केजरी ‘जंग’ : केवल अहं की लड़ाई नहीं

Sarokar

केजरीवाल एक नये किस्म की अराजकता के बीज बो रहे हैं। देश की सम्प्रभुता को चोटिल कर एक क्षत्रप सम्प्रभु सत्ता के निर्माण की एक नयी सोच दे रहे हैं। वे शायद इसे दिल्ली के बाहर भी विस्तार देने का इरादा रखते हैं। कहीं यह देश को एक नये किस्म के नक्सल-वाद की ओर बढ़ाने का संकेत तो नहीं है?

दिल्ली के निर्वाचित मुख्य मन्त्री अरविन्द केजरीवाल और मनोनीत उप-राज्यपाल नजीब जंग के बीच का विवाद प्रजा-तन्त्र की सारी वैध सीमाएँ लाँघ चुका है। एलजी द्वारा एक अधिकारी की काम-चलाऊ नियुक्ति से आरम्भ हुआ मुद्दा विवाद बना तो मुख्य मन्त्री की ओर से आनन-फानन में दूसरे अधिकारी की बर्खास्तगी का विवाद भरा आदेश जारी हो गया। विवाद और बढ़ा तो ‘गधे से जीत न पाने पर गधैया के कान मरोरने’ की तर्ज पर मुख्य मन्त्री के आदेश से सचिवालय के उस अधिकारी के कार्यालय पर ताला जड़ दिया गया जिसके हस्ताक्षर से एलजी का आदेश जारी हुआ था।

विवाद के इस स्तर को शोभनीय तो नहीं कहा जा सकता फिर भी आरम्भ के दिनों में यह भारतीय लोक-तन्त्र के गण-तन्त्रीय ढाँचे पर यदा-कदा सिर उठाने वाली राजनैतिक बहसों की वैधानिक सीमा के भीतर ही रहा आया। इसी बीच, केन्द्रीय गृह राज्य मन्त्री किरेन रिजीजू ने इसमें, अनावश्यक रूप से, पूर्वोत्तर में बसने वाले भारतीयों के अपमान का एक घिनौना थिगड़ा भी केवल इसलिए जोड़ डाला क्योंकि दस दिनों के लिए मुख्य सचिव के पद की एलजी की पसन्द देश के उस पूर्वोत्तर क्षेत्र से हैं रिजूजू भी जहाँ के मूल निवासी हैं!

बात यहीं तक आ कर भी ठहर जाती तो गनीमत होती। ‘दिल्ली में असली सरकार किसकी है — निर्वाचित मुख्य मन्त्री की या फिर मनोनीत हो कर पदस्थ हुए उप-राज्यपाल की?’ एक घोनौनी बहस नहीं है। घिनौना तो वह सोच है जिसको ले कर यह बहस एक अन्त-हीन दिशा में खींची जा रही है। बात-बात में मचल उठने वाले उस जिद्दी बच्चे की तरह जिसकी माँगों में तर्क और औचित्य का कोई स्थान नहीं होता। या तो केवल एक बचकानी जिद होती है। शायद चाँद को आकाश से तोड़ कर उसके हाथ में पकड़ा देने की बाल-हठ की तरह। या फिर कोई गहरा षडयन्त्र होता है। अपने खोखले अहं की तुष्टि के लिए अथवा अपने किसी निहित सोच की पूर्ति के लिए।

फिर एक दिन, एलजी द्वारा कुछ विशिष्ट अधिकारियों की ‘नियुक्ति व बर्खास्तगी के दिल्ली के सीएम के अधिकारों को स्पष्ट करने’ को ले कर प्रदेश सरकार को लिखे गये पत्र के परोक्ष से जवाब में उप मुख्य मन्त्री मनीष सिसौदिया यह कहते दिखलाये गये कि बीते सालों दिल्ली में करोड़ों की ‘ट्रान्सफर-पोस्टिंग इण्डस्ट्री’ चल रही थी जिस पर आप सरकार ने बीते तीन महीनों में खासी प्रभावी नकेल डाली है। और, केजरीवाल सरकार का सारा विरोध इसी कारण से हो रहा है।

आरोप गम्भीर है और सब समझ भी रहे हैं कि निशाने पर कौन है? लेकिन हर समझ-दार जानता है कि उनके कथन पर गम्भीर सवाल उठने पर सिसौदिया यह कह कर आराम से पतली गली से निकल जायेंगे कि उन्होंने तो बीते समय के उस ‘सिस्टम’ का मुखौटा उघारा था, किसी व्यक्ति-विशेष पर कोई वैयक्तिक टिप्पणी नहीं की थी।

