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यथार्थ-परक नजरिया पत्रकारिता को काल-जयी बनाता है – Jyoti Prakash

यथार्थ-परक नजरिया पत्रकारिता को काल-जयी बनाता है

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Sarokar

चुनौती-भरी प्रति-स्पर्धा में सालों-साल अपनी साख को अक्षुण्ण बनाये रखना हर दैनिक के बूते की बात नहीं है। नियमित अन्तराल से प्रकाशित होने वाली समाचार-पत्रिकाओं के लिए तो यह और भी दुश्कर है। ऐसा कर पाने के लिए दृष्टि का केवल निर्मल होना नहीं बल्कि उसका गहरा होना भी आवश्यक है।

सूचनाओं की उपयोगिता सदैव सन्देह से परे रही है। यों पहले, उपलब्ध होने वाली सूचना का प्रसार पर्याप्त सीमित होता था और इसका भी उपयोग केवल राज-काज, व्यापार-व्यवसाय तथा सामाजिक तानों-बानों के गुणा-भाग में होता था। यही नहीं, वहाँ भी सूचना का उपयोग केवल किसी सन्दर्भ-विशेष तक सिमटा होता था। फिर, छपाई की मशीनों के सूचना-प्रसार के माध्यम के रूप में अवतरित होने के बाद से, सूचनाओं के प्रचार-प्रसार ने व्यापक स्वरूप ले लिया। वह जहाँ समाज के प्रत्येक घटक के लिए सुलभ हो गयी वहीं धीरे-धीरे आम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपरिहार्य भी होती गयी। यही कारण है कि पत्र और पत्रकारिता नामक संस्था आज देश व समाज की एक महत्व-पूर्ण स्तम्भ बन चुकी है।

सूचना की इस विकास-यात्रा का परिणाम यह हुआ कि अपने आरम्भिक काल में पत्रकारिता केवल कर्म ही नहीं बल्कि धर्म भी बनता गया। किन्तु बाद में, जैसे पाखण्डियों के प्रादुर्भाव ने ईश्वर-निष्ठा वाले धर्म को कदाचित्‌ मुद्रा-निष्ठा वाले व्यवसाय में ढालना आरम्भ कर दिया था ठीक उसी तर्ज पर पत्रकारिता भी, धर्म-कर्म से कतई हट कर, अब निरा लाभ-कारी व्यवसाय बनने लगी है। घोषित रूप से छपने वाले विज्ञापनों से होने वाली कमाई की तुलना में बड़े भुगतान की ऐवज में छापी जाने वाली निहित-स्वार्थी खबरें अधिक लाभ-कारी होने लगी हैं। सत्ता की डोर थाम लेने की चाहत ने भी इस मनोवृत्ति को बढ़ावा दिया है। और तो और, ऐसा दौर भी बरसों से खुले आम चल रहा है जिसमें प्रतिष्ठित समाचार पत्र-पत्रिकाओं को अपने वैचारिक विशेषाधिकार समझे जाने वाले सम्पादकीय तक को, एक बड़ी राशि के ऐवज में, प्रायोजित आलेखों का मोहताज मानने में कोई सैद्धान्तिक दोष दिखायी नहीं देता। इन विशेष स्थितियों में मूल्यों का कोई अर्थ नहीं रहता है, केवल लुभावना ‘मूल्य’ मिलना चहिए। यह अवश्य है कि इन सौदों की आहटें तभी सुनायी दे पाती हैं जब दोनों पक्षों में से किसी के भीतर का कोई अपना ही सूत्र, अपने किसी बेहद वैयक्तिक कारण से, उन्हें ‘लीक’ करता है।

यद्यपि प्रजातन्त्र के इस चौथे स्तम्भ में आये सारे स्खलन के बाद भी देशज पत्रकारिता में ऐसे आनुवांशिक गुण-सूत्र अभी भी बचे हुए हैं जो स्वयं को सामाजिक दायित्व का बड़ा वाहक मानते हैं।

इसमें दो मत नहीं कि प्रति-दिन प्रकाशित होते समाचार-पत्रों की तुलना में किसी नियमित अन्तराल से प्रकाशित होने वाली समाचार-पत्रिकाओं के लिए अपनी पहचान बनाना और अपने लिए पाठकों के मानस में सम्मान जगाना अधिक कठिन है। नि:सन्देह, परस्पर प्रति-स्पर्धा दैनिक समाचार-पत्रों में भी है क्योंकि खबरें रोज ही जन्मती हैं और कमो-बेश प्रत्येक दैनिक के पास यह अवसर होता है कि वह उन्हें स्थान दे पाये। लेकिन समयावर्ती समाचार-पत्रिकाओं का प्रति-स्पर्धा संकट अधिक गहरा होता है क्योंकि जहाँ उसे पहले से ही सार्वजनिक हो चुकी खबरों में से ही कुछ न कुछ उठाना होता है वहीं उसमें अपनी प्रतिष्ठा की छाप भी छोड़नी होती है।

