सूचना के अधिकार को तिलांजलि देता राज्य सूचना आयोग

Sarokar

आयोग की कार्य-शैली आरम्भ से ही दूषित रही है। इसके प्रामाणिक उदाहरण भी सामने आते रहे हैं। इन्हीं प्रमाणों में कुछ ‘माननीयों’ पर लगे ‘स्वार्थ-सिद्धि’ के अत्यन्त गम्भीर आरोप भी सामने आ चुके हैं। जिन पर आरोप लगे हैं, उनमें से अनेक के पास स्वयं को निर्दोष प्रमाणित करने लायक जमीन भी उपलब्ध नहीं है।

पिछले सप्ताह सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ से जुड़े कुछ महत्व-पूर्ण समाचार प्रकाशित हुए। अलग-अलग व्यक्तियों के सन्दर्भों में आये यह समाचार मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग में पदस्थ आयुक्तों पर, उनकी अधिनियम के उद्देश्य तथा अधिनियम की मंशा की वैधानिक समझ को ले कर, गम्भीर बहस खड़ी करने के लिए पर्याप्त आधार देने वाले समझ पड़ते हैं।

सबसे पहले, मुख्य सूचना आयुक्त के डी खान की पीठ से आये एक फैसले की बात करते हैं। अधिनियम के माध्यम से सूचना पाने की मंशा पालने वाले आम नागरिक के लिए मुख्य सूचना आयुक्त की पीठ से आये समाचार की समीक्षा एक मील का पत्थर होगी। क्योंकि यह समीक्षा उसके मन में अधिनियम के उपयोग में आने वाले रोड़ों से उपज रही निराशा को बड़ी सीमा तक कम करेगी।

समाचार है कि भोपाल (म० प्र०) के अति सक्रिय आरटीआई कार्यकर्ता अजय दुबे ने प्रदेश के सामान्य प्रशासन विभाग के सचिवालय में अधिनियम के अन्तर्गत्‌ सूचना-प्रदाय का एक आवेदन २००९ में लगाया था। लोक सूचना अधिकारी ने तो माँगी गयी जानकारी देने से मना कर दिया किन्तु प्रथम अपीली अधिकारी ने उसके निर्णय को अमान्य कर आवेदक को जानकारी देने का आदेश पारित कर दिया। किन्तु, आदेश के बाद भी जहाँ एक ओर सूचना अधिकारी ने जानकारी प्रदान नहीं की वहीं दूसरी ओर विभाग की ही सचिव वीणा राणा ने सूचना आयोग में प्रथम अपीली अधिकारी के आदेश को चुनौती दे दी। इस प्रकरण की सुनवाई मुख्य सूचना आयुक्त ने की और फैसला दिया कि मांगी गयी जानकारी नहीं दी जा सकती है। प्रकाशित समाचार के अनुसार, फैसले में इसका कारण बतलाते हुए कहा गया है कि माँगी गयी जानकारी लोक-हित में नहीं है।

आगे कुछ भी कहने से पहले यह बतलाना महत्व-पूर्ण है कि आवेदक ने आखिर ऐसा क्या माँग लिया जो लोक-हित के दायरे से बाहर हो गया? माँग की जो जानकारी समाचार के माध्यम से सार्वजनिक हुई है उसमें, तार्किक रूप से, एक भी बिन्दु ऐसा नहीं समझ आता है जो किसी व्यक्ति-विशेष की ऐसी किसी निजता का हनन करता हो जिसके आधार पर अधिनियम के प्रावधान वांछित जानकारी को अदेय ठहरा सकें। इसका स्वाभविक निहितार्थ यह है कि सूचना अधिकारी द्वारा माँगी गयी जानकारी देने से केवल इस आधार पर मना किया गया कि जानकारी के उजागर होने से प्रशासन-विशेष की वह मंशा-विशेष उजागर हो सकती है जिसके अन्तर्गत्‌ कुछ विशेष अधिकारियों के विरुद्ध संभावित प्रशासनिक कार्यवाही को लटका या फिर भुला कर उन्हें उपकृत किया जा रहा हो। जाहिर है, यदि कुछ उजागर होता है तो वह केवल यह कि कौन-कौन से ‘बड़े’ अधिकारी दोषियों को संरक्षित करने में कानून और तन्त्र की व्यवस्था को अंगूठा दिखाने में लगे हुए हैं।

