अपनी कार्य-शैली को तत्काल प्रभाव से पार-दर्शी बनाये आयोग

Sarokar

स्वयं राज्य सूचना आयोग ही जब अधिनियम के अन्तर्गत् अपने बन्धनकारी दायित्व की उपेक्षा कर रहा है तो कोई यह अपेक्षा कैसे कर सकता है कि वह प्रदेश के विभिन्न लोक-प्राधिकरणों द्वारा अपने कार्यालयों में इसके पालन की निगरानी करने जैसी जिम्मेदारी का सचमुच ही निर्वाह करता होगा?

वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आरटीआई कार्यकर्ताओं ने बीते ४ जून की सुबह भोपाल जिला न्यायालय चौराहे से पर्यावास भवन होते हुए सूचना भवन तक एक मार्च किया और सूचना भवन पहुँच कर म० प्र० राज्य सूचना आयोग को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में राज्य सूचना आयोग की सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ विरोधी कार्य-शैली पर उँगली उठायी गयी है। मुख्य सूचना आयुक्त की अनुपस्थित रहने से आयुक्त गोपाल कृष्ण दण्डौतिया ने आयोग की ओर से ज्ञापन को स्वीकार किया और कार्यकर्ताओं को आश्वासन दिया कि ज्ञापन में उठाये गये बिन्दुओं पर आयोग हर सम्भव कदम उठायेगा। प्रदेश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब आरटीआई कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक प्रदर्शन कर स्वयं आयोग की ही नीयत पर गम्भीर सवाल खड़े किये। कार्यक्रम का आयोजन गैर सरकारी सामाजिक संगठनों सजग तथा राष्ट्रीय जागरण मंच ने सम्मिलित रूप से किया था।

मुख्य सूचना आयुक्त को सम्बोधित उक्त ज्ञापन में, अधिनियम की प्रस्तावना से ही उद्धृत कर, आयोग को यह याद दिलायी गयी कि आरटीआई अधिनियम को २००५ में लाया ही इसलिए गया था ताकि सरकारी तन्त्र की कार्य-शैली में सम्पूर्ण पार-दर्शिता तथा उत्तर-दायित्व का बोध लाया जा सके। ज्ञापन में मुख्य सूचना आयुक्त का ध्यान अधिनियम की इस मंशा की ओर भी आकृष्ट किया गया है कि माँगी गयी जानकारी को हर हालत में देने के बन्धन से सरकारी दफ़्तरों में भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। इसके साथ ही ज्ञापन में राज्य सूचना आयोग की अपनी ही नीयत पर गम्भीर सवाल खड़े कर आरोप लगाया गया है कि सरकारी तन्त्र में पार-दर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए ही गठित हुए राज्य सूचना आयोग में, स्वयं ही, पार-दर्शिता का नितान्त अभाव है।

उसे सौंपने के कारण को स्पष्ट करते हुए ज्ञापन में कहा गया है कि म० प्र० राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपीली आवेदन प्रस्तुत करने वाले सूचना-प्राप्ति के अधिकांश इच्छुकों का मानना है कि राज्य आयोग स्वयं ही अधिनियम की मंशा, उसके उद्देश्य और इन दोनों की पूर्ति के लिए उसे प्राप्त अधिकारों तथा दयित्वों के बारे में या तो अँधेरे में है या फिर इन सब की जान-बूझ कर अन-देखी कर रहा है। कहा गया है कि अपने-अपने प्रकरणों के परिप्रेक्ष्य में म० प्र० राज्य सूचना आयोग से साक्षात्कार करने वाले अधिकांश नागरिकों का मानना है कि आयोग ने न केवल दायित्वों के निर्वाह की ईमान-दारी को दीवार की किसी खूँटी पर टाँग रखा है बल्कि, अवसर तलाश कर वह इनकी धज्जियाँ उड़ाने का काम करने तक में कोई कोताही नहीं करता है।
Photograph_Memorandum to SIC
ज्ञापन के माध्यम से आयोग को याद दिलाया गया है कि पारदर्शिता की स्थापना के लिए अधिनियम में किये गये धारा ४ के प्रावधान अन्य सरकारी कार्यालयों पर तो लागू होते ही हैं, वे स्वयं म० प्र० राज्य सूचना आयोग पर भी समान रूप से लागू होते हैं।