इस पूरे विवाद में मीडिया भी दो-फाड़ हो गया दिख रहा है। एक धड़ा संविधान की दुहाई देता दिख रहा है तो दूसरा निर्वाचन की ताकत से पदस्थ हुई सरकार की बेचारगी का सियापा पढ़ रहा है। सवाल उठाया जा रहा है कि विशाल जन-मत की कीमत क्या केवल इतनी रह गयी है कि उसके समर्थन से निर्वाचित सरकार शपथ भर ले सके? मीडिया के कुछ धुरन्धर जो समझ रहे हैं कि संवैधानिक रूप से उप-राज्यपाल निश्चित रूप से सही हैं; दबी जुबान सुझा रहे हैं कि भले ही संविधान और उसके प्रावधान सच-मुच ही वैसे हों जैसे एलजी उन्हें दिखला रहे हैं, क्या दिल्ली की निर्वाचित सरकार को कुछ कार्य-कारी गुंजाइशें दी नहीं जा सकती हैं? ये विद्वान भूल रहे हैं कि, संवैधानिक रूप से, अरविन्द केजरीवाल ने अपने आप में पर्याप्त सीमित से अधिकारों वाली सरकार बनाने के लिए ही जन-समर्थन पाया था। और इसलिए वे, विशाल जीत की दुहाई दे कर, केन्द्र-शासित दिल्ली की संवैधानिक क्लिष्टताओं को दफ़ना या भुला नहीं सकेंगे। गण-तन्त्र की दुहाइयाँ दे कर भी नहीं।

इन क्लिष्टताओं को ठीक से समझने के लिए, किसी भी पक्ष का हिस्सा बने बिना, यह समझ लेना आवश्यक है कि दिल्ली-विवाद का यह वृक्ष कितना पुराना है? यह स्पष्ट होना भी इतना ही महत्व-पूर्ण है कि सारे विवाद की असली जड़ क्या है?

दरअसल, स्वतन्त्रता के मिलने के बाद, देश में गण-तान्त्रिक प्रणाली की स्थापना कर, एक बड़े भू-भाग को प्रदेशों के रूप में परिभाषित कर वहाँ विधान सभाएँ और राज्य सरकारें भी गठित कर दी गयीं। किन्तु फिर भी, पर्याप्त भू-भाग ‘प्रदेश’ की इस गण-तान्त्रिक परिभाषा में शामिल नहीं किया गया। उस समय हिमाचल, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम, अरुणांचल, पाण्डुचेरी, गोआ, दमन, दिवु, दिल्ली, चण्डीगढ़, अण्डमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली जैसे क्षेत्रों को केन्द्र-शासित क्षेत्र की विशेष श्रेणी में रखा गया था। बाद में उसमें किये गये चौदहवें संशोधन के अन्तर्गत्‌ संविधान में धारा २३९(ए) जोड़ी गयी जिसके माध्यम से दिल्ली, चण्डीगढ़, अण्डमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली जैसे क्षेत्रों को छोड़ कर बाकी के केन्द्र-शासित क्षेत्रों में स्थानीय विधायी निकाय अथवा मन्त्रि-परिषद्‌ या फिर दोनों का प्रावधान किया गया। आगे जा कर इन्हें पूर्ण राज्य का दर्जा भी मिल गया। किन्तु, दिल्ली, चण्डीगढ़, अण्डमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली जैसे क्षेत्र केन्द्र-शासित क्षेत्र बने रहे।

वैसे, स्वतन्त्रता के बाद से दिल्ली के राजनैतिक व प्रशासनिक ढाँचे में अनेक बदलाव आये हैं। स्वतन्त्रता-पूर्व की दिल्ली में अनेक म्युनिसिपेल्टियाँ हुआ करती थीं तथा इन सबका प्रशासनिक अधिकार चीफ़ कमिश्नर के पास था। स्वतन्त्र-प्राप्ति के बाद, गवर्नमेण्ट ऑफ़ पार्ट सी स्टेट्स एक्ट, १९५१ के तहत्‌ दिल्ली को ‘पार्ट-सी’ राज्य का दर्जा दिया गया। यों, पार्ट-सी राज्यों को मिले विधायी अधिकार सीमित ही थे; फिर भी पार्ट-सी स्टेट्स एक्ट, १९५१ की धारा २१ के परन्तुक से पता चलता है कि दिल्ली विधान सभा के अधिकारों में अतिरिक्त रूप से कटौती की गयी थी।