माँगी गयी जानकारीसूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्वयं अधिनियम में ही स्पष्टीकरण है कि लोकतन्त्र शिक्षित नागरिक वर्ग तथा ऐसी सूचना की पारदर्शिता की अपेक्षा करता है जो उसके कार्यकरण के साथ ही साथ भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सरकारों तथा उनके परिकरणों को शासित के प्रति उत्तरदायी बनाने के लिए अनिवार्य है। अजय दुबे माँगी गयी जानकारी का क्या दुरुपयोग और/अथवा सदुपयोग करते यह तो समय ही बतलाता किन्तु सतही रूप से, उनके द्वारा माँगी गयी जानकारी अधिनियम के घोषित उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हो सकती है, इसमें दो राय नहीं।

यह दूसरा समाचार भी दूर-गामी तथा गहरे अर्थ रखता है —

आयोग का राडार
जाहिर है, आयोग के हवाले से आयी इन दोनों खबरों में सचाई का यदि अंश भी है तो यह अधिनियम के उद्देश्यों और उसकी मंशा पर कुठाराघात होगा। दुर्भाग्य से, यह कुठाराघात स्वयं उनके द्वारा होगा जो अधिनियम की मंशा और उसके उद्देश्यों को संरक्षित रखने वाले तमाम औजारों की पहरे-दारी, और उनके प्रयोग के भी, पवित्र दायित्व के लिए संवैधानिक संरक्षण दे कर नियुक्त किये गये हैं।

इस दुर्भाग्य-जनक स्थिति का एक निहितार्थ जहाँ यह हो सकता है कि ऐसी सारी नियुक्तियों के लिए सरासर रूप से अपात्रों का चयन किया गया वहीं इसका दूसरा निहितार्थ यह भी सम्भव है कि इन नियुक्तियों से उपकृत हुए व्यक्ति स्वयं ही निहित स्वार्थी खेल खेल रहे हैं। वह भी एकदम खुले हाथों।

खण्डनयहाँ इतना जान लेना भी आवश्यक है कि अधिनियम की धारा ६ की उपधारा (२) में, किसी भी संशय से परे, यह निर्देश है कि सूचना की प्राप्ति के लिए अनुरोध करने वाले आवेदक से न तो उसके अनुरोध का कोई कारण पूछा जा सकेगा और ना ही उससे, संपर्क करने के लिए आवश्यक होने वाले विवरण के अतिरिक्त, अन्य किसी व्यक्ति-गत्‌ विवरण की अपेक्षा की जा सकेगी। इसके बाद, आयोग की कार्य-शैली और उसकी नीयत पर कहने के लिए आगे और कुछ बचता ही नहीं है। और क्योंकि आयोग में विराज-मान एक से एक धुरन्धरों को भी यह बात समझ में भी आ गयी इसलिए आनन-फानन में म० प्र० राज्य सूचना आयोग के अवर सचिव पराग करकरे का एक खण्डन प्रकाशन के लिए आ गया। यद्यपि, सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ के माध्यम से जानकारियों को पाने का प्रयत्न करने वाले कतिपय व्यक्तियों की निगरानी करने की मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग की मंशा से जुड़ी खबर के खण्डन की जानकारी अपने आप में बड़ी खबर है। झूठ को सच ठहरा पाने के किसी खयाली पुलाव की तरह।

