दो मिनिट में नूडल : जीवन भर का टण्टा

Sarokar

सच है कि मोनोसोडियम ग्लूटामेट प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। और इस अर्थ में यह एक सुरक्षित खाद्य-तत्व है। किन्तु ऊपर से मिलाये जाने पर यह मष्तिष्क को नुकसान पहुँचा सकता है। ठीक वैसे ही जैसे कोकीन प्राकृतिक तत्व तो है लेकिन कोका पत्तियों से निकाला गया विशुद्ध कोकीन मानव-स्वास्थ्य के लिए महा घातक है।

आज के समय चटोरों और आलसियों की जीभ-लगी मैगी’ समाचारों की सुर्खियों में है। खबर है कि उत्तर प्रदेश के खाद्य-सुरक्षा तथा औषधि प्रशासन (एफडीए) ने की मैगी में ‘अधिकतम्‌ अनुमति प्राप्त मात्रा’ से सात गुना अधिक सीसा (लैड) पकड़ा है। सीसे की इतनी अधिक मात्रा का अर्थ यह है कि मैगी खाने वालों को इसकी निर्माता कम्पनी नैस्ले इण्डिया ने कैंसर के जोखिम पर खड़ा कर दिया है। यही नहीं, मैगी के उन्हीं नमूनों में मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) की जो मात्रा मिली है वह भी अनुमति-प्राप्त सीमा से पर्याप्त अधिक है।

वैसे, खुली आँखों से और निहित-स्वार्थी भेद-भाव से ऊपर उठ कर जाँच-पड़ताल की जाये तो मामला केवल मैगी तक ही सीमित नहीं रहेगा। दुष्प्रभाव भी, अभी तक प्रकाश में आ चुके जोखिमों से, कहीं अधिक दूर-गामी हो सकते हैं। आज के जमाने में, भूख लगी है तो ‘दो मिनट में तैयार होने वाले’ नूडल्स किसी की भी पहली पसन्द हो सकते हैं। लेकिन, कम मेहनत और कम समय में बनने वाले सारे के सारे नूडल्स खाने वालों की सेहत के लिए इतनी समस्याएँ पैदा कर सकते हैं कि उन्हें जानने के बाद एक समझ-दार व्यक्ति नूडल्स के सेहत-मन्द विकल्प खोजना आरम्भ कर देगा।

दरअसल, स्वाद देने के लिए मिलाये जाने वाले मोनोसोडियम ग्लूटामेट के अलावा आनन-फानन में पक जाने वाले नूडल्स में प्रोपलाइन ग्लाइकोल भी मिलाया जाता है। यह तत्व भण्डारण के दौरान नूडल्स को खराब होने से बचाता है। प्रोपलाइन ग्लाइकोल नामक यह तत्व दिल, किडनी और लिवर को नुकसान पहुंचाता है। शरीर में इसकी अधिकता से इन अंगों के क्षति-ग्रस्त होना का जोखिम बढ़ जाता है। नूडल्स को बनाने में सोडियम का भी उपयोग होता है जिसकी अधिकता किसी को भी उच्च रक्त-चाप और हड्डियों की समस्याओं जैसे गम्भीर रोग दे सकती है।

हाल ही में हुई शोधों से जो परिणाम सामने आये हैं उनके अनुसार, इंस्टेंट नूडल पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में पोषक तत्वों को शरीर में शोषित कर पाने की स्वाभाविक क्षमता का ह्रास करता है। शरीर में आये इस दोष से अच्छा खान-पान-आहार लेने वाले बच्चे के शरीर को भी पूरा पोषण नहीं मिल पाता है और उनका विकास सही गति से नहीं हो पाता है। यही नहीं, कई शोधों में यह साबित हो चुका है कि नूडल्स में मौजूद सोडियम व एमएसजी की मात्रा गर्भवती महिलाओं की सेहत के लिए हानिकारक है। इसके बहुत अधिक सेवन से गर्भपात तक की सम्भावना हो सकती है।

नूडल्स में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अत्यधिक होती है। जबकि विटामिन, मिनिरल्स और फाइबर नूडल्स में नहीं के बराबर ही होती है। इसमें मौजूद ट्रान्स फैट और सैचुरेटेड फैट्स खाने वाले को आसानी से मोटापे का शिकार बना सकते हैं। इसी प्रकार, नूडल्स की पैकेजिंग में स्टायरोफोम का उपयोग होता है जो एक कार्सिनोजेनिक तत्व है। सरल शब्दों में, इससे नूडल्स खाने वालों में कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।