किन्तु, इसे प्रदेश व देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि राज्य सूचना आयोग, अपनी स्थापना से ले कर आज दिनांक तक भी, अधिनियम की इस महत्व-पूर्ण धारा के प्रति सुविधा-जनक उदासी का व्यवहार कर रहा है। ज्ञापन में, आयोग पर लगाये गये, आरोपों को निम्न उदाहरणों के द्वारा स्पष्ट भी किया गया है —

(१) अपीली निराकरण में देर आयोग का दोषअधिनियम सभी लोक प्राधिकरणों को निर्देश देता है कि वे अपने कार्यालयों में सरलता के साथ ही प्रमुखता से दिखलायी पड़ने वाले सार्वजनिक स्थल पर इस सूचना का विस्तृत पटल लगायें कि उनका कार्यालय सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ के दायरे में आता है जिसके कारण प्रत्येक नागरिक को अधिकार प्राप्त है कि वह उक्त प्राधिकरण में सूचना-प्रदाय का आवेदन लगा सके। यही नहीं, इसी पटल पर प्राधिकरण के सम्बन्धित लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपीली अधिकारी के नाम तथा उनकी उपलब्धि के विवरण भी विस्तार से दिये जाना आवश्यक है। साथ ही यह घोषणा प्रदर्शित किया जाना भी बन्धन-कारी है कि लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपीली अधिकारी को आवेदन के निराकरण के लिए अधिकतम्‌ कितनी समयावधि उपलब्ध है? इसके अतिरिक्त उक्त पटल पर ही यह घोषणा लिखी जाना भी बन्धन-कारी है कि सूचना-प्रदाय के आवेदन पर लोक सूचना अधिकारी और/अथवा प्रथम अपीली अधिकारी से असन्तुष्ट रहने पर आवेदक और/अथवा अपील-कर्त्ता को किसके समक्ष प्रथम और/अथवा द्वितीय अपीली आवेदन करने की अधिनियमित छूट होगी?

(२) केवल द्वितीय अपीली निराकरणों के अलावा राज्य सूचना आयोग की एक बड़ी जिम्मेदारी यह भी है कि वह उपर्युक्त सूचना-पटल के सन्दर्भ में भी प्रभावी निगरानी करे। यहाँ, ‘प्रभावी निगरानी’ से स्पष्ट तात्पर्य यह है कि वह यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक लोक-प्राधिकरण उपयोगी/प्रभावी रूप से उपर्युक्त सूचना-पटल को प्रदर्शित करे। और, ऐसा नहीं करने पर सम्बन्धित लोक-प्राधिकारी पर प्रशासनिक तथा दाण्डिक कार्यवाही सुनिश्चित करे। किन्तु यदि, स्वयं राज्य सूचना आयोग ही उपर्युक्त सूचना-पटल को लगाने के अपने बन्धनकारी दायित्व की उपेक्षा करता है तो कोई यह अपेक्षा कैसे कर सकता है कि वह प्रदेश के विभिन्न लोक-प्राधिकरणों द्वारा सूचना-पटल लगाने अथवा नहीं लगाने जैसी जिम्मेदारी का सचमुच ही निर्वाह करता होगा?

(३) यही स्थिति आयोग की अधिकृत वैब साइट ‘www.mpsic.nic.in’ के बारे में भी है। कहने को तो यह वैब साइट आयोग की मिल्कियत है किन्तु इसे खोलने पर, किसी भी संशय से परे, यह स्पष्ट हो जाता है कि यथार्थ में इसका मालिक ‘भगवान’ ही है। आज की दिनांक में आयोग की वैब साइट की जो दशा है उसमें यह एक वैधानिक औपचारिकता भले ही पूरी कर देती हो, यह सम्भावना कोसों दूर दिखती है कि आयोग अपनी साइट के मध्यम से अधिनियम की धारा ४ के प्रावधानों की पूर्ति कर सके। ऐसी स्थिति में, अपने कार्यालयों में अधिनियम को लागू करने के ‘सूचना-पटलों’ की जो दुर्दशा प्रदेश के अधिकांश लोक-प्राधिकरणों की है, उनके द्वारा अधिनियम की धारा ४ को लागू करने की प्रगति की दशा भी बिल्कुल वैसी ही हो गयी है।

ज्ञापन के माध्यम से मुख्य सूचना आयुक्त से माँग की गयी है कि वे अपने नेतृत्व में आयोग की कार्य-शैली को तत्काल प्रभाव से पार-दर्शी बनाएँ ताकि सूचना का अधिकार अधिनियम अपने प्राप्य को यथा-सम्भव प्राप्त कर सके।

(६ जून २०१५)