इसके बाद, राज्य पुनर्गठन आयोग (१९५५) के सुझावों को लागू करते हुए, १ नवम्बर १९५६ से दिल्ली का पार्ट-सी राज्य का दर्जा समाप्त कर दिया गया। दिल्ली विधान सभा तथा मन्त्रि-परिषद्‌ भंग कर दी गयी। इसके साथ ही दिल्ली ऐसे केन्द्र शासित क्षेत्र में बदल गयी जिसका प्रशासनिक नियण्त्रण सीधे राष्ट्रपति के हाथ में आ गया। इस व्यवस्था का सीधा व सरल तात्पर्य यह है कि दिल्ली सीधे-सीधे राष्ट्रपति के ‘प्रजातान्त्रिक साम्राज्य’ के तले ला दी गयी। यद्यपि, इसी आयोग के एक दूसरे महत्व-पूर्ण सुझाव के अनुसार, बाद में, दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन एक्ट, १९५७ पारित किया गया जिसके अनुसार पूरे दिल्ली क्षेत्र के लिए म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन का गठन हुआ जिसके सदस्यों के चुनाव का अधिकार वयस्क मत-दाताओं को सौंप दिया गया।

इसमें दो मत नहीं कि राज्य का दर्जा पाने से बच रहे केन्द्र-शासित क्षेत्रों में दिल्ली की स्थिति अतिरिक्त रूप से महत्व-पूर्ण थी। अतिरिक्त रूप से क्लिष्ट भी। जहाँ एक ओर, भारतीय गण-तन्त्र की संवैधानिक सम्प्रभुता के औसतन प्रतीक, भौगोलिक रूप से, दिल्ली में ही स्थित हैं। और इस कारण से यहाँ की भौगोलिक और व्यवहारिक, दोनों ही, सत्ताएँ केन्द्रीय सरकार में विहित रखना एक बन्धन-कारी विवशता है। वहीं दूसरी ओर, दिल्ली में बैठ कर भारत की केन्द्रीय सत्ता का दायित्व सम्हालने वाले अधिकांश राजनैतिक दिग्गज दिल्ली से बाहर के क्षेत्रों से आते हैं। यह राजनैतिक वास्तविकता स्थानीय राजनैतिक क्षत्रपों की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का एक बड़ा रोड़ा थी। विशेष रूप से तब, जब वे यह अनुभव करते थे कि राज्यों के रूप में स्थापित हो चुके अन्य क्षेत्रों के स्थानीय राजनेता कितने आत्म-विश्वास के साथ दिल्ली के सत्ता-नशीनों को नाकों चने चबवा पाते थे। स्थानीय क्षत्रप जानते थे कि इन स्थितियों में दिल्ली के स्थानीय निवासी हो कर भी दिल्ली की सत्ता के गलियारों में वे महज दोयम दर्जे के हो कर ही रहेंगे।

यहीं से दिल्ली की स्वायत्तता की माँग ने जोर पकड़ा। दिल्ली के लिए, विस्तृत धरातल के साथ, एक प्रजा-तान्त्रिक ढाँचे की माँग के लिए, स्थानीय निवासियों के सहयोग से, दिल्ली के राजनैतिक क्षत्रपों ने अपना यह दबाव तब तक बनाये रखा जब तक कि दिल्ली प्रशासन अधिनियम, १९६६ के अन्तर्गत्‌ दिल्ली के लिए एग्जीक्यूटिव काउन्सिल के साथ एक अन्तरिम मेट्रोपॉलिटन काउन्सिल के गठन की घोषणा नहीं कर दी गयी। इस अधिनियम के प्रावधान सितम्बर १९६६ में लागू हुए और, समझौते के रूप में, संस्था-गत्‌ रूप से दिल्ली मेट्रोपॉलिटन काउन्सिल अस्तित्व में आयी। यद्यपि यह मेट्रोपॉलिटन काउन्सिल दिल्ली की सर्वोच्च निर्वाचित संस्था थी फिर भी इसे दिल्ली प्रशासन की विचार-विमर्श शाखा कहना अधिक उचित होगा। यह एक तरह का समझौता फार्मूला था जिसके माध्यम से पूरे विधायी व आर्थिक अधिकारों के साथ गठित होने वाली प्रतिनिधित्व-पूर्ण संस्था और, अपने नामित प्रतिनिधि के माध्यम से, राष्ट्रपति के प्रशासनिक अधिकारों के बीच का एक सुलभ रास्ता खोजा गया था।

