बलात्कार-पीड़िता की पहचान

Bahas

बहस में कूदे तमाम राजनैतिक दलों और उनके धुरन्धरों को समझना होगा कि आईपीसी की धारा २२८-ए यौन-प्रताड़ित को उसके द्वारा भोगी जा चुकी प्रताड़ना से आगे की सामाजिक प्रताड़ना से संरक्षित करने के लिए जोड़ी गयी थी, उसे अपने नैसर्गिक अधिकारों से वंचित करने के लिए नहीं।

आम आदमी पार्टी एक नयी बहस में घिर गयी है। घेरने वाले जी-जान एक कर रहे हैं तो आप के नेता कैमरे के सामने मुँह खोलने से बच रहे हैं। आप के चेहरे पर कालिख पोतने को आतुर दबाव बना रहे हैं कि आईपीसी की धारा २२८-ए का मामला बनता ही बनता है तो आप-नेता आतिषी मार्लीना कह रही हैं कि मीडिया आप-नेताओं पर अपनी सफाई देने का दबाव नहीं डाल सकता है। मुद्दा सच-मुच गम्भीर है।

हुआ यह कि खण्डवा (मध्य प्रदेश) के घोंघल गाँव के जल-सत्याग्रहियों को अपना आन्दोलन वापस लेने के लिए सहमत करा पाने की कथित सफलता से उत्साहित आम आदमी पार्टी ने कल वहीं एक किसान-मजदूर सभा आयोजित की। बात यहीं तक रहती तो औसत राजनीति की स्वीकार्य सीमा में भुला भी दी जाती। लेकिन आप के संजय सिंह और आतिशी मार्लीना जैसे वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में उस सभा में दो बलात्कार-पीड़ितों की न केवल पहचान उजागर की गयी उन्हें और उनके नाते-दारों को भी आप-बीती सुनाने मंच पर बुला लिया गया।

बहस चल पड़ी है कि देश की राजधानी दिल्ली में प्रदेश-सरकार चला रही पार्टी राजनैतिक लाभ के लिए दूसरे प्रदेश में कानूनों का खुला उल्लंघन करने का राजनैतिक खेल खेल रही है — उसे दण्ड मिलना ही चाहिए।

यहाँ, समझ की एक बारीक सी रेखा का उल्लंघन वे सब भी कर रहे हैं जो आप-नेताओं पर राजनीति की मर्यादा का उल्लंघन करने का आरोप लगा रहे हैं।

दरअसल, इसमें दो मत नहीं कि यौन-उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं और उनकी खबरों की बढ़ती रिपोर्टिंग से कानून के निर्माताओं पर दबाव बना था कि वे पीड़िता के, अपनी पहचान को सार्वजनिक होने से बचाये रखने के, अधिकार को संरक्षित करने कठोर कदम उठायें। उन्होंने कदम उठाये भी और आईपीसी में धारा २२८-ए जोड़ी गयी जो यौन-पीड़िता की पहचान को उजागर करने वाले को दण्डित करना सु-निश्चित करती है।

किन्तु, यहीं वह बड़ी बारीक लकीर है जो किसी और द्वारा, उसके ना चाहने पर भी, पीड़िता की पहचान उजागर करने का गम्भीर अपराध करने और पीड़िता द्वारा, स्वयं ही आगे आ कर, अपनी पहचान उजागर कराने के किसी भी प्रयास में बिल्कुल स्पष्ट भेद करती है। अपनी पहचान उजागर करने की मंशा के साथ स्वयं को प्रस्तुत करने वाली पीड़िता को धारा २२८-ए भी दण्डित नहीं कर सकती है।

घोंघल गाँव की किसान-मजदूर सभा की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अभी तक आयी क्लिपिंग्स किसी भी कोंण से यह साबित नहीं कर पायी हैं कि उस सभा में पीड़िताओं के साथ अन्याय और अत्याचार हुआ था। बहस में कूदे तमाम राजनैतिक दलों और उनके धुरन्धरों को समझना होगा कि आईपीसी की धारा २२८-ए यौन-प्रताड़ित को उसके द्वारा भोगी जा चुकी प्रताड़ना से आगे की सामाजिक प्रताड़ना से संरक्षित करने के लिए जोड़ी गयी थी, उसे अपने नैसर्गिक अधिकारों से वंचित करने के लिए नहीं।

(१३ मई २०१५)

1 comment

    • जय प्रकाश on May 16, 2015 at 3:12 pm

    देश की राजनीति घिनौनी केवल इसलिए हो जाती है क्योंकि देश के नेता जो सरकार में शामिल न हो सके वे सरकार को कैसे धकेल सकें, इसी कोशिश में प्रत्येक घटना या बतकही में दोष खोजते हैं, न दिखें तो भी पैदा जो करें वे अच्छे रानीतिज्ञ। असल में उन्हें देशवासियों से कोई सरोकार नहीं, वे उनके उपयोग व उपभोग की वस्तु मात्र हैं। वे स्वयं कोई काम कर नहीं सकते सरकार को करने दे नहीं सकते।

    ठीक ऐसा ही तो “शहीद” गजेन्द्र के मामले में हुआ। वह बेचारा तो फोन करके सबको बता रहा था मुझे टीवी पर देखो बड़ा खुश था कि सारे कैमरे उसी पर हैं। जबकि देश के 14 हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के जजों के समक्ष आत्महत्या का एक असफल फिर दोबारा सफल प्रयास करने वाला एकमात्र 101वाँ अडिग गवाह जस्सी मीडिया व नेताओं के लिए कोई खास मुद्दा नहीं बन सका शहीद कहलाना तो बहुत दूर की बात है।

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