यों, इस पूरी सूची में मोनोसोडियम ग्लूटामेट सबसे भयावह है। यह वर्तमान समय में, बाजार में उपलब्ध, खाद्य-सामग्रियों में मिलाये जाने वाले दुनिया के सबसे नुकसान-दायक दस घटकों की सूची में यह शीर्ष पर स्थित है। मेयो क्लीनिक हैल्थ एडवाइजरी के अनुसार एमएसजी के सेवन से होने वाले दुष्प्रभावों की सूची में सिर-दर्द (जिसे कभी-कभी ‘एमएसजी सिर-दर्द’ के नाम से भी पुकारा जाता है); अचानक ही लगने वाली तेज गर्मी; अनियन्त्रित पसीना; चेहरे पर भारी-पन व खिंचाव की अनुभूति; मुँह के भीतर व आस-पास सुन्न-पन, सिहरन अथवा जलन; हृदय की तेज अथवा फड़-फड़ाती धड़कन; सीने में दर्द; साँसों का उखड़ना और मितली जैसी गम्भीर समस्याएँ शामिल हैं।

मोनोसोडियम ग्लूटामेट एक नॉन-एसेंशियल अमीनो एसिड है। विज्ञान की भाषा में, यह ग्लूटामिक एसिड का सोडियम लवण है जो पानी में घुलनशील है। विश्व स्वास्थ्य केन्द्र की रपट के अनुसार एमएसजी खाने वाले अनेक व्यक्तियों ने इसके दुष्परिणाम के रूप में उन्हें लकवा लगने और सूजन आने की शिकायतें भी दर्ज करायी हैं। इसका सेवन किसी-किसी व्यक्ति के लिए प्राण-घातक तक हो सकता है। यही कारण है कि स्वयं को सामाजिक रूप से जिम्मेदार समझने वाले दुनिया के ढेरों रेस्तरांओं और खाद्य-उत्पादकों ने अपने उत्पादों में एमएसजी का प्रयोग करना बन्द कर दिया है। किन्तु दुर्भाग्य से, कुछ रेस्तरां और खाद्य-उत्पादक अपने यहाँ आज भी एमएसजी का प्रयोग जारी रखे हुए हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनी नैस्ले इनमें से एक है। इसके पीछे इनका (कु)तर्क यह है कि एमएसजी दैनिक रूप से खायी जाने वाली ढेरों सब्जियों और फलों में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है। और इसलिए, इसका सेवन सर्वथा सुरक्षित है।

यद्यपि, इस सचाई को झुठलाया नहीं जा सकता है कि मोनोसोडियम ग्लूटामेट कुछ खाद्य-पदार्थों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। किन्तु समानान्तर रूप से, दूसरी सचाई यह भी है कि इन सब खाद्य-पदार्थों में एमएसजी की मात्रा इतनी अल्प होती है कि, सामान्य स्थितियों में और संतुलित रूप से सेवन किये जाने की स्थिति में, इससे शरीर को कोई हानि नहीं पहुँचती है। यहीं, यह तथ्य भी बहुत महत्व रखता है कि जब बाजार में फेके जा रहे नूडल्स जैसी प्रसंस्कृत खाद्य-सामग्रियों की बात होती है, मोनोसोडियम ग्लूटामेट से शरीर को कोई हानि नहीं पहुँचने का यह ‘प्राकृतिक’ तर्क अपना सारा सन्दर्भ खो देता है क्योंकि इन सबमें एमएसजी की मात्रा, अप्राकृतिक रूप से, प्रचुर रखी जाती है।

उदाहरण के लिए, कोकीन कोका पत्तियों में पाया जाने वाला प्राकृतिक तत्व है लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं हो जाता है कि क्लिष्ट प्रक्रियाओं द्वारा प्रॉसेसिंग करके कोका पत्तियों से निकाला किया गया यही विशुद्ध कोकीन मानव-स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित होता है। इसी तरह, प्राकृतिक रूप से उगने वाला तम्बाखू का पौधा मानव-स्वास्थ्य के लिए कतई हानि-कारक नहीं होता किन्तु यदि इसी की पत्तियों को कोई व्यक्ति यदि नियमित रूप से चबाये या उनका धूम्र-पान करे तो वह सदा-सर्वदा के लिए सुरक्षित नहीं रहेगा। उसे टीबी और कैंसर जैसे प्राण-घातक रोग हो सकते हैं। यूएचआर की ताजी शोध दर्शाती हैं कि, भले ही वे प्राकृतिक खाद्यों में कम मात्रा में पाये जाते हों, एमएसजी जैसे उत्तेजक टॉक्सिन्स मष्तिष्क को नुकसान पहुँचा सकते हैं। दरअसल, मोनोसोडियम ग्लूटामेट का प्रयोग नूडल्स में खास स्वाद को बढ़ाने के लिए किया जाता है।

