सम्मान-प्रदर्शन या घोर अपमान?

Bahas

दिवंगत् पूर्व राष्ट्रपति के पर्थिव शरीर के प्रति अपने सम्मान को प्रकट करने के लिए प्रधान मन्त्री मोदी विमान-तल समय से नहीं पहुँचे। और, सम्मान के उनके दिखावे की ऐसी इच्छा की पूर्ति के लिए इस महापुरुष के पर्थिव शरीर को, विमान से अपने उतारे जाने की, पर्याप्त प्रतीक्षा करनी पड़ी!

महान्‌ वैज्ञानिक, आदर्श शिक्षक और अ-राजनैतिक राष्ट्रपति कलाम साहब नहीं रहे। और, अपूरणीय क्षति पहुँचाने वाले इस दैवी आघात्‌ के दु:ख को पूरे देश ने अपनी श्रृद्धांलियों से एक स्वर से व्यक्त किया। निर्विवादित रूप से भी।

कलाम साहब तमाम राजनैतिक विवादों से ऊपर रहे। और इसीलिए, उन्हें दी गयी श्रृद्धांजलियों में विवाद की कोई आँच किसी को भी नहीं दिखी। दिखनी भी नहीं चाहिए थी। और, ‘देखी भी नहीं जानी चाहिए थी’ के इसी सराहनीय भाव ने इस अति गम्भीर बात की भी खुली अन-देखी कर दी कि देहावसान के बाद कलाम साहब के सम्मान में कहीं कोई भारी कोताही भी कर दी गयी थी।

शिलांग से दिल्ली पहुँचे इस महान्‌ शख्सियत के पार्थिव शरीर के साथ विमान-तल पर जो हुआ, मेरी दृष्टि में वह खासा अपमान-जनक रहा। ‘जीवित’ और ‘मृत’ के बीच किया गया यह भेद-भाव, कम से कम मुझे तो, अपमान-जनक लगा। निन्दनीय भी।

दिल्ली विमान-तल पर उतर चुके भारतीय सेना के विमान से कलाम साहब के पार्थिव शरीर को उतरने के लिए पर्याप्त प्रतीक्षा करनी पड़ी। केवल इसलिए कि प्रधान मन्त्री मोदी दिवंगत्‌ पूर्व राष्ट्रपति के पर्थिव शरीर के प्रति अपने सम्मान को प्रकट करने के लिए विमान-तल तक पहुँच नहीं पाये थे। सम्मान के दिखावे के लिए अपनी उपस्थिति को दर्ज कराने की मोदी की ऐसी इच्छा उनकी ‘उदारता’, ‘विनम्रता’ या कहें कि ‘महानता’ खबरों में तो दर्ज हो गयी लेकिन, कलाम साहब के हमसे बिछड़ने के दु:ख और उनके प्रति अपार श्रृद्धा रखने के राष्ट्र के भाव में, इलेक्ट्रॉनिक अथवा प्रिण्ट मीडिया के किसी भी कोने में, मोदी द्वारा की गयी ऐसी देरी के लिए, कोई विपरीत टिप्पणी नहीं की गयी!

बस, इतना कहना चाहता हूँ कि प्रोटोकाल का अनुगमन करते हुए, अथवा उसकी उपेक्षा करके भी, जब कभी मोदी किसी के ‘आगमन’ पर, अपना सम्मान-भाव प्रदर्शित करने, विमान-तल पहुँचे थे; क्या उसे विमान से उतारने में ऐसी कोई देर अतीत में कभी करायी गयी थी? या, भविष्य में कभी, प्रतीक्षा कराने की ऐसी कोई कूटनैतिक हिम्मत वे कर पायेंगे?

(२९ जुलाई २०१५)