आयोग की अपनी कार्य-शैली आरम्भ से ही दूषित रही है। इसके प्रामाणिक उदाहरण भी सामने आते रहे हैं। इन्हीं प्रमाणों में कुछ ‘माननीयों’ पर लगे ‘स्वार्थ-सिद्धि’ के अत्यन्त गम्भीर आरोप भी सामने आ चुके हैं। जिन पर आरोप लगे हैं, उनमें से अनेक के पास स्वयं को निर्दोष प्रमाणित करने लायक जमीन भी उपलब्ध नहीं है। गैर सरकारी सामाजिक संगठन सजग ने तो २००९ में एक पुस्तक ‘नो कमेण्ट्स’ नाम से प्रकाशित कर इनमें से अनेक आरोपों को प्रामाणिक रूप से सार्वजनिक किया था। जिसके आधार पर मुख्य आयुक्त सहित एकाधिक आयुक्तों के आचरण पर ऐसी उँगलियाँ भी उठी थीं जिनके द्वारा उनकी बर्खास्तगी तक की माँगें की जाने लगी थीं।

ऐसे में, द्वितीय अपीलों को किसी ना किसी बहाने निरस्त करना म० प्र० राज्य सूचना आयोग और उसमें पदस्थ कतिपय आयुक्तों का सबसे बड़ा हथियार रहता आया है। और क्योंकि, अधिनियम की मंशा तथा उसके उद्देश्य को आघात पहुँचाने वाली ऐसी घटनाओं की श्रृंखला अब पर्याप्त लम्बी हो चुकी है, आयोग के भीतर, अपनी साख को पहुँचने वाले वास्तविक संकट का सामना करने का साहस नहीं बच रहा है। सम्भव है, इसीलिए आयोग ने ‘न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी’ वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली उस रण-नीति की योजना बनायी होगी जिसकी कलई समय से पहले उतर गयी। और, विवश हो कर आयोग को खबर का खण्डन करना पड़ा होगा।

५ अपीलें खारिजलेकिन, इन खबरों के आठ-दस दिन पहले ही यह खबर भी छप चुकी थी। वह भी, आयोग में चल रहे किसी सोच-विचार का कोई ‘सुराग’ देने वाली नहीं बल्कि आयोग के एक फैसले की खबर। और, जितना समझ में आ रहा है, आयोग अथवा उसके किसी आयुक्त की ओर से इस खबर का किसी भी प्रकार का कोई खण्डन भी नहीं किया गया है।

यहाँ यह तथ्य और भी महत्व-पूर्ण है कि, इस खबर में जिस सूचना आयुक्त का हवाला है वह, आयोग में अपनी वर्तमान नियुक्ति से पहले तक, एक राष्ट्रीय दैनिक के भोपाल-प्रतिनिधि हुआ करते थे। और, इस कारण से, उनसे बेहतर कौन आम नागरिक समझ सकता है कि अधिनियम के अन्तर्गत् माँगी जाने वाली ‘सूचनाएँ’ अधिकतर आवेदक-विशेष के सीधे-सीधे ‘स्वयं प्रभावित होने’ से पर्याप्त ऊपर उठी हुई होती हैं? अपने अधिनियमित होने का जो स्पष्टीकरण स्वयं अधिनियम में दिया गया है उसके अनुसार लोकतन्त्र ऐसी सूचना की पारदर्शिता की अपेक्षा करता है जो उसके कार्यकरण के साथ ही साथ भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सरकारों तथा उनके परिकरणों को शासित के प्रति उत्तरदायी बनाने के लिए अनिवार्य है।

स्पष्‍ट है, आयोग ने जो खण्डन किया है वह हाथी के ‘दिखाने वाले’ दाँतों की तरह मुँह छिपाने के सम्मान-जनक रास्ते की निरर्थक तलाश से बेहतर और कुछ नहीं है। कथनी और करनी का ऐसा गहरा भेद, लगता है, आयोग को घुट्टी से ही मिला होगा।

(२० मई २०१५)