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अब दूध में डिटर्जेण्ट – Jyoti Prakash

अब दूध में डिटर्जेण्ट

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Sarokar

खाद्य व पेय सामग्रियों के उत्पादकों-विक्रेताओं को कानूनी संरक्षण देने के लिए ‘सुरक्षित’ सीमा का एक नया, बाजार-वादी, मुहावरा गढ़ लिया गया है। इस और इस जैसे सारे मुहावरों का तकनीकी पेंच यह है कि ऐसे सारे उत्पादनों के अपने आप में अकेले अथवा सम्मिलित रूप से ग्रहण करने की ‘सुरक्षित’ सीमा क्या है, इसका उल्लेख कहीं नहीं होता है।

मदर डेयरी का दूध ‘मैगी तूफान’ की चपेट में आ गया है। उसमें ‘डिटर्जेण्ट’ मिला है। यद्यपि, पैकेट-बन्द दूध में ‘डिटरजेण्ट’ का मिलाया जाना कोई अन-होनी बात नहीं है। हाँ, यदि सच में ही कोई अन-होनी हुई है तो वह यह है कि इस मिलावट का ज्ञान अब सार्वजनिक हो गया है।

फिर भी जहाँ तक मेरी समझ जाती है, उसका सार यह है कि जाँच-कर्ताओं ने सच को केवल सतही ढंग से, और पर्याप्त लाग-लपेट के साथ भी, सार्वजनिक किया है। यही नहीं जाँच-कर्ताओं का यह निर्णय भी सन्देह उत्पन्न करने वाला है कि मदर डेयरी को नोटिस देने के अलावा उस मिल्क-बूथ का लायसेंस भी निरस्त किया जायेगा जहाँ से नमूने के लिए दूध उठाया गया था। यहाँ स्वाभाविक सवाल यह है कि उस मिल्क-बूथ का दोष क्या था? यही ना कि उसने अपने बूथ से मदर डेयरी के उस दूध का पैकेट बेचा जिसमें नुकसान-दायक कास्टिक सोडा मिलाया गया था?

इस पैमाने पर तो, उन सारे ही बूथों का लायसेंस निरस्त किया जाना चाहिए था जिन्होंने वह दूषित दूध बेचा था। किन्तु ऐसा करने के कोई संकेत नहीं दिये गये। तब, केवल एक सम्भावना ही ऐसी है जो उस इकलौते मिल्क-बूथ के लायसेंस के निरस्त किये जाने को उचित ठहराती हो। और, वह यह कि उस मिल्क-बूथ वाले ने स्वयं ही मदर डेयरी के दूध के पैकेट में कास्टिक सोडे को मिलाया हो। लेकिन अभी तक का पूरा घटना-क्रम दर्शाता है कि यह महज काल्पनिक दोष है। क्योंकि जहाँ एक ओर दूध में मिलावट का कोई आरोप उस बूथ पर नहीं लगाया गया है वहीं उस बूथ से बेचे गये मदर डेयरी के दूध में कास्टिक सोडे की आरोपित मिलावट का प्रामाणिक आरोप नेशनल डेयरी डेवेलपमेण्ट बोर्ड पर लगाया गया है।

वैसे, फ्रिज तक की पहुँच से दूर रहने वाली किन्तु आम तौर पर सजग रहने वाली दादी-नानी से पूछने पर वह बतलायेंगी कि ठण्डे मौसम की तुलना में गर्मी के दिनों में दूध को २४-४८ घण्टों तक सुरक्षित बचाये रखना आसान नहीं होता। गर्म मौसम में बचाये रखने के लिए उसमें, मामूली मात्रा में, खाने वाला सोडा मिलाना पीढ़ियों से चलता आया है। इस सोडे की क्षारीय प्रवृत्ति दूध में तेजी से पनपने वाले बैक्टीरिया और उसके अम्लीय प्रभाव पर प्रभावी नियण्त्रण रखती है जिससे घरेलू भण्डारण के दौरान दूध फटने से बचा रहता है। और यह पर्याप्त सुरक्षित भी है।

