें पहली यह है कि जब कुमार विश्वास अपनी विशेष शैली में ‘उत्साह’ बरसा रहे थे तभी मंच पर से किसी ने जोर से कहा, “लटक गया”! बात यहीं तक सीमित नहीं है। एलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रैली के दिखाये जा रहे फुटेज में, ‘लटक जाने’ की इस उद्घोषणा के तत्काल बाद कुमार विश्वास की भाव-भंगिमा सवालिया नहीं बल्कि तनाव-मुक्ति की आश्वस्ति से पगी हुई दिखी। इस कड़ी की दूसरी खबर यह है कि आप के किसी विधायक ने गजेन्द्र के फाँसी के फन्दे पर झूलने से कोई पन्द्रह मिनिट पहले ही ट्वीट कर उसे श्रद्धान्जलि दे डाली थी। हवा में तैर रही यह दोनों ही खबरें शब्दश: सच भले ना हों लेकिन यदि वे सचाई के आस-पास भी हों तब भी इनसे इस सम्भावना को बल मिलता है कि जो भी हुआ वह महज आकस्मिकता में नहीं हुआ था। ‘आयोजक’ के नाम-करण को ले कर होने वाली बहसें चाहे जितनी निरर्थक अथवा निहित-स्वार्थी हों, गजेन्द्र की कथित आत्म-हत्या के पीछे एक ‘आयोजन’ की गन्ध तो सूँघी ही जा सकती है।

मंच से सौ-पचास कदम दूर एक पेड़ पर मजे-मजे में चढ़ते समय सजे-धजे गजेन्द्र के हाथ में एक झाड़ू थी। आम आदमी पार्टी की प्रतीक बन चुकी झाड़ू के साथ पेड़ की एक शाख पर आसन जमा लेने के बाद उसने जोशीले अन्दाज में, और पूरे आत्म-विश्वास से, कुछ नारे भी बुलन्द किये। लेकिन कहीं भी और कभी भी न तो उत्तेजना दिखलायी दी और ना ही निराशा। यह दृष्य बहुत देर तक चला। फिर जब वह फन्दे पर झूल गया तब कुमार विश्वास ने अपने मोबाइल फोन से गजेन्द्र की लिखी उस पर्ची का वाचन किया जो उसके पास से तब नीचे गिरी थी जब वह फन्दे पर झूल चुका था। अफरा-तफरी की इस स्थिति में, उसे कथित रूप से गजेन्द्र का सुसाइड-नोट बतलाया गया जबकि उसमें यह कहीं नहीं लिखा था कि वह आत्म-हत्या कर रहा है। पर्ची में किया गया कथित कथन आनन-फानन में पेड़ से उड़ कर मंच से भाषण कर रहे नेताजी के मोबाइल में शब्दश: किस प्रकार प्रवेश कर गया यह औसत समझ से परे है। इस सब को उदाहरण बना कर आप नेताओं पर गम्भीर आरोप उछाले जा रहे हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि गजेन्द्र दिल्ली के उप मुख्य मन्त्री मनीष सिसौदिया के बुलावे पर रैली स्थल पर पहुँचा था।

कुछ इसी तरह की ‘राजनीति’ के आरोप आप के नेताओं ने भी भाजपा और कांग्रेस पर लगाये हैं। एक खबर तो यह भी तैर रही है कि यही गजेन्द्र पहले कभी कांग्रेस की रैली की शोभा बनाने के लिए कांग्रेसियों की ओर से भी आमन्त्रित हो चुका था।