मैगी में सीसाइन सारी प्रामाणिक जानकारियों के बीच, मैगी नूडल्स में सीसे और एमएसजी की खतरनाक मात्रा के पकड़े जाने पर, नेस्ले इण्डिया की ओर से कहा गया है, “हम खुद हैरत में हैं।” कम्पनी द्वारा दी गयी सफाई बड़ी रोचक है। खबरों के अनुसार कम्पनी की ओर से कहा गया है कि यदि उसके उत्पाद में सीसे जैसी कोई विकृतियाँ पायी गयी हैं तो वे पानी जैसे ‘प्राकृतिक स्रोतों से’ आयी होंगी! बिल्कुल दो टूक बात है। तर्क के लिए यदि यह मान भी लिया जाये कि नैस्ले ने जो कुछ भी कहा है वह अक्षरश: सत्य है तब भी क्या नैस्ले अपने उत्पाद की ‘खाद्य-सुरक्षा’ जैसे मानकों के पालन के बन्धन-कारी वैधानिक दायित्व से मुक्त हो जाता है? अपने खाद्य-उत्पाद में दूषित तत्वों से सराबोर, अमानक और इसलिए स्वास्थ्य के लिए हानि-कारक पानी को राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने की सम्भावना से मुक्त रखना खाद्य-उत्पादक कम्पनी की अपनी ही बन्धन-कारी जवाब-देही है।

समस्या का एक दूसरा पहलू भी है — मैगी की जाँच के परिणामों के सामने आने पर उत्तर प्रदेश की सरकार ने जब मार्च २०१४ के मैगी के पैकेटों को बाजार से वापस लेने का आदेश दिया तो मैगी नूडल्स बनाने वाली कम्पनी नेस्ले इण्डिया ने टके सा यह जवाब दे दिया कि इन पैकेटों को बाजार से वापस लेना अब सम्भव नहीं है। कम्पनी की सफाई यह है कि उस बैच के अधिकांश पैकेट्स या तो बिक चुके हैं या फिर छोटे दुकान-दारों के पास हैं जहाँ से इन्हें वापस ले पाना असम्भव है।

गम्भीर मुद्दा यह है कि देश के नागरिकों को बाजार में खुले आम बिकने वाले खाद्य-पदार्थों तथा औषधियों के प्रति निश्चिन्त रखने के लिए लम्बे-चौड़े ताम-झामों और भारी-भरकम अधिकारों के साथ खड़े किये गये खाद्य-सुरक्षा तथा औषधि प्रशासन तन्त्र क्या केवल औपचारिकताओं को पूरा करने के ही निमित्त हैं? क्या देश भर में मौजूद इस तन्त्र का प्राथमिक दायित्व यह नहीं है कि ऐसे उत्पादों के बाजार में फेके जाने से पहले ही वह यह सुनिश्चित कर ले कि वे मानव-स्‍वास्थ्य की सुरक्षा के प्रत्येक मान-दण्ड पर पर्याप्त सुरक्षित हैं? ऐसी जाँच-परख के बाद ही, उन तमाम खाद्य तथा औषधि उत्पादों को उत्पादक फैक्टरी से बाहर किया जाना सुनिश्चित करना होगा। बैच-दर-बैच उत्पादों के लिए प्रमाण-पत्र जारी किये जाने से पहले ही यदि कोई खाद्य अथवा औषधि उत्पाद भण्डारण के लिए फैक्टरी से बाहर आता है या फिर बिक्री के लिए उसे बाजार में उपलब्ध करा दिया जाता है तो भारी-भरकम दाण्डिक राशि की वसूली के साथ ही, बिना किसी नरमी के, उत्पादक-विशेष को दी गयी किसी भी प्रकार की उत्पादन-अनुमति को, बिना छूट दिये, कम से कम एक दशक के लिए बाधित कर दिया जाना चाहिए।

लगभग तीन दशक पुराने एक समाचार की धुँधली सी याद मेरी चेतना में आज भी कायम है। मुझे याद आ रहा है कि मैगी के बाजार में छा जाने के उस दौर में नैस्ले ने बच्चों को विशेष रूप से टार्गेट किया था। बच्चों की पसन्द को ले कर मैगी के बड़े एग्रेसिव विज्ञापन सब दूर छाये हुए थे। तब किसी ने मैगी से बच्चों पर पड़ने वाले भयावह दुष्प्रभावों को ले कर न्यायालय के दरवाजे खट-खटाये थे। सम्भवत: सर्वोच्च न्यायालय के। तमाम भारी-भरकम दलीलों के बाद भी तब नैस्ले ने मुँह की खायी थी। तब, न्यायालयीन आदेश से नैस्ले को प्रचार-प्रसार के माध्यमों में मैगी के विज्ञापन देने से रोक दिया गया था। यह रोक सालों-साल कायम भी रही। लेकिन कम व्यक्ति ही जानते होंगे कि फिर ऐसा ना जाने क्या हुआ कि मैगी नये सिरे से प्रचार-प्रसार की दुनिया में छा गयी?

(२३ मई २०१५)