खबरों के प्रकाशन की इस चुनौती-भरी प्रति-स्पर्धा में सालों-साल अपनी साख को अक्षुण्ण बनाये रखना नियमित अन्तराल से प्रकाशित होने वाली हर किसी समाचार-पत्रिका के बूते की बात नहीं है। एकाधिक हिन्दी दैनिकों में सम्पादक की जिम्मेदारी निभाने के बाद अब पत्रकारिता से सन्यास ले चुके मेरे एक मित्र का कहना है कि सम्पादन में किसी घट चुकी घटना की सूचना तथा उसकी समीक्षा कर पाने की क्षमता का जितना महत्व है उससे किंचित्‌ भी कम महत्व इस बात का नहीं है कि किसी पत्रकार में आगे घट सकने वाली किसी घटना के तानों-बानों और उसके परिणामों को पहले से ही देख पाने की कितनी योग्यता है। जो समयावर्ती समाचार-पत्रिका खबरों तथा उनकी पृष्ठ-भूमि की यथार्थ-परक समीक्षा के साथ ही सम्बन्धित घटना-विशेष के प्रभाव में जन्मने वाली परिस्थितियों का सटीक पूर्वानुमान अपने पाठकों को करा पाती है वह काल-जयी हो जाती है। यों, ऐसा कर पाने के लिए उसकी दृष्टि का केवल निर्मल होना नहीं बल्कि उसका गहरा होना भी आवश्यक है। इसीलिए, आश्चर्य नहीं कि स्पूतनिक ने अपने साप्ताहिक प्रकाशन के ५७ साल मान-सम्मान के साथ पूरा करने का कमाल किया है।

स्पूतनिक को जितना कुछ भी जान पाया हूँ उसके आधार पर बिना किसी संशय के कहा जा सकता है कि यह न तो सत्ता का मुख-पत्र है और ना ही विरोधियों का पक्ष-धर। इसके पाठक जानते हैं कि किसी भी मुद्दे पर इसमें व्यक्त हुई सहमति अथवा आलोचना विशुद्धत: उसके गुण-दोष पर आधारित होती है। अनेक अवसर ऐसे भी आये हैं जब स्पूतनिक ने एक ही सन्दर्भ में परस्पर विपरीत दृष्टिकोणों को एक साथ स्थान दिया है। किन्तु, स्पूतनिक ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उन विशेष सन्दर्भों में इस साप्ताहिक के लेखन-स्रोतों में मत-भिन्नता रही और उसने अपने इन स्रोत-केन्द्रों में उठे विचारों का पूरा मान रखा।

यही कारण है कि सरकारें चाहे जिस दल की आती रही हों, वे स्पूतनिक से ‘प्रसन्न’ कभी नहीं रहीं। कारण बिल्कुल साफ है — समाज-देश के प्रति अपने दायित्व के निर्वाह से स्पूतनिक कभी विमुख नहीं हुआ। स्पूतनिक के १४-२० मार्च २०११ को प्रकाशित अंक के अपने ही शब्दों में, “यह बात कड़वी है कि देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और राजनीतिज्ञों की निरंकुशता के पीछे मीडिया की अहम भूमिका है। मीडिया अपना दायित्व भली प्रकार नहीं निभा रही है। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस ये चारों लोकतन्त्र के प्रमुख स्तम्भ हैं। लेकिन जब प्रेस ही लड़खड़ा जाएगा तो शेष स्तम्भों की अराजकता स्वाभाविक ही है।”

अपने दायित्व का इसी बे-धड़क भाव से निर्वाह करने के कारण उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने स्पूतनिक के वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द शुक्ला की राज्य-स्तरीय मान्यता को निरंकुश स्वेच्छारिता दर्शाते हुए निरस्त कर दिया था। फिर तीन साल के बाद उसने यह मान्यता तभी बहाल की जब प्रेस काउन्सिल ऑफ़ इण्डिया की पूरी पीठ ने मामले की सुनवाई कर उत्तर प्रदेश सरकार को मान्यता-बहाली का कठोर निर्देश दिया।

अपने प्रकाशन के ५८ वें साल में प्रवेश के गौरव-शाली अवसर पर स्पूतनिक परिवार और उसके स्नेही पाठकों को कोटि-कोटि शुभ-कामनाएँ।

(११ अप्रैल २०१५)