लेकिन, आज के व्यावसायिक भण्डारण के लिए दूध में ‘अधिक उन्नत’ संरक्षकों (प्रिजर्वेटिव्स) का प्रयोग किया जाता है। ये प्रिजर्वेटिव दूध को एक लम्बे समय तक खराब होने से बचाये रखते हैं। खाने के सोडे (सोडियम बाई कार्बोनेट) से आरम्भ हो कर कथित रूप से डिटर्जेण्ट तक पहुँच चुकी, दूध को फटने से बचाये रखने की, आज की कहानी इसी यात्रा का ऐसा परिणाम है जिसमें व्यावसायिक कमाई के लिए स्वास्थ्य से खुला खिलवाड़ किया जा रहा है। मदर डेयरी के दूध में कथित रूप से डिटर्जेण्ट के पाये जाने की खबर इसी अनैतिक कहानी का एक चैप्टर है। लेकिन, इस मिलावट का ‘डिटर्जेण्ट’ जैसा नाम-करण इससे होने वाले नुकसानों की गम्भीरता को दबाने-छिपाने की सोची-समझी बे-ईमानी से भरपूर है।

दरअसल, आज बिकने वाले अधिकांश डिटर्जेण्ट तकनीकी रूप से कास्टिक सोडे की रासायनिक गुण-वत्ता पर आधारित हैं। होता यह है कि कास्टिक सोडे की क्षारीय उपस्थिति में भण्डारण के दौरान दूध में स्वाभाविक रूप से पैदा होने वाला अम्लीय वातावरण निष्प्रभावी हो जाता है और इस तरह दूध फटने से बचा रहता है। इसका तात्पर्य यह है कि नमूने के रूप में लिये गये मदर डेयरी के दूध में ‘कास्टिक सोडा’ मिलाया गया होगा। और हाँ, शत्-प्रतिशत् ईमान-दारी वाली नीयत से पड़ताल करने पर चौंकाने वाली यह सचाई सामने लायी जा सकती है कि यह केवल नेशनल डेयरी डेवेलपमेण्ट बोर्ड का मदर डेयरी ब्राण्ड ही नहीं है जो अपने दूध में कास्टिक सोडा मिला रही है। बल्कि, मध्य प्रदेश में बिक रहे एमपी स्टेट को-आपरेटिव डेवेलपमेण्ट फेडरेशन के साँची ब्राण्ड के दूध की जाँच में भी इसकी पुष्टि होना सम्भव है।

यही नहीं, खुले बाजार में बेची जा रही अनेक खाद्य व पेय सामग्रियों में कास्टिक सोडे का उपयोग खुले आम किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, मोहल्ले-मोहल्ले रोजाना बनने और बिकने वाले फाफड़ों और गाठियों को खाने वाले कितने चटोरे जानते हैं कि बिल्कुल निरापद समझी जाने वाली इन खाद्य सामग्रियों में भी सोडे का भरपूर मात्रा में उपयोग होता है — इन चीजों में पाये जाने वाले विशेष ‘खस्ता-पन’ के लिए। खाने वालों की तो कल्पना में भी नहीं है कि वह कास्टिक सोडा चटखारे ले कर खा रहे हैं।

यों, कास्टिक सोडे से साबका रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि इसका स्पर्श-मात्र कितना घातक होता है?

खाद्य अथवा पेय सामग्रियों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने के लिए मिलाये जाने वाले प्रिजर्वेटिव्स हों या खाद्य सामग्रियों को खस्ता अथवा कुर-कुरा बनाने के लिए मिलाये जाने वाले कास्टिक सोडे या फिटकरी, या फिर मिष्ठान्नों और पकवानों के बनाने की लागत को कम करने के लिए उपयोग में लायी जा रही सस्ती टाटरी; इन जैसे विभिन्न रसायनों के अपने-अपने ऐसे प्रभाव हैं जो मानव-स्वास्थ्य के लिए खासी नुकसान-दायी हैं। और इसलिए, इनको मिलाने की ‘सुरक्षित’ सीमा का एक नया, बाजार-वादी, मुहावरा गढ़ लिया गया है। यद्यपि, केवल खाद्य व पेय सामग्रियों के उत्पादकों-विक्रेताओं को कानूनी संरक्षण देने के लिए ही गढ़े गये इस मुहावरे का गम्भीर चिन्ता में डालने वाला तकनीकी पेंच यह है कि ऐसे सारे उत्पादनों के अपने आप में अकेले अथवा सम्मिलित रूप से ग्रहण करने की दैनिक ‘सुरक्षित’ सीमा क्या है, इसका उल्लेख कहीं नहीं होता है।

(१९ जून २०१५)