यहीं, ‘द गवर्नमेण्ट ऑफ़ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ़ देहली एक्ट, १९९१’ के भाग पाँच में दिल्ली की मन्त्रि-परिषद्‌ और उप-राज्यपाल के बीच अधिकारों से सम्बन्धित प्रावधानों के निम्न अंश को भी जान लेना आवश्यक है। इसमें उन मामलों को स्पष्ट किया गया है जिनमें उप-राज्यपाल अपने विवेक के आधार पर निर्णय ले सकेंगे —

धारा ४१ की उपधारा (२) के अनुसार ऐसे किसी प्रश्न के उत्पन्न होने की स्थिति में कि कोई विषय-वस्तु उप-राज्यपाल के अधीन है अथवा नहीं है यदि कानून के द्वारा अथवा उसके तहत्‌ यह अपेक्षा है कि उप-राज्यपाल उस पर अपने विवेक के अनुसार निर्णय लें, तो उप-राज्यपाल का निर्णय अन्तिम होगा।

धारा ४१ की उपधारा (३) के अनुसार ऐसे किसी प्रश्न के उत्पन्न होने की स्थिति में कि कोई विषय-वस्तु उप-राज्यपाल के अधीन है अथवा नहीं है यदि कानून के द्वारा अथवा उसके तहत्‌ यह अपेक्षा है कि उप-राज्यपाल उस पर न्यायिक अथवा अर्ध-न्यायिक कार्यवाही करें, तो उप-राज्यपाल का निर्णय अन्तिम होगा।

उपर्युक्त दोनों प्रावधान आज छेड़ी गयी सारी संवैधानिक बहस को सर्वथा निरर्थक रूप से खड़ा किया गया विवाद ठहराने के लिए पर्याप्त हैं। उप-राज्यपाल के राष्ट्रपति के प्रतिनिधि होने के दो टूक तथ्य को उपर्युक्त प्रावधानों के साथ रख कर पढ़ने से दिल्ली के राष्ट्रपति के अधीन होने की भी पुष्टि हो जाती है। सम्भवत:, यही कारण है कि जब केजरीवाल ने राष्ट्रपति से भेंट कर अपना दु:खड़ा रोया था तब महामहिम ने उन्हें ‘देखते हैं कि क्या कर सकते हैं’ जैसा आश्वासन देने से आगे का कोई ठोस भरोसा नहीं दिया था।

इन सारी स्पष्टताओं के प्रकाश में, उप-राज्यपाल द्वारा दिल्ली के मुख्य सचिव के पद पर, केवल दस दिनों के लिए, दिल्ली प्रशासन में ही नियुक्त एक आईएएस की नियुक्ति को विवाद के झंझावात में झौंक देने का अरविन्द केजरीवाल का व्यवहार भारतीय लोक-तन्त्र पर किसी बड़े खतरे के आने की ओर ही संकेत करता है। वे, स्थानीय जन के बीच, इस विवाद को भारतीय गण-तन्त्र पर केन्द्रीय सत्ता के कुठाराघात की तरह परोस रहे हैं। लोक-तन्त्र में, विशेष रूप से गण-तान्त्रिक लोक-तन्त्र में, अनेक वैचारिक धुरियों को सहज स्वीकार किया जाता है। और यही स्वीकृति गहरी से गहरी राजनैतिक असहमतियों को जन्म देती है। आम नागरिक की दृष्टि से देखें तो, यही असहमतियाँ उसके लिए वैकल्पिक चयन की अपार सम्भावनाओं को खोलती हैं। किन्तु, प्रजा-तान्त्रिक रहते हुए अपनी इच्छित राजनीति करने वालों का अमर्यादित रूप से असहन-शील होना भारत जैसे लोक-तान्त्रिक गण-तन्त्र में कतई अस्वीकार्य है।

