तैयार रहिए, नये ‘तिवड़ा’ घोटाला के लिए!

Sarokar

खेसारी दाल (तिवड़ा) तो एक बहाना है। मध्य प्रदेश सरकार में से कोई भी यह सचाई उजागर करने को तैयार नहीं है कि इकार्डा को एक सुरक्षित जगह की तलाश थी क्योंकि मध्य-पूर्व की अस्थिरता से उसे अपना बोरिया-बिस्तर बाँधना पड़ा है। और, मध्य प्रदेश सरकार इसके लिए पट गयी। बिना सोचे-समझे।

दो खबरें हैं। एक दिल्ली से तो दूसरी भोपाल से।

दिल्ली से आयी खबर यह है कि केन्द्रीय कैबिनेट ने घरेलू माँग को पूरा करने के लिए विदेशों से लगभग ४० लाख टन दालों के आयात का निर्णय लिया है। जबकि भोपाल से यह खबर आयी है कि कन्सल्टेटिव ग्रुप फ़ॉर इण्टरनेशनल एग्रिकल्चरल रिसर्च (सीजीआईएआर) की आर्थिक सहायता से काम करने वाला संगठन इण्टरनेशनल सेण्टर फ़ॉर एग्रिकल्चर रिसर्च इन द ड्राय एरिया (इकार्डा) ने म० प्र० प्रदेश सरकार को पटा लिया है। यों, प्रदेश के मुखिया ने दावा किया है कि इकार्डा ने चीन के ऊपर सीहोर को तरजीह देना तय किया है।

केवल अधिकारिक सरकारी सूचना-तन्त्र पर निर्भर रहने वाले खबरचियों और उन पर आँखें मूँद कर भरोसा करने वाले पाठकों के लिए दोनों खबरें एक-दूसरे की पूरक हैं। जबकि, खबरों की जड़ तक उतर कर उन्हें परखने वाले खबरची और पाठक जानते हैं कि दोनों खबरें किस सीमा तक परस्पर विपरीत ध्रुवी भी हैं।

दरअसल, देश में दालों की कमी कोई प्राकृतिक दुर्घटना नहीं है। दालों की पैदावार का यह संकट नीतियों के माध्यम से जान-बूझ कर किये गये षडयन्त्र की देन है। और अब दालों की इस कमी के लिए ‘विदेशी विशेषज्ञों’ की मदद से ‘शोध’ नामक नाटक के मंचन की रिहर्सल आरम्भ हो गयी है। खेसारी दाल (तिवड़ा) के ऐसे प्रकार को तैयार करने की शोध जिसके खाने से, सदियों पहले पहचानी जा चुकी, लेथाइरिज़्म नाम की लँगड़े-पन की बीमारी होने की सम्भावना कम हो।

यों, खतरे की चेतावनी देने वाले क्लिष्ट तकनीकी/वैज्ञानिक कारण वैज्ञानिक दस्तावेजों में पर्याप्त मात्रा में सुलभ हैं। फिर भी, तिवड़ा के किसी सुरक्षित प्रकार की खेती की वकालत में जुटी अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी दावा कर रही है कि प्रयोग-शालाओं में तैयार की जाने वाली नये प्रकार की खेसारी, दाने-दाने और पैसे-पैसे को मोहताज गरीब की, प्रोटीन की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति तो करेगी ही करेगी, इसका खाया जाना स्वास्थ्य के मान-दण्डों पर सुरक्षित भी रहेगा!

बस, इस नये प्रकार के तिवड़े को खाने वालों को सुरक्षा की कुछ ‘छोटी-मोटी’ शर्तों का पालन करना होगा। और, यह छोटी-मोटी शर्तें क्या हैं? सरल हिन्दी में इन शर्तों का सार यह है कि खाने से पहले तिवड़ा को भिगो कर इतनी देर रखना होगा जिससे उसमें खमीर उठने लगे। उसके बाद, इस खेसारी को एण्टी ऑक्सिडेण्ट वाले बीजों की ग्रेवी में मिलाने और सल्फर अमीनो एसिड वाले अनाजों के साथ मिल कर खाने से, उसको खाने से होने वाले पक्षाघात की सम्भावना ‘कम’ हो जाती है।

और हाँ, मध्य प्रदेश सरकार में से कोई भी यह सचाई उजागर करने को तैयार नहीं है कि मध्य-पूर्व की अस्थिरता से इकार्डा को अपना बोरिया-बिस्तर बाँधना पड़ा है। और इसलिए, उसे एक ऐसी सुरक्षित जगह की तलाश थी जहाँ की सत्ता बिना मीन-मेख उसे अपना काम करने दे। और, मध्य प्रदेश सरकार पट गयी। बिना सोचे-समझे। खेसारी दाल (तिवड़ा) तो एक बहाना है।

(24 June 2015)