और, यही इस दु:खद्‌ घटना की वास्तविक जड़ है। खबरों के अनुसार, गाँव के पक्के बने मकान में पिता और परिवार के साथ रहने वाला गजेन्द्र एक नामी-गिरामी व्यक्तित्व का धनी था। वह लगभग २५ सालों से साफ़े बाँधने का व्यवसाय कर रहा था। ३२ प्रकार के साफ़े बाँधने में माहिर था। साफ़े बाँधने की कला सिखलाने की सवा सौ वर्क-शॉप लगा चुका था। एक मिनिट में ७ व्यक्तियों को साफ़े बाँधने का रिकॉर्ड भी बना चुका था। एक साथ १६ व्यक्तियों को साफ़े बाँध सकता था। साफ़े बाँधने की इस कला और व्यवसाय की जानकारी देने वाली उसकी अपनी वैब-साइट भी थी। गजेन्द्र प्रधान मन्त्री और राष्ट्रपति के लिए भी साफ़े बाँध चुका था। जयपुर के पूर्व महाराजा भवानी सिंह का सुरक्षा अधिकारी रह चुका था।

जाहिर है, दौसा (राजस्थान) के मृतक गजेन्द्र को औसत खेतिहर किसान की श्रेणी में कतई परिभाषित नहीं किया जा सकता है। और तो और, उसके क्षेत्र के तहसीलदार की सूचना के अनुसार, गजेन्द्र के परिवार ने मौसम की खराबी से अपनी फसल को हुए किसी नुकसान की भरपायी का आवेदन भी नहीं दिया था। ऐसी स्थिति में, गजेन्द्र के उस तथाकथित सुसाइड-नोट की विषय-वस्तु को, तार्किक रूप से, उसकी निजी व्यथा का ईमान-दार कथन नहीं माना जा सकता है। और इसी से यह बड़ा स्पष्ट संकेत निकलता है कि उक्त विषय-वस्तु किसी अन्य ‘विचारक’ के उपजाऊ मष्तिष्क की हाई-ब्रिड फसल थी। हाँ, यह ‘उपजाऊ मष्तिष्क’ राजनीति के किस ठौर का हिस्सा है, आज के इस बड़े सवाल का ठीक-ठीक जवाब घटना से जुड़े सारे तथ्यों के प्रमाणित होने तक बहस का मुद्दा बना रहेगा।

संवेदन-हीनता दिखलाने के अपने ऊपर लगे गम्भीर आरोपों को झुठलाने के प्रयास में जहाँ दिल्ली के मुख्य मन्त्री ने दिल्ली पुलिस के सामने अपनी बेचारगी की शपथें खायीं वहीं संजय सिंह, कुमार विश्वास और आशुतोष जैसे चोटी के आप नेताओं ने, घटना के घण्टे-डेढ़ घण्टे के बाद ही, वही सब आरोप वहाँ उपस्थित रहे मीडिया-कर्मियों तक पर चिपका दिये। यह अलग बात है कि राजनैतिक शैली में मीडिया पर लगाये गये संवेदन-हीनता के ऐसे आरोपों के बाद घटना-स्थल से रिपोर्ट दे रहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक रिपोर्टर ने आप नेताओं को मुँह-तोड़ उत्तर दिया। उसने कहा कि यह सच है कि मीडिया-कर्मी अपने कैमरे और माइक्रोफोन जमीन पर पटक कर पेड़ पर चढ़ने नहीं दौड़े लेकिन यह भी उतनी ही बड़ी सचाई है कि यदि मीडिया अपने कैमरे जमीन पर पटक देता तो राजनैतिक निकृष्टता का जो घिनौना दृष्य देश देख पाया, उसका कोई प्रमाण ढूँढ़े नहीं मिलता।

गजेन्द्र मर गया। शायद, नहीं चाहते हुए भी। मर गया क्यों कि वह फाँसी लगाने के किसी मोनो-प्ले की स्क्रिप्ट का मंचन कर रहा था। पूरी लगन से और बिल्कुल निश्चिन्त रह कर भी। शायद इसलिए कि, इस मोनो-प्ले की स्क्रिप्ट लिखने वालों ने और उसके मंचन के लिए उसी का ‘चयन’ करने वालों ने गजेन्द्र को ‘जीवन-रक्षा’ के प्रति आश्वस्त किया होगा। शायद इसलिए भी कि, उसे समझाया गया होगा कि जैसे दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने किसानों को भारी-भरकम मुआवजा देने की घोषणा की है, आत्म-हत्या करने के प्रयास के उसके उस मंचन से राजस्थान की वसुन्धरा सरकार पर भी यह दबाव पड़ेगा कि वह किसानों को भारी-भरकम मुआवजा बाँटे।