लगता है, दिल्ली में केजरीवाल एक नये किस्म की अराजकता के बीज बो रहे हैं। देश की सम्प्रभुता को चोटिल कर एक क्षत्रप सम्प्रभु सत्ता के निर्माण की एक नयी सोच दे रहे हैं। वे शायद इसे दिल्ली के बाहर भी विस्तार देने का इरादा रखते हैं। तो, कहीं यह देश को एक नये किस्म के नक्सल-वाद या फिर नये किस्म की कोई आतंकी सोच की ओर बढ़ाने का संकेत तो नहीं है? क्या केजरीवाल की आज की बेचैनी उनके इस सोच की प्रसव-पीड़ा का ही कोई अबूझ संकेत है? दिल्ली विधान सभा के, उप-राज्यपाल तथा उनके बहाने केन्द्रीय सरकार की आलोचना करने के लिए, आहूत दो दिनी विशेष सत्र में केजरीवाल के भाषण की भाषा तथा उनके भाषण की विषय-वस्तु के साथ ही दिल्ली के निवासियों व दिल्ली सरकार की सेवा में पदस्थ विभिन्न सरकारी अधिकारियों से किये गये उनके आह्वान का लब्बो-लुबाब ऐसा था जैसे मंगल पाण्डे का पुनर्जन्म हुआ हो और वह सत्ता से द्रोह करने के लिए लोगों के जमीर को ललकार रहा हो। यही नहीं, वह ‘सत्ता’ को परिणामों को भुगतने के लिए तैयार रहने की चुनौती भी दे रहा हो। तो क्या, जैसा दिख रहा, और दिखाया भी जा रहा है, केजरीवाल का दिल्ली-विवाद एक व्यक्ति के अहं की लड़ाई से बहुत आगे कोई दूसरी गहरी राजनैतिक चाल है?

स्पष्ट है, परिस्थितियाँ पर्याप्त बिगड़ चुकी हैं। संवैधानिक सीमा में स्वीकार्य सारी मर्यादाएँ मटिया-मेट हो गयी हैं। इतनी कि, दिल्ली में अधिकारों के बँटवारे को ले कर एक सर्वांगीण संवैधानिक समीक्षा का नये सिरे से किया जाना अब अपरिहार्य हो गया है। ऐसे में, बौद्धिक क्षमता के साथ सार्थक सोच रखने वाले जिम्मेदार नागरिकों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि महान परम्परा रखने वाली हमारी न्याय-प्रदाय प्रणाली जो दिल्ली की सड़क पर यातायात-पुलिस और दो-पहिया चालक महिला के बीच ईंट उठाने जैसी घटना का स्वयं ही संज्ञान ले लेती है, संवैधानिक अधिकारों के नाम पर मूल्यों को इतना गिरा कर चलाये जा रहे विवाद का स्वयं ही संज्ञान क्यों नहीं ले रही है? वह भी तब जब दिल्ली की भौगोलिक और प्रशासनिक क्लिष्टताएँ गहरे न्यायिक विश्लेषण की बड़ी आतुरता से बाट जोह रही हैं।

यद्यपि ताजे समाचार यह हैं कि जहाँ दिल्ली में अधिकारों के बँटवारे को ले कर किये अपने नोटिफ़िकेशन पर दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा की गयी एक विशेष टिप्पणी को ले कर केन्द्रीय सरकार ने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खट-खटाया है वहीं दिल्ली सरकार ने भी इसी नोटिफ़िकेशन की वैधानिकता को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दे डाली है। सुनवाइयाँ होनी हैं और इसलिए इन मुद्दों को उनमें आने वाले न्यायिक फैसलों तक सार्वजनिक बहसों में नहीं उठाना ही श्रेयस्कर होगा। फिर भी, औसत समझ यही है कि इन न्यायिक अपीलों के निर्णय का ऊँट चाहे जिस करवट बैठे, दिल्ली-प्रशासन में अधिकारों के बँटवारे की सर्वांगीण संवैधानिक समीक्षा का तात्विक पक्ष अन-सुलझा ही छूटेगा। यह इसलिए क्योंकि दोनों पक्षों के बीच होने वाली अधिकांश बहस केवल दिल्ली के एण्टी करप्शन ब्यूरो पर नियन्त्रण के अधिकार पर ही केन्द्रित होगी। दिल्ली में प्रशासनिक अधिकारों और दायित्वों की समझ-सफाई में मदद दे सके ऐसे किसी व्यापक न्यायिक हस्तक्षेप की औपचारिक माँग नहीं की गयी है।

(२८ मई २०१५)