गरीबों के नाम पर नया शिगूफ़ा

Sarokar

गरीब को प्रोटीन उपलब्ध कराने के बरसों पुराने झुन-झुने के नाम पर छोड़ा गया एक नया शिगूफ़ा सामने आया है। अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी दावा कर रही है कि प्रयोग-शालाओं में तैयार की जाने वाली ‘सुरक्षित’ खेसारी, दाने-दाने और पैसे-पैसे को मोहताज गरीब की, प्रोटीन की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगी।

बीती सदी के नब्बे वाले दशक में समझ-दार हो चुके भारतीय नागरिक बे-बस खेतिहर मजदूर को अपाहिज करने वाली ‘खेसारी दाल’ को आज भूले नहीं होंगे। उस समय ‘प्रोटीन की खदान’ खेसारी के नुकसानों की खबरें सुर्खियों में रही थीं और मामला सर्वोच्च न्यायालय में भी चला था। ऐसे नागरिकों को यह भी याद होगा कि कैसे पीआईएल के इतने महत्व-पूर्ण मामले की सुनवाई की प्रक्रिया में आज के महान्‌ कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ने अपने ही मुवक्किल से, पेशेवर अधिवक्ताओं के लिए औसतन अस्वाभाविक समझा जाने वाला, भितर-घात किया था। सिब्बल के इस ‘प्रोफ़ेशनल मिस-कण्डक्ट’ के कारण गरीब खेतिहर श्रमिक को हुई क्षति की बातें भी आज ताजा ही होंगी।

गरीबों के नाम पर नया शिगूफ़ा_14 June 2015गरीब को प्रोटीन उपलब्ध कराने के बरसों पुराने झुन-झुने के नाम पर छोड़ा गया उसी खेसारी दाल (तिवड़ा) का एक नया शिगूफ़ा सामने आया है। वह भी, अन्तर्राष्ट्रीय फण्डिंग की मदद से। वैसे, इण्टरनेशनल सेण्टर फ़ॉर एग्रिकल्चर रिसर्च इन द ड्राय एरिया (इकार्डा) मध्य प्रदेश के सीहोर स्थित अपने केन्द्र में क्या-क्या करेगा, कैसे करेगा और उसका यह करना-धरना भारतीयों के स्वास्थ्य के लिहाज से कितना सुरक्षित रहेगा, इन जैसे आधार-भूत रूप से महत्व-पूर्ण सवालों के असली पत्ते अभी खुलने बाकी हैं। लेकिन, खेसारी दाल में शोध के नाम पर अतीत में हो चुकी भारी-भरकम धाँधलियाँ चीख-चीख कर चेता रही हैं कि एक भी क्षमता-वान नागरिक बे-फिक्री की नींद नहीं सोये।

यों, इस चेतावनी को देने के क्लिष्ट तकनीकी/वैज्ञानिक कारण वैज्ञानिक दस्तावेजों में पर्याप्त मात्रा में सुलभ हैं। फिर भी, यहाँ उनके उल्लेख से बच रहा हूँ। ऐसा केवल इसलिए कि खेसारी की, अभी तक अज्ञात, किसी सुरक्षित प्रजाति की खेती की वकालत में जुटी यह अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी दावा कर रही है कि प्रयोग-शालाओं में तैयार की जाने वाली खेसारी, दाने-दाने और पैसे-पैसे को मोहताज गरीब की, प्रोटीन की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगी। इकार्डा के शोध-कर्ताओं का यह दावा जमीनी रूप से कितना सच्चा-चोखा है इसका अनुमान उनके अपने इस दावे से आसानी से लगाया जा सकता है —

“A reduced risk of paralysis was associated with soaking L. sativus seeds in water before preparation, fermentation, mixing the seeds with gravy that contains condiments with antioxidant activity or mixing with cereals rich in sulphur amino acids is shown to be protective.” [Getahun, H. et al. (2003). Lancet 362 (9398), 1808-1810]

यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश की बड़ी सचाई तो यही है कि दाने-दाने को मोहताज गरीब ग्रामीण मजदूर अगले जून का भोजन भी तभी जुटा पाता है जब उसके लिए आवश्यक न्यूनतम्‌ रोजगार उसे मिल पाये। ऐसे में, ‘खेसारी के सुरक्षित होने’ की ऊपर दी गयी शर्तों में से कोई एक भी पूरा कर पाना उसके बूते के पर्याप्त बाहर की बात है।

(१४ जून २०१५)