क्या संदिग्ध है सूचना-प्रदाय में सूचना आयुक्त की भूमिका?

Bahas

स्वयं आयुक्त यह कहते हुए देखे गये हैं कि आदेश पारित करने के बाद से उनको अपनी जान का खतरा दिखने लगा है! सवाल यह है कि जो कोई भी धमकी दे रहा है वह सीधे-सीधे सूचना आयुक्त से इतना नाराज क्यों है? और, जानकारी माँग कर मामले को खोद निकालने वाले आवेदक को उसने बख्श क्यों दिया है?

केदारनाथ-त्रासदी के बाद राहत के नाम पर हुए करोड़ों के घोटाले का भण्डा-फोड़ एक बड़ी खबर है। यह भण्डा-फोड़ सूचना का अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत्‌ मिली जानकारी से हुआ है, यह बात आरटीआई की उपयोगिता को प्रमाणित करती है। मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग द्वारा रह-रह कर किये जाने वाले ऐसे दावों के बाद भी, कि सूचना पाने के अधिकांश आवेदन निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए ही किये जाते हैं।

केदारनाथ त्रासदी-राहत घोटाले में ताजी महत्व-पूर्ण खबर यह है कि उत्तराखण्ड के कांग्रेसी मुख्य मन्त्री हरीश रावत ने मामले को सीबीआई को सौंपने से मना कर दिया है। उनका अपना तर्क है कि सीबीआई ऐसे मामलों को हाथ में नहीं लेती है। ध्यान में रखने वाली बात यहाँ यह है कि उस त्रासदी के समय प्रदेश और केन्द्र दोनों में कांग्रेसी सरकारें थी। उत्तराखण्ड में विजय बहुगुणा की, और केन्द्र में मनमोहन सिंह की।

लेकिन इन सारी खबरों के बीच ‘बिटवीन द लाइन्स’ एक खबर और भी है। वह यह कि सूचना अधिकारियों से सूचना के मिलने पर घोटाले को गम्भीर ठहराते हुए उसकी सीबीआई जाँच की जो माँग की गयी है उसको करने वाले और कोई नहीं बल्कि राज्य के सूचना आयुक्त हैं। और यह स्थिति, आरटीआई प्रकरणों पर गम्भीर खुली बहस को आमन्त्रित करती है — सूचना-प्रदाय की प्रक्रिया में सूचना आयुक्तों की भूमिका के संदिग्ध होने की, धूमिल सी ही सही, किसी सम्भावना की बहस

जो खबरें सामने आयी हैं उनके अनुसार त्रासदी-राहत घोटाले के दस्तावेजों के आवेदक को मिलने में लगभग दो साल लगे। आवेदन और अपीली प्रक्रिया को ध्यान में रख कर देखें तो समझ में आ जाता है कि द्वितीय अपीली आवेदन को लगाने में इसमें से अधिक से अधिक पाँच महीने ही बेकार हुए होंगे। अर्थात्‌, बाकी का पूरा समय सूचना आयोग द्वारा आवेदक को सूचना देने के लिए दिये गये आदेश के आने की प्रतीक्षा में गया।

सवाल यह है कि, जब आयुक्त महोदय समझ रहे थे कि माँगी गयी जानकारी कितनी महत्व-पूर्ण है तब आयोग द्वारा इतना समय लगाने के पीछे किसकी मंशा की भूमिका महत्व-पूर्ण थी? आयोग कार्यालय की या स्वयं किसी सूचना आयुक्त की ही? इन्हीं सवालों की गुत्थी में एक और गहरा सवाल गुँथा हुआ मिल जाता है। वह यह कि, जानकारी माँगने वाला व्यक्ति राज्य का सूचना आयुक्त नहीं बल्कि कोई और नागरिक था।

ऐसी स्थिति में, वैधानिक रूप से, अपने द्वितीय अपीली निर्णय के माध्यम से माँगी गयी सूचना आवेदक को उपलब्ध कराने का आदेश देने से आगे केवल सम्बन्धित सूचना आयुक्त ही नहीं बल्कि समूचे आयोग की भी कोई भूमिका तब तक बाकी नहीं बचती है जब तक कि आवेदक की ओर से ऐसा कोई आवेदन प्राप्त नहीं हो जो आयोग के हस्तक्षेप की माँग करता हो। किसी भी संशय से परे, इस स्थिति का निहितार्थ यही है कि, सामान्य स्थिति में, न तो आयोग को और ना ही निर्णय देने वाले आयुक्त को यह पता हो सकता है कि लोक सूचना अधिकारी ने आवेदक को जो जानकारी दी है उसके विस्तृत तथ्य वास्तव में क्या हैं?

जबकि, इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। सूचना आयुक्त ने जिस तरह से स्वयं आगे बढ़ कर सीबीआई जाँच की माँग की है उससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने आवेदक को उपलब्ध करायी गयी सारी सामग्री का बारीकी से अध्ययन किया था। और यह संवैधानिक रूप से प्रतिष्ठित हुए एक जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा की गयी अनधिकार चेष्ठा का ही एक प्रामाणिक उदाहरण है।

यहीं, उत्सुकता-भरा यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि क्या निर्णय पारित करने में जो देर हुई उसमें आयुक्त महोदय के इस भरोसे ने तो अपनी कोई गुप्त भूमिका अदा नहीं कि माँगी गयी जानकारी से किसी गहरे घोटाले का पर्दा-फाश हो सकता है? और यदि, इस उत्सुकता का निवारण सकारात्मक हो तो इससे उत्सुकता-भरा एक नया सवाल उपजता है कि क्या निर्णय देने से पहले आयुक्त महाशय लोक सूचना अधिकारी या फिर प्रथम अपीली अधिकारी से किसी प्रकार के निजी सम्पर्क भी थे? स्वयं आयुक्त एक टीवी चैनल को दिये गये साक्षात्कार में यह कहते हुए देखे गये हैं कि आदेश पारित करने के बाद से उनको अपनी जान का खतरा दिखने लगा है! ऐसा खतरा जिसकी बात जानकारी माँगने वाले ने कभी नहीं की। इस खतरे से सुरक्षा देने की भी नहीं।

यदि यह बातें सच हैं तो सवाल यह है कि जो कोई भी धमकी दे रहा है वह सीधे-सीधे सूचना आयुक्त से ही इतना नाराज क्यों है? और, आखिरी सवाल यह भी कि जानकारी माँग कर मामले को खोद निकालने वाले आवेदक को उसने बख्श क्यों दिया है?

(३१ मई २०१५)