बीती २२ अप्रैल का दिन जितना घटना-प्रधान रहा, २३ अप्रैल की तारीख भी उससे रत्ती भर कम घटना-पूर्ण नहीं बीती। केन्द्रीय गृह मन्त्री के निर्देश पर दिल्ली पुलिस ने कथित आत्म-हत्या की जाँच बैठा दी। भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३०६ (आत्म-हत्या के लिए उकसाना) और धारा १७६ (सरकारी काम-काज में बाधा पहुँचाना) जैसे गम्भीर आरोपों के साथ बाकायदा एफआईआर दर्ज कर ली गयी है। खुले संकेत दिये गये हैं कि मंच पर उपस्थित आप नेताओं को पूछ-ताछ के लिए बुलाया जा सकता है। उधर, हवा के बदलते रुख से घबरा उठी केजरीवाल सरकार ने इस घटना की दण्डाधिकारीय जाँच बैठा दी जिसके बाद डीएम ने दिल्ली पुलिस-प्रमुख बस्सी को तलब कर लिया। पुलिस-प्रमुख ने भी तत्काल अपना जवाब डीएम को भेज दिया जिसमें सूचित किया गया है कि डीएम को इस प्रकार का नोटिस देने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है क्योंकि ऐसी पूछ-ताछ की मंशा भी दिल्ली पुलिस के संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण होगी।

घटना-क्रम के इस मोड़ पर गजेन्द्र की बहिन ने एक गम्भीर दावा किया है जिसके अनुसार कथित रूप से उसके द्वारा लिखी गयी बतलायी जा रही उस पर्ची की लिखावट गजेन्द्र की अपनी लिखावट से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती है।

आरोपों-प्रत्यारोपों और पूछ-ताछ का ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है लेकिन सीधी-सपाट सचाई यही है कि गजेन्द्र झूठ और फरेब से भरी एक कोरी राजनैतिक जुमले-बाजी का शिकार हो गया। शिकार हुआ क्योंकि उसने एक राजनैतिक दल की रैली में एक खास किस्म का तमशा करने से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खबरों में ‘छा’ जाने के दिये गये किसी राजनैतिक झुलावे पर भरोसा करने की प्राण-घाती भूल की। पता नहीं, तालियों की हुजूमी गड़-गड़ाहट और विरोधी दल की सरकार पर मंच से उछाले जा रहे राजनैतिक कीचड़ की धींगा-मस्ती के बीच मौसम की मार झेलने को विवश होते देश के गरीब किसान अन्तिम साँसें लेते गजेन्द्र के अन्तर्मन से फूटी आह भरी यह सलाह पता नहीं सुन भी पाये या नहीं कि नेताओं के भाषण और उनके परोसे भरोसे टाइम-पास तो हो सकते हैं, भरोसे की टोकरी नहीं। इन पर भरोसा करोगे तो यों ही, मेरे जैसे, बे-मौत मारे जाओगे।

(२३ अप्रैल २०१५)

1 comment

    • जय प्रकाश on May 11, 2015 at 11:10 am

    सारे सवालों की गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं यदि इस संभावना पर विचार किया जाए कि गजेन्द्र पब्लिक और मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए गले में फंदा डालने का तमाशा कर रहा था। तभी उसने अपने रिश्तेदारों को फोन करने खबर दी “मुझे टीवी पर देखो”।

    सभी जानते थे कि वह खिलवाड़ कर रहा है सो उसे बचाने या रोकने के स्थान पर उसके मजाक में शामिल होते हुए अपना गमछा देना और “लटक जा” कहना भी शामिल था और पैर फिसलने के साथ हुए खेल के अन्त में “लटक गया” भी।

    यह भाजपा के लिए सुनहरा मौका बन गया रैली का मूल मुद्दा जो मर गया था, भाजपा की इस शुरुआत में आम आदमी पार्टी पहले तो फंसी पर बाद में उसने भी इसका पूरा लाभ उठा लिया।

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