म० प्र० राज्य सूचना आयोग की खोखली सफाई

Sarokar

सजग और राष्ट्रीय जागरण मंच ने बीती ४ जून को उसके द्वारा अपनाई जा रही घोर अपारदर्शिता के विरोध में म० प्र० राज्य सूचना आयोग को जो ज्ञापन दिया था उससे आयोग में हड़कम्प मचने के संकेत आने लगे हैं। आयोग बैक पुट पर है।

अपनी कार्य-शैली में बिल्कुल भी पारदर्शी नहीं होने का आरोप लगाने वाले ज्ञापन को पाने के बाद से राज्य सूचना आयोग प्रदेश के सरकारी तन्त्र के आगे स्वयं अपने ही ‘लाचार’ होने का दिखावा करने में जुट गया है। अपने चेहरे पर लगी अ-पारदर्शिता की कालिख को पोछने के लिए आयोग ने सूचना आयुक्त हीरालाल त्रिवेदी के हवाले से एक खबर अखबारों में प्लाण्ट की। दो दिन पहले आई सफाई-नुमा इस खबर के अनुसार सरकारी विभागों से जानकारी लेने में केवल आम नागरिक ही परेशान नहीं हैं, स्वयं आयोग भी पर्याप्त हलाकान हो रहा है! कहा गया है कि बार-बार माँगने के बाद भी प्रदेश सरकार के ५४ विभागों ने आयोग को जानकारी नहीं भेजी। दावा किया गया है कि इस ‘अपराध’ के लिए आयोग सामान्य प्रशासन विभाग के विरुद्ध इसी २३ जून को सुनवाई करेगा।

सूचना का अधिकार अधिनियम और उसके अन्तर्गत्‌ गठित हुए राज्य सूचना आयोग के दायित्वों व अधिकारों के जानकारों के अनुसार, आयोग की बद-नीयती की थाह लेने के लिए सारे वाक़ये को इस तरह से समझना होगा —

आयोग की सफाई४ जून के ज्ञापन में आयोग पर बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में आरोप लगाया गया था कि जब आयोग स्वयं अपने ही क्रिया-कलापों के प्रति पार-दर्शी नहीं है तब वह अधिनियम के माध्यम से प्रदेश के सरकारी तन्त्र में पार-दर्शिता कैसे लागू कर सकता है? लगता है कि ज्ञापन में लगाये गये इस गम्भीर आरोप की, सार्वजनिक हो गयी, सचाई से आयोग में बौखलाहट आ गयी है और उसने, एक तरह से, इसका ठीकरा प्रदेश सरकार के माथे फोड़ दिया है। लेकिन, आयोग की इस सरासर लचर सफाई को क्या सचमुच स्वीकार किया जा सकता है?

आयोग के अनुसार, हर साल और हर हालत में प्रकाशित होने वाला उसका वार्षिक प्रतिवेदन बीते चार सालों से इसलिए प्रकाशित नहीं हो पाया कि प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों ने माँगी गयी जरूरी जानकारी इतने सालों के बाद भी आयोग को नहीं भेजी।

यहाँ, दो-टूक सवाल यह है कि जो अधिनियम ३० दिनों में जानकारी नहीं देने के आधार पर लोक सूचना अधिकारी को और ३० दिनों की ही अवधि में प्रथम अपीली निराकरण नहीं करने पर अपीली अधिकारी को दोषी घोषित करता हो, उस अधिनियम को संवैधानिक संरक्षण देने के उद्देश्य से गठित हुआ सूचना आयोग स्वयं अपनी माँगी जानकारी को पाने के लिए चार-चार सालों तक बिना कोई वैधानिक कार्यवाही किये हाथ पर हाथ धरे इस प्रकार से कैसे बैठा रहा? क्या इस स्थिति से ही उसे यह पक्का भरोसा नहीं हो पाया कि अधिनियम के माध्यम से जानकारी की माँगों की सुनवाई के प्रति सरकारी तन्त्र किस सीम तक बहरा बना हुआ है?

एक दूसरा दो-टूक सवाल यह भी है कि जितनी, और जैसी भी आधी-अधूरी, जानकारी आयोग को हाथ लगी थी उसे ही शामिल कर आयोग ने अपने वार्षिक प्रतिवेदन प्रकाशित क्यों नहीं कर दिये? अपने वार्षिक प्रतिवेदनों को इस तरह से प्रकाशित कर आयोग ने यह जाहिर क्यों नहीं किया कि उसे किन-किन से, और क्या-क्या, जानकारियाँ माँगने के बाद भी प्राप्त नहीं हुईं?

यहीं, एक तीसरा दो-टूक सवाल और भी है — प्रतिवेदनों में छापी जाने वाली उपर्युक्त जानकारियों में स्वयं आयोग कार्यालय से सम्बन्धित वही सब जानकारियाँ भी छापी जानी चाहिए थीं। तो क्या स्वयं की आन्तरिक व्यवस्था भी जन-सामान्य की पहुँच के बारे में इतनी अपार-दर्शी है कि उसने भी वही सब जानकारियाँ आयोग के सम्बन्धित विभाग/अधिकारी को नहीं भेजीं?

और, आयोग के सर्वथा अ-पारदर्शी होने का यही आरोप ४ जून को आयोग को सौंपे गये ज्ञापन का केन्द्र-बिन्दु था।

(११